Menu

जा वे सजना… मैं नईं करना तेरा एतबार…

0 Comments


पहाड़ी प्रेमाकांक्षी इकतरफ़ा होते हैं। जिनमें प्रेमी सदा समुंदर के तटीय मैदानी परदेस से आते तो हैं और प्रेमिका के दिल मे देस भी बसाते हैं फिर रुत बदलते ही रुत की ही तरह बदल जाते हैं। अपने देस याने के परदेस के हो लेते हैं। यह बात तनिक भी झूठी नहीं। न जाने कितनी ही अनगिन कहानियों ने इस सच्ची व्यथा को उकेरा, उजागर किया लेकिन सबने इसे कहानी ही जाना, सच कभी नहीं।

कालांतर में सभी गिरहें आसूँओं में खुलती जाती हैं और समझाइश के दौर चलते हैं।

प्रेम को आकर्षण, ग़लतफ़हमी, जल्दबाज़ी, भूल के नाम देकर बिसारना भी एक पथरीली परम्परा है। इन सब में न जाने क्यों पहाड़ के देस की सजीली पत्थर दिल की नहीं हो पाती। और फूलों के देस का राजकुँवर जिसे पत्थर का कभी नहीं होना चाहिये वह कभी फूलों का नहीं हो पाता।

एक दिन सूरज पच्छिम में जाते-जाते सब कुछ अपने साथ ले जाता है। प्रेम की कहानियाँ, सपनों के गीत, तपते पत्थरों पर उपनये पैरों में प्रेयस के ख़ुमार, पेड़ों की छाहों पर प्रतीक्षाओं की पथरीली धरती पर पथराती आँखें…

क्योंकि जा तन लागे सो ई जाने ..!!

परदेस में इन कठोर कहानियों के परे उधर पहाड़ प्रतीक्षा में हैं उस प्रेम कहानी के पूरे होने के!

कि पहाड़ों की प्रेमाकांक्षी फूलों के परदेसिया के साथ लौट के इन्हीं पहाड़ों के इर्दगिर्द अपने सपनों की झोपड़ी बसायेगी

कि उसके आँगन के फूल दौड़ते-भागते-हँसते-खिलखिलाते वादी को जिंदगी से भर रहे होंगे

कि उसकी रसोई से निकलते धुएँ से कुनमुनाते पहाड़ आँखें मलीचने लग जाएंगे…

अदेखे सपन अदेखे ही रह जाते हैं। भूल जाता है ‘वह’ हाथों में हाथ ले के दिया हुआ वचन और ‘उसे’ भी भूल जाने को कहता है और लौट जाने को कहता है…

लेकिन वह पहाड़न पहाड़ों के देस में वापसी नहीं कर रही। वह जा रही है सूरज के साथ पच्छिम की खाई में…

इंतज़ार कोहरा बन गए हैं। भरे धूप की रुत भी उन्हें उजियार नहीं पा रही। पहाड़ों की सदायें मद्धिम पुकार करते-करते धीमा गयी हैं। पहाड़ जहाँ अस्ताचल है… रहेगा… प्रेम का अस्ताचल, प्रेम करके भूल जाने का अस्ताचल|

सदियों के लिए अपने तन पर कोहरा ओढ़े पहाड़ों की सदायें कौन सुनेगा? सुनेगा भी तो कहानी जान के ही। और निरे पहाड़ भुलावे में जीते हुए अब तक इंतजार में हैं कि पहाड़न लौट रही होगी फूलों के देस के राजकुँवर को अपना हमराही बना के।

प्रेम की कहानियाँ अधूरी रह जाने को होती हैं…

प्रेम की कहानियाँ भुलावे की दास्ताँ होती हैं…

भुलावे की दास्तां ये प्रेम की अधूरी कहानियाँ पहाड़ पर अनन्त काल तक कोहरा बन के छाई रहेंगी!

– गीतिका वेदिका

तुम्हारी रचना के अवतरण के लिए
मुझे कारण होना स्वीकार था…
जैसे कोई ईश्वर की पूजा के लिए
एकत्र करता है सामग्री

तुम विस्मृत कर देना
मेरा यूं बिखर जाना
पूजा की सामग्री भी हम
एक साथ चरणों में कहाँ अर्पित करते हैं..

माथे पर कुमकुम
चरणों में पुष्प
आसन पर दीप
और आरती में धूप की तरह

विरह, शिकायतों और पीड़ा को ऐसे ही
चरणों में पुष्प की तरह
आसन पर दीप की तरह
और आरती में धूप तरह
अर्पण करना

प्रेम तो स्वयं ही ईश्वर का रूप है
जो सदा माथे पर कुमकुम की तरह
सजता रहेगा…

तुम्हारी रचना भजन की तरह युगों तक गाई जाएगी
प्रेम में ऐसा समर्पण और कहाँ मिलेगा…
तुम्हारी रचना के अवतरण के लिए
मुझे तो कारण होना ही था…

– माँ जीवन शैफाली

सबसे अच्छी मौन की भाषा

मुझे तुम्हारे सामने बैठ मौन हो जाने की विधा सीखनी है……
मुझे एकलव्य होना है,
तुम कुछ कहो, न कहो,
मगर मुझे इन शब्दों के भँवर जाल से उबरते हुए तुम्हारे और मेरे मध्य एक पुल बनाना है,
एक ऐसा मार्ग जो मुझे मेरे गंतव्य तक लेकर जाए,
एक संवाद ऐसा जिसमें मुझे शब्दों की अर्हता के सन्देह पर चलते हुए
बिना तुम्हारा हाथ थामे
तुम्हारे कहे शब्दों का अस्तित्व जानने की इच्छा भी शेष न रह जाने पाए
……
कल्पना सागर में डूबते हुए मेरी नई कल्पना है
कि चूल्हे पर चढ़ी किसी पतीली के भीतर पगती हुई खीर सी मैं
बस मौन रहूँ,
मन्थर आँच पर पकती, शब्दों की मिठास से परिपक्व रहूँ और जीवन की परीक्षाएं मुझमें स्वाद भरती रहें
एक दिन मैं पग कर तैयार हो जाऊँ

कुम्हार के आँवे से निकली किसी बर्तन सी हो जाऊँ

सम्पन्न होना है तुम्हारे यज्ञ की स्वष्टिकृत आहुति के हेतु

मुझे मौन सीखने के लिए
शब्दों की अनर्गलता पर नहीं बाँचनी कोई किताब,
न किसी सूक्ति के अनुवाद करने हैं ….

इतना समझ आया अब तक कि
शब्द बस छीनना जानते है, उपलब्ध कराना जानते हैं,
शब्द मुक्ति नहीं दिलाते, शब्द बोझ नहीं हटाते

मेरी आत्मा पर चढ़े बोझ को उतारने के लिए
मुझे तुमसे मौन हो जाने की दीक्षा चाहिए

एकलव्य होना है, मौन होना है….. इतना कि

नहीं करनी प्रतीक्षा सदियों बाद तक
न कोई आकर मेरे इस मौन को समझे,
सारे प्रश्नों के दलदल से इतर
आत्म मुक्त हो जाने के लिए मुझे मौन सीखना है, तुम से

मुझे मिट्टी सा मौन होना है

– प्रिया वर्मा

Facebook Comments
Tags: , , , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!