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जीवन, अध्यात्म का प्रकट रूप और अध्यात्म, जीवन का अप्रकट विस्तार

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ये जादू मेरे साथ अक्सर घटित होता है, किसी तस्वीर पर एकदम से दिल आ जाता है तो लगता है इस पर कुछ लिख डालूँ, या काश कोई इस पर कुछ लिख दे. या कई बार कोई विचार या वन लाइनर-सा दिमाग में कुछ कौंधता है, तो लगता है काश बस ऐसा कोई चित्र मिल जाए जो इसी के लिए बना हो… और ऐसा हो जाता है…

ऐसा ही जादू घटित हुआ जब किचन में चींटियों की लाइन देखी, तो विचार आया था –

“ये चीटियाँ नहीं, हम औरतें हैं, जो एक दूसरे के कान में न जाने जीवन का कौन सा मंत्र फूंके चली जा रही है सीधी रेखा में….”

और तब मैंने इस पर लेख और कविता माँगी थी… देवनाथ द्विवेदी जी ने अपनी 2015 में लिखी कविता दी, पढ़ते से ही लगा जैसे मेरी इच्छापूर्ति तो 2015 में ही हो गयी थी, प्रकट आज हुई है. आप भी अवश्य पढ़ें.

गाती हुई औरतें
—————————–
खाती पीती, बतियाती गाती
रूकती, मिलती, आगे बढ़ती
चढ़ती उतरती, गिरती संभलती
जोड़ती, गांठती, संग्रह करती
खरीदती, बेचती, मोल भाव करती,
सचमुच की चींटियाँ हैं हम!

हवाओं को सूंघती
अंधेरों को टटोलती
धरती नापती, खाइयाँ फलांगती
परिवर्तन के अंधड़ों से लड़ती
अपनापन बचाए रखती
क्या कुछ नहीं करतीं!
जीवट की चींटियाँ हैं हम!

खामोश, मेहनती
काम में लगी
अंडे बच्चे पोसती
चारा पानी जुटाती
सब कुछ झेलती, सहतीं
कमेरी चींटियाँ है हम

शृंग उठाये, युद्धोन्मादित
सुरक्षा सन्नद्ध
कटकटाती, काटती, लड़ती
सैनिक, सिपाही चींटियाँ हैं हम

पृथुल, अलमस्त, रमण-आतुर
मोनालिसा अनुकृति
पुरुष चींटों के लिए फेरोमोन उड़ातीं
स्वयंवर रचाती,
रानी चींटियाँ हैं हम

सभ्यता, संस्कार, स्वतंत्रता और स्त्री सशक्तिकरण

मर्यादाएं निभाती, नयी रचती
मन की सुनती, कुछ भी करती,
अपनी सफलता खुद चुनती
अपनी कथा खुद लिखती
अपना जीवन खुद गढ़ती
अपनी राह बनाती चींटियाँ हैं हम
और, अभी ज़रा और तो सुनो…… !!

चींटियों और औरतों के अलावा भी
जो जो हम चाह लेंगे…
वो सब कुछ हैं हम!

– देव नाथ द्विवेदी (22/11/15)

ऐसे ही जीवन में सारी योजनाएं आपके लिए पहले ही बन चुकी है. समय आने पर सिर्फ उसका प्रकटीकरण होता है. ये कुछ ऐसा ही है कि आप किसी फूल को देख कर प्रसन्नता अनुभव कर रहे हो, उसकी सुगंध में सराबोर होकर आनंदित हो रहे हो, उस फूल का ऊगना तो आपके देखने से पहले ही प्रारम्भ हो गया था. हाँ प्रकट आज हुआ है आपके सामने.

ऐसे ही जीवन में आपके द्वारा किये गए कर्मों के बीज आज पड़ रहे हैं, जिसे हम देख नहीं पा रहे लेकिन वही बीज जब वृक्ष बनकर फल देता है तब हम अचंभित होते हैं. फल अच्छा और मीठा हुआ तो खुश और आनंदित होते हैं, फल खराब निकला या कड़वा हुआ तो अपनी किस्मत को कोसते हैं.

इसलिए कभी कभी लगता है वर्तमान जैसा कोई पल नहीं होता. या तो आप भविष्य के गर्भ में हैं जिसे हम अतीत कह देते हैं या अतीत के स्वप्न में जिसे हम भविष्य कह देते हैं. हम दिखने वाले हर दृश्य को वर्तमान नहीं कह सकते, ये भविष्य की वो झलकियाँ हैं जिसके पूर्वदृश्य (FLASH BACK) में हम जी रहे हैं!

समय के परे होकर जब हम इन योजनाओं को थोड़ी दूरी से देखते हैं तो बहुत ही सूक्ष्म परन्तु सुलझी हुई व्यवस्था देखने में सक्षम हो पाते हैं.

इसलिए जीवन से और खुशियों से एकदम चिपक मत जाइए, उन्हें भी अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए थोड़ी सी जगह दीजिये. जिसे आजकल लोग Personal Space के नाम से अधिक समझते हैं. तो हर एक की अपनी चेतना होती है, अपना स्पेस होता है, उतनी दूरी तो आपको बनाकर चलना ही पड़ेगी.

तभी आप ब्रह्माण्ड की योजनाओं को समझ सकेंगे. इसे विकास शर्मा ने अधिक सुन्दर शब्दों और व्यावहारिक उदाहरण के साथ समझाया है.

विकास कहते हैं –

शेयर बाज़ार में लाखों निवेशक प्रतिदिन अरबों खरबों रुपयों का कारोबार कर डालते हैं. किन्तु बाज़ार की चाल क्या रहेगी, वह अब ऊपर की तरफ बढ़ेगा या नीचे उतरेगा, यह निर्धारित करने वाले केवल दो ही कारक है जिनका संबंध है निवेशकों के मनोविज्ञान से.

जब निवेशकों में सामूहिक भय (fear) बढ़ता है तो बाजार नीचे गिरेगा और सामूहिक लोभ (greed) बढ़ने पर बाजार ऊपर की ओर जाने लगता है. इसको समझना सरल है.

किन्तु बाज़ार की चाल कभी किसी शराबी की तरह बेतरतीब नहीं होती, बल्कि वह नृत्य करता है किसी नर्तक की तरह. इसी कारण टेक्निकल analysts बाज़ार की भावी चाल का अनुमान लगा पाते हैं. शराबी का अगला कदम कहां पड़ेगा इसका अनुमान लगाना असंभव है किन्तु किसी नर्तक की अगली मूवमेंट का अंदाज़ा शायद हम लगा पाएं.

Fibonacci series का golden mean ना केवल सुदूर आकाश में थिरकती आकाश गंगाओं में दिखाई देता है बल्कि समुन्द्र की लहरों से लेकर फूल पत्तियों में और भीषण चक्रवातों में भी यह पाया जाता है.

और तो और इस golden mean से अछूता शेयर बाज़ार भी नहीं है. भय और लोभ जैसी मानवीय संवेदनाओं से संचालित शेयर बाजार भी उसी धुन पर थिरक रहा है जिस पर समस्त ब्रह्मांड नृत्य करता है.

तो यदि बाज़ार की गतिविधियों के मूल में निवेशकों की चेतना है तो ब्रह्मांड का मूल तत्व (fundamental substratum) भी कोई चैतन्य तत्व ही होना सिद्ध होता है. जैसे निवेशकों के अभाव में बाज़ार लुप्त हो जाना चाहिए वैसे ही ब्रह्मांड भी केवल तब तक ही मौजूद है जब तक इसे अनुभव करने वाला कोई चेतनायुक्त जीव मौजूद हो.

लेकिन जैसे बाज़ार में चाल निवेशकों के collective fear और greed से आती है वैसे ही ब्रह्मांड अव्यक्त से व्यक्त होता है दो मानसिक विकारों के कारण, राग और द्वेष.

ठीक वैसे ही जैसे इस वक़्त आपको इस स्क्रीन पर जो भी लिखा दिख रहा है उसके पीछे केवल दो ही कारक हैं 0 और 1, अर्थात हां या ना.

ब्रह्मांड और हमारा अस्तित्व हां या ना के मध्य बुनी गई एक मैट्रिक्स है, बस.

एक साधे सब सधे….

तो ब्रह्माण्ड में सबकुछ व्यवस्थित और योजनाबद्ध है, ठीक इन चींटियों की कतार की तरह. जो अपनी रानी चींटी की सेवा में लयबद्ध होकर काम कर रही है. आप भी अपनी शक्ति स्वरूपा प्रकृति रानी को पहचानिए… तो आपको भी अपने जीवन में घटने वाली घटनाओं की लयबद्धता आसानी से समझ आ जाएगी.

बात भौतिकता से शुरू हुई थी, अध्यात्म पर ख़त्म हो रही है क्योंकि यहाँ भी वही बात लागू होती है कि जीवन या भौतिक जगत अध्यात्म का प्रकट रूप है और अध्यात्म जीवन का अप्रकट विस्तार…

– माँ जीवन शैफाली

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