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प्रेम : कपूर टिकिया सा, जो ख़ुद अपनी गन्ध बिसरा के स्वयं बिसर जाए

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प्रेम कोई कथ्य नहीं कोई विचार नहीं जिसे साझा किया जाए शब्दों में

कभी कभी लगता है कि प्रेम अहसास भी नहीं. क्योंकि कैसे ही इसे महसूस करना शुरू करो यह खत्म होना शुरू हो जाता है. इसलिये इसे महसूस भी मत करना चाहिए. बस जी लेना चाहिए.

प्रेम कोई फूल भी नहीं कि सदा खिला रहे. प्रेम कोई अग्नि भी नहीं कि चिर जलती रहे.

प्रेम तो कपूर टिकिया सा है जो देखने मे ठोस लगे. लेकिन क्षण भर में अपनी गन्ध बिसरा के स्वयं बिसर जाए. और श्वास-श्वास महका दे. कपूर जो अगन तो लगा दे लेकिन भभक के कारोंच छोड़ के फिर हवा में गुम हो जाये, और वह कारोंच छुटायी न छुटे, जितना छुड़ाओ उतनी लगती जाए.

प्रेम को क्या परिभाषित करना और कैसे परिभाषित करना कि शब्द ही जिस के आगे गूंगे हो जाएं. इसलिये प्रेम में शांत हो के बैठ जाना पड़ता है

प्रेम समझना है तो प्रेम करना पड़ेगा, प्रेम करना होगा तो बिछोह होगा, बिछोह होगा तो धमनी-शिराएँ धधकने लगती हैं, लेकिन वह अगन जो कपूर में जल तो रही होती है. लेकिन आंखों में शीतलता हो रही होती है.

माना कि कस्तूरी हिरनी की नाभि में ही है. तथापि उसकी सुगंध जो विचरण करने पर विवश करती है वही घुमक्कड़ी ही तो प्रेम है. जो उसे अन्ततोगत्व: शांति से बैठने की प्रेरणा देती है.

इसलिये प्रेम चाहिए हो तो घुमक्कड़ी करनी पड़ेगी, निरुद्देश्य घुमक्कड़ी. जबकि अपनी ही गन्ध लिए अपनी नाभि में वापसी हो.

तब वहीं प्रेम होगा; जहाँ तुम स्वयं होगे.

यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ कुछ भी नहीं…

प्रेम शाश्वत है. सर्वव्यापी है और निजता में समाहित है. इसलिये जब प्रेम करना तो मन की खिड़कियाँ बन्द कर उन पर श्याम पर्दा अटका देना ताकि निजता में भड़कीले रंगरोगन की चकाचौंध न पड़े.

क्योंकि प्रेम फूल नहीं, खुशबू है,
क्योंकि प्रेम दिया नहीं उजाला है,
क्योंकि प्रेम कपूर नहीं गन्ध है,

क्योंकि प्रेम दहकती लू के थपेड़े हैं जो भभका मार के चले जाते हैं आपको उसी की आग की ध्यान में जलता छोड़कर…

क्योंकि प्रेम ध्यान है अपने प्रिय का ध्यान… घुमक्कड़ी के बाद का आयाम…

अगली घुमक्कड़ी के बाद ध्यान में बैठना और ध्यान के बाद की घुमक्कड़ी तुम्हें कस्तूरी प्रेम से न मिला दे तो कहना…

प्रेम क्या है क्या नहीं है!

– गीतिका वेदिका

प्रेम

मेरे पास तुमसे प्रेम न करने का विकल्प ही कहाँ था
जिस पल तुम्हें देखा
उसी पल ये अहसास हुआ था
कि तुम ही प्रारब्ध हो
तुम ही गंतव्य!

कि तुम्हें हर अंदाज़ से
हर तरकीब से
प्रेम करने के लिए ही जन्मी हूँ मैं!!

तुम कहो मेनका बनूँ
तुम कहो तो जोगन
तुम कहो अदृश्य हो जाऊँ!!

मेरी दॄष्टि में तुम सर्वोच्च थे
तुम ही से सीखे जीने के ढंग
संजीदगी और शोख़ी
लहज़ा और भाषा..
शिखर पर चढ़ना
और वहां पर खुद को संयमित रखना!!

कि तुम से ही सीखा
तुम हो जाना!!

पर सुनो
तुम बेफिक्र रहना
कि मुझे तुम्हें प्रेम करने के लिए
तुम कतई ज़रूरी नहीं!

तुम्हारे बगैर तुम्हें प्रेम करने का विकल्प
चुना है मैंने!!
मैं बगैर तुम्हारी हामी के
बगैर तुम्हारी स्वीकृति के
बगैर तुम्हारा नाम उजागर किये
करती रहूँगी प्रेम
देहातीत
समयातीत
सबंधातीत…

– निधि सक्सेना

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