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प्रेम

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मुंबई डायरी

पलकों के नीचे जब पसरने लगती है उदासी तो जाते-जाते छोड़ जाती है सुरमे-सा काला रंग, हालांकि मैं नहीं सहेजना चाहती उदासी के बाद आँखों के नीचे बच गए इन गहरे काले निशानों को, पर इन्हीं उदासियों के साथ ही तो लिपटकर तुम्हारी यादें उतरती हैं मेरे हिस्से में….

मैं सोचती हूँ कि जाने कौन लगाता है ज़िन्दगी की तश्तरी, सुखों के शहद के साथ रख देता है दुखों का कड़वा रस, अतीत का बासी साग, और सब कुछ चखना पड़ता है क्योंकि जूठन छोड़ने का गुनाह नहीं माफ़ करती ये कुदरत, और देती है मृत्यु के बाद भी पलकों से नमक उठाने की सज़ा….

आजकल मेरी अलसाई सुबह दिन चढ़ने के बाद भी मुश्किल से जागा करती है, और जागते ही सुनाई देता है ट्रैफिक का शोर, दिन में तेज़ बारिश का, शाम को बच्चों के सोसाइटी के बाहर खेलने की आवाज़ों का और रात को कुत्ते के भौंकने का…और फिर खटकने लगता है कमरे में सबसे अच्छी लगने वाली चीज इस बालकनी का होना भी, जैसे मेरे शातिर मन में खटकता है कभी तुम्हारा होना भी… कभी तुम्हारा न होना भी… कब तक देखूं इयरफोन लगाकर लैपटॉप की वही पुरानी फिल्में, असल वजह है कि देवों और गंधर्वों के गान भी शोर लगते हैं जब मैं जप रही होती हूँ तुम्हारा नाम…

एक दोस्त ने कहा कि चलो किसी शानदार रेस्टोरेंट में जाके अच्छी वाइन पीते हैं, पर मैं तो पेप्सी की बोतल में देसी दारू मिलाके सड़कों पे खुले आम पीना चाहती हूँ… मुझे नहीं अच्छी लगती वो सीसीडी कि कैपीचीनो, मुझे तो चहिये वो टपरे के चूल्हे पे पकती इलायची वाली चाय, और मैं हमेशा भूल जाती हूँ चाय वाले से कहना कि भैया इलायची और अदरक दोनों डाल देना…

मुझे नहीं पसंद ये हरदम सजे-धजे घूमना.. मुझे तो चाहिए वो बिखरे बालों और फैले काजल वाली लड़की को भी देखने वाली प्यार भरी नज़रें… चाहतों के अल्पविराम ख़त्म हो गए सपनों के पूर्णविरामों में, पर दिल की कोई टीस अब भी ठहर गयी है चाहत के किसी अल्पविराम पर…

काश कि ये सपने कांच होते और नींदें पत्थर और मैं खन्न की आवाज के साथ सब कर देती चकनाचूर… और लगा देती पूर्णविराम उन्हीं चाहतों पर, जो सिर्फ तुमने पूरी की हैं, तुमने मुझे चाहा, चूमा, सुना, समझा, सारा प्यार मुझ पर उड़ेल दिया… क्या कुछ नहीं दिया तुमने मुझे और देखो इस बालकनी की तरह खटकने लगे हैं मुझे मेरे सपने भी…

फिर तुमने कहा “जाना !! आवाजें और शोर तो क्षणभंगुर हैं, कमरे में बालकनी का होना ही एकमात्र सुन्दरता है. तुम्हारे सपने खुदा ने कांच से नहीं पानी से बनाए हैं, पत्थरों को भी काट देने के लिए, तुम्हें तजना होगा चाहतें, रीतना होगा हर शोर से और बनाना होगा सपनों को अपनी फितरत… और रही हमारी बात तो तुम जब चाहोगी मैं तुम्हें अपने गलियारे में खींच लूँगा…”

– एकता नाहर

हर बात का सलीका सीखना ज़रूरी है क्या?

प्रेम हुआ तो इज़हार करने का सलीका खोजने लगे.
परफेक्ट इज़हार कर दिया तो प्रेम करने के नए नए सलीके खोजे जाने लगे

अब तक सब मनोरंजक था
पुराने खेलों से उकताए दसवीं के बच्चों के नए खेल खोजने जैसा

फिर आयी बारी विदा की
प्रेम की उम्र पूरी न हुई थी, रिश्ते की हो गयी थी
ऐसे तो विरले ही होते है जिनके प्रेम और रिश्ते की उम्र बराबर हो

 

विदा का सही सलीका खोजना कठिन प्रतीत हुआ
ऐसी विदा कि प्रेम पहले से दोगुना हो जाये आंखों से ओझल होते ही
जैसे तैसे वह भी खोज लिया
आखिरी मुलाकात की सबसे सुंदर स्मृतियों के साथ विदा ले ली गयी

अब सबसे कठिन काम का सलीका खोजना बाकी रहा
विदा के बाद प्रेम में भी रहना था और खुश भी रहना था

वह भी खोज लिया जाएगा एक दिन
मगर कोई क्यूंकर खुश रहे अपने प्रेमी से बिछड़कर
आँसू जैसी ज़रूरी शै क्यूं बिसरा दी जाए भला

हर बात का सलीका सीखना ज़रूरी है क्या ?

 

इंसान हो तो तड़पो, रोओ, बेचैनी में कभी नब्ज़ घटाओ, कभी धड़कनें बढ़ाओ. उसकी खुशी के लिये दुआएं करो, उसकी पसन्द की ग़ज़लें सुनो, उसके नाम कभी न भेजी जाने वाली चिट्ठियां लिखो, उसका ज़िक्र चले तो आँख को अपना काम करने दो औऱ होंठों को अपना,बारिश की बूंदों को उसके चुम्बनों में बदल दो, कोई जामुनी फूल खिले तो उसे छूकर उसे प्रेम करो, झील किनारे कोई प्रेमी जोड़ा दिख जाए तो उनकी नज़र उतार दो, उसका नाम कहीं दिख जाए तो अपनी उंगली से उसे बार-बार छुओ और जो कहीं वह ख़ुद टकरा जाए तो भर लो उसकी सूरत आंखों में. घर आकर तकिए पर बारिशें उलीच दो. प्रेम में बिताए हर पल को कविता में सहेज लो. उदास ख़ाली शामों को घर लौटते पंछियों के गान से भर दो. बार-बार मरो. बार-बार जी उठो.

जीवन में कुछ चीज़ें बे-सलीका रहने दो. ठीक किसी अनछुए जंगल की तरह. जो उगता है, उगने दो. जो नष्ट होता है, होने दो.

हर बात का सलीका सीखना ज़रूरी है क्या?

– पल्लवी त्रिवेदी

खुदा की क़िताब

वो दोनों चादर पर
सोये थे कुछ इस तरह
जैसे मुसल्ले पर
कोई पाक़ क़िताब खुली पड़ी हो
और खुदा अपनी ही लिखी
किसी आयत को उसमें पढ़ रहा हो|

वक्त दोपहर का
खत्म हो चला था,
डूबते सूरज का बुकमार्क लगाकर
ख़ुदा चाँद को जगाने चला गया|

उन्हीं दिनों की बात है ये
जब दोनों सूरज के साथ
सोते थे एक साथ
और चाँद के साथ
जागते थे जुदा होकर|

दोनों दिनभर न जाने
कितनी ही आयतें लिखते रहते
एक की ज़ुबां से अक्षरों के सितारे निकलते
और दूजे की रूह में टंक जाते
एक की कलम से अक्षर उतरते
दूजे के अर्थों में चढ़ जाते|

दुनियावी हलचल हो
या कायनाती तवाज़न
हसद का भरम हो
या नजरें सानी का आलम
अदीबों के किस्से हो
या मौसीकी का चलन
बात कभी ख़ला तक गूंज जाती
तो कभी खामोशी अरहत (समाधि) हो जाती|

देखने वालों को लगता
दोनों आसपास सोये हैं
लेकिन सिर्फ खुदा जानता है
कि वो उसकी किताब के वो खुले पन्ने हैं
जिन्हें वही पढ़ सकता है
जिसकी आँखों में मोहब्बत का दीया रोशन हो|

– माँ जीवन शैफाली

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