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सीधे रस्ते की ये टेढ़ी सी चाल है…

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जीवन विविधता से भरा हुआ है और आज मुझे आप सबसे ढेर सारी अलग-अलग बातें करनी है….

तो मैं अपने किशोरावस्था से शुरू करती हूँ, बचपन मेरा बहुत यादगार नहीं रहा होगा इसलिए मुझे याद नहीं… वैसे भी ध्यान बाबा कहते है जब आप 14 वर्ष और 23 दिन की हुई थीं तब आपके जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव आया था… आपकी वास्तविक यात्रा तभी शुरू हुई थी… खैर आज बहुत अधिक आध्यात्मिक बात न करते हुए जीवन के कुछ सामान्य विषयों को लेते हैं –

तो जब मैंने किशोरावस्था में नया नया कदम रखा था तो मेरी चाल बड़ी गड़बड़ थी… वो कैसे? आगे बताती हूँ… पहले ये जानिये कि घर से किसी काम से निकले हैं या घर लौट रहे हैं तो मोहल्ला जहाँ से शुरू होता मेरी बहनें अपनी नज़रें और गर्दन नीचे झुका के चलने लगतीं।

नई नई बड़ी हुई थी तो उनको देखा देखी मैं भी उनकी नक़ल उतारने लगी थी, मुझे लगा शायद लड़कियों को ऐसे ही चलना चाहिए। लेकिन फिर ये बड़ा फालतू सा काम लगा। अरे इतना भी क्या शर्माना लजाना। फिर जो गर्दन उठी तो फिर किसी के सामने नहीं झुकी।

[LIFE LOVE LIBERATION]

यहाँ तक कि मेरी एक सहेली ने मुझे ताना मारते हुए कहा था – हाँ सच है यहाँ सब अपने ‘चाल-चलन’ से ही पहचाने जाते हैं। उसका इशारा दो तरफ था। पहला कॉलेज में मेरा लड़कों से बिंदास बात करना, किसी को पसंद करते हैं तो उस बारे में सखियों से बात साझा करना, या फिर मेरा यह कहना कि जब आप सुन्दर सी लड़की को इतने मुग्ध होकर निहार सकते हैं, सुन्दर सी पेंटिंग की तारीफ़ कर सकते हैं, फूल, नदी, पर्वत की सुन्दरता में निहाल हुए जाते हो तो किसी अच्छे से लड़के को देख लेने से ही ‘चाल-चलन’ पर शक क्यों होने लगता है। सुन्दरता का कोई लिंग भेद नहीं होता।

आकर्षण

और दूसरी मेरी चाल, जो सच में लड़कियों जैसी नज़ाकत भरी बिलकुल नहीं। क्योंकि मेरी नानी से मुझे एक शारीरिक त्रुटि विरासत में मिली है, उन्हीं की तरह मेरी दोनों टांगों की लम्बाई बराबर नहीं, दोनों में करीब आधा या एक इंच का फर्क है। मैं जब दोनों घुटने जोड़ती हूँ तो मेरे दाहिने पैर की एड़ी ज़मीन से ऊपर उठ जाती है। या फिर दोनों पंजे ज़मीन पर टिका दूं तो बायाँ घुटना आगे को आ जाता है।

इस वजह से शायद मेरी चाल आम लड़कियों की तरह नज़ाकत भरी न हो सकी, मेरे पंजे भी चलते समय बाहर की तरफ रहते हैं इसलिए चाल लड़कों की तरह बिंदास है। ये अलग बात है कि जब पहली बार रैम्प वॉकिंग की थी तो सबसे ज़्यादा तारीफ़ मुझे स्टाइलिश चाल के लिए ही मिली थी।

तो मुद्दा यह कि स्कूल कॉलेज में जब मैं चलती थी तो मेरी सखियाँ मेरी चाल का मज़ाक उड़ाती थीं, आज भी कुछ सखियाँ मज़ाक उड़ाती हैं.

हम गर्ल्स स्कूल में पढ़ीं लड़कियां जब कॉलेज में नई नई आई थीं तो सहेलियां पूरे समय सकुचाई सी शरमाई सी रहती। किसी लड़के ने बात कर ली तो मारे शर्म के ज़मीन में गढ़ जाती। और मैं अपने दोस्तों के साथ इतना बिंदास रहती कि कॉलेज में मेरे पापा दिख जाए तो दोस्त कोहनी मारकर बोलते। देख ससुरजी आ रहे हैं, क्योंकि पापा मेरे उसी कॉलेज में भौतिक शास्त्र के प्रोफ़ेसर थे।

और मैं भी कहती- तू गुटखा खाना छोड़ दे तो फिर सच में ससुर बना लेना उनको।

वो कहता चल चल, इत्ती सी बात के लिए कौन गुटखा खाना छोड़े, तू तो राखी ही बाँध देना। बहुत बरसों बाद वही दोस्त फेसबुक पर मिला, उससे सबसे पहले मैंने यही पूछा तूने गुटखा खाना छोड़ा कि नहीं?

बोला अब छोड़के भी क्या फायदा, अब तो मेरी खुद की उम्र ससुर बनने की हो गयी है। दो बेटियों का पिता हूँ उसने गर्व से कहा।

तो सबसे पहली बात जो मुझे कहनी है वह यह कि एक लड़के और लड़की में प्रेम से अधिक पावन दोस्ती का रिश्ता भी हो सकता है, उसे हमेशा एक ही नज़र से नहीं देखना चाहिए।

हालांकि यह किस्सा बीस साल पहले का है, लेकिन मैं आज भी उतनी ही बिंदास हूँ, जब किसी से बात करती हूँ तो इतनी ही प्यारी बातें करती हूँ।

[सारे नियम तोड़ दो, नियम पर चलना छोड़ दो]

आज भी अपने फेस्बुकिया दोस्तों से ऐसे ही बात करती हूँ। चल प्यारे, स्क्रीन शॉट मार के दिखा। और सामने वाला कहता है रहने दो, अव्वल तो चार लाइक भी ना मिलेंगे क्योंकि तुम तो कमेन्ट में भी सबसे इतने ही प्यार से बात कर आती हो लेकिन इधर मेरी बीवी मार मार के मेरे चेहरे की स्क्रीन खराब कर देगी।

तो दूसरी बात जो मुझे कहना है वह यह कि आपके रिश्ते में अगर अन्दर से सुन्दरता है तो वह बाहर प्रकट होने पर भी विकृत नहीं होगा। उसकी सुन्दरता बाहर भी उतनी ही खूबसूरती के साथ झलकेगी।

[सदमा : अंग्रेज़ी वर्णमाला का नौवां वर्ण ‘I’ यानी ‘मैं’ का खो जाना]

तो आजकल जो E-Friendship और E-Love का हव्वा बना रखा है उसे अपने-अपने गुणों के साथ आप चाहें तो सकारात्मक रूप से भी पल्लवित कर सकते हैं, हाँ सीमाएं सबकी अपनी व्यक्तिगत होती है, जिसे आपको खुद तय करना होता है, यहाँ कोई दूसरा आपकी सीमा रेखा नहीं बता सकता। इसीलिए तो मैं हमेशा कहती हूँ ये दुनिया आभासी नहीं, “आभा-सी” है। बस आपको अपने आभामंडल की आभा को थोड़ा मजबूत रखना होगा।

तो बात हमें यह नहीं करनी थी कि लड़कियों को शर्माना चाहिए या नहीं, लड़कों से किस हद तक बात करना चाहिए। बात मुझे यह भी नहीं करनी थी कि आभासी रिश्तों के बढ़ते प्रचलन का क्या करना है अचार बनाना है या मुरब्बा।

वैसे भी हमारी भावनाएं हमारे रिश्तों को सीमा में नहीं बांधती। उसे और विस्तृत करके निखारती ही है। हाँ तो बात मैं यहाँ चेहरे की सुन्दरता की कर रही थी… आप लोग है ना दूसरी-दूसरी बातों में बहुत उलझा देते हो…

तो सुन्दरता न महंगी क्रीम लगाने से आएगी, न फेशियल ब्लीच करने से। इसलिए उस पर पैसा बर्बाद मत कीजिये। थोड़ा बहुत सामान्य रख रखाव ठीक है लेकिन दमकती त्वचा के लिए महंगी क्रीम लगाना आवश्यक नहीं। मन महकता हो, चेतना ऊर्जा से दहकती हो। तो त्वचा अपने आप चमकने लगती है।

मन को आप निष्कपट, निश्छल और प्रेम से इतना भरा रखिये कि किसी दुर्भावना, कुंठा या ईर्ष्या को आने के लिए जगह न मिले।

जीवन में अच्छा बुरा जो भी हो रहा है, उसके पीछे रोते मत रहिये। किस वजह से हो रहा है, उसका जीवन में आगे क्या सदुपयोग है इस पर मनन कीजिये। जीवन की प्रत्येक… मैंने कहा ‘प्रत्येक घटना’ आपको और अधिक उन्नत करने के लिए ही घटती है, बशर्ते आप उसे सजग होकर साक्षी भाव से देखें।

पुस्तक “युगन युगन योगी” में सद्गुरु कहते हैं – हर पौधे को उपजाऊ भूमि पर होने के लिए कृतज्ञ होना चाहिए, यहाँ पर किसी भी प्राणी या छोटे से छोटे जीव जंतु या पेड़ पौधों को बंजर भूमि पर होने का अधिकार नहीं, यदि आपने जन्म लिया है तो आपकी वृद्धि निश्चित है.

तो यदि जीवन में कोई दुर्घटना भी हुई है तो उसका सकारात्मक पहलू खोज निकालें। बीमारियों से लड़ने के बजाय स्वास्थ्य से दोस्ती करें, सिर्फ ज़बान और पेट की सुनने के बजाय पूरे शरीर की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए भोजन करें। एलोपैथिक दवाइयाँ ना लें, आवश्यकता पड़ने पर ही आयुर्वेद की शरण में जाएं, ऐसा नहीं कि आयुर्वेद के सारे प्रयोग ये सोच कर खुद पर कर डालें कि इसका कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं होता। इफ़ेक्ट हर चीज़ का होता है। बस उसे अपने रास्ते में बीच में मत आने दीजिये। साइड में करते जाइए।

इसलिए जब E-Love के झंझट में पड़े हैं तो E-breakup भी होगा ही, अब सबकी किस्मत तो मेरे जैसी नहीं हो सकती ना जिनको स्वामी ध्यान विनय इस आभासी दुनिया के बदौलत ही मिले… (तो आखिर ये राज़ आज आपको पता चल ही गया कि क्यों मेरे लिए ये आभासी दुनिया “आभा-सी” है… )

हाँ तो बात सिर्फ चेहरे की सुन्दरता की भी नहीं है… तो क्या है? जीवन की सुन्दरता की है…

मान लीजिये आपका जीवन एकमात्र फिल्म है जिसमें आपको अभिनय करने का मौका मिला है और उसे आपको किसी भी कीमत पर बॉक्स ऑफिस पर सुपर डुपर हिट बनाना है, इसका गीत संगीत अब तक का सबसे मधुर बनाना है, इसकी कहानी सबसे जुदा और इंटरेस्टिंग बनाना है, तो आप क्या करेंगे?

आपकी फिल्म के आप ही निर्माता है और आप ही निर्देशक, हर समय भगवान् भरोसे मत रहिये। वो सिर्फ आपका फाइनेंसर है, वो अपनी सारी पूंजी लगा रहा है आप पर, लेकिन आप ही घटिया फिल्म बनाएंगे तो वो भी तो घाटे में जाएगा।

इसलिए जब मैं कहती हूँ कि सुन्दरता चेहरे से नहीं अंदर से झलकती है, तो ये तभी मुमकिन होगा जब आपका जीवन सुन्दर होगा। आप अन्दर से स्वस्थ और सुंदर हैं तो वो सुन्दरता यकीनन बाहर झलकेगी ही।

चलते-चलते कॉलेज की मेरी सबसे सुन्दर सहेली का एक और ताना सुनिए। यार, ना तेरी नाक अच्छी है, ना आँख अच्छी है, ना चाल अच्छी है। फिर भी ऐसी क्या बात है कि कल जब हम ग्रुप में खड़े थे, तो उस लड़के की तरफ तेरी पीठ थी, तो वो कॉलेज का सबसे हैंडसम लड़का कॉलेज छूटते समय मुझसे बाय करने के बजाय, मुझे इशारे से कह गया कि मैं उसकी तरफ से तुम्हें बाय बोल दूं?

मैंने मुस्कुराते हुए कहा – क्योंकि मुझे लगता है मेरी चाल के बजाय लोग मेरे चलन को पसंद करते हैं। जो मेरे चेहरे को नहीं चेतना को सुन्दर बनाता है। तो चाल भले कैसी भी हो अपने जीवन का चलन ऐसा हो कि हर कोई आपके नक्श-ए-कदम पर चलना चाहे… क्योंकि सीधे रस्ते की ये टेढ़ी सी चाल है…

मेरी सब बातें गोलमाल हो गयी ना? चलिए भूल जाइए मैंने क्या-क्या बकवास की, आप तो सद्गुरु की बात सुनिए सद्गुरु बहुआयामी कृष्ण के बारे में कहते हैं – “जब जैसा, तब तैसा”

जब सद्गुरु से पूछा गया कृष्ण एक प्रेमी थे या एक योद्धा?

सद्गुरु कहते हैं – उनकी कोई एक नीति नहीं थी। वह तो बस जीवन थे। जब जिस तरह से जीवन के साथ पेश आने की जरूरत पड़ी, वे उसके साथ उसी तरह पेश आए।

वे शांति, प्रेम और करुणा के साकार रूप थे। उन्होंने शांति स्थापित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब लड़ाई के मैदान में उतरना पड़ा तो वे एक शूरवीर योद्धा की तरह उतरे। जब राजाओं के दरबार में जाते, तो वहां वे एक कुशल राजनेता होते थे। जब अपनी प्रेमिका के साथ होते, तो वे एक शानदार प्रेमी होते थे। बच्चों के साथ होते, तो पूरी तरह से बच्चा बन जाते थे।

चाहे जैसी परिस्थिति हो, चाहे जैसे लोग हों, वे हमेशा उनके साथ सहज थे। क्योंकि जीवन का एक भी पहलू उनसे अछूता नहीं था। जीवन जिस रूप में भी उनके सामने आता, उसी रूप में वे उसे जीने को तैयार रहते, और उनकी यही बात उन्हें बेहद खास बनाती है। ऐसा नहीं है कि दूसरे आत्मज्ञानी लोगों को उनसे कोई कम अंर्तज्ञान था, लेकिन सामाजिक और व्यक्तिगत कारणों से हर किसी के जीवन में ऐसे अवसर और संभावनाएं नहीं थीं कि वे कृष्ण की तरह बहुआयामी हो पाते।

– माँ जीवन शैफाली

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