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पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे…

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रिश्ते खट्टे हो जाएं तो उसमें से थोड़ा जामन निकालकर बहती भावनाओं का दही जमा लेना, फिर उसमें थोड़ा सा मीठा प्रेम डालकर मीठी लस्सी बना कर या मिष्टी दोही बनाकर खुद भी खाना, औरों को भी खिलाना…

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी अप्रेल माह – पहला अंक

और हाँ, कहते हैं न कोई कुछ नया काम करने निकल रहा हो तो उसे दो चम्मच दही शक्कर खिलाकर भेजना चाहिए… यदि कोई आपको छोड़कर नया रिश्ता बनाने जा रहा हो तो ये प्रयोग तब भी कर सकते हैं….

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी अप्रेल माह – दूसरा अंक

दिमाग में गरमी अधिक चढ़ी हो तो उसमें थोड़ा सा शिकायतों का काला नमक और अनुभव का भुंजा पिसा जीरा बस चुटकी भर डालकर, ठंडी छाछ बनाकर पी लेना…

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी अप्रेल माह – तीसरा अंक

कहते हैं कोरा दही पेट के लिए ठीक नहीं रहता, उसमें शक्कर या नमक डालकर ही खाना चाहिए… तो जीवन भी कोरा अच्छा नहीं लगता… अच्छे-बुरे अनुभवों की शक्कर या नमक हो, तो ही स्वाद आएगा…

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी अप्रेल माह – चौथा अंक

Making India

और तन पर चाहे कितने भी सुर्ख रंग का कपड़ा लपेट लो मन उदास हो तो वो भी नहीं खिलेगा… और मन से सारे रंग फूट रहे हो तो सफ़ेद झक्क कपड़े पहने भी तन नाचने को करेगा…

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी मई माह – पहला अंक

जीवन में हर दिन एक आयोजन है, जिसके लिए परिस्थितियां निर्मित की जाती हैं ताकि आप आयोजन को उत्सव में बदल सको.

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी मई माह – दूसरा अंक

वैसे ही रचना के अवतरण के लिए भी पूरा आयोजन होता है, परिस्थतियाँ निर्मित की जाती हैं, जगह जगह संकेत छोड़े जाते हैं, फिर आपको वहां तक पहुँचाया जाता है, कुछ चीज़ें आप तक पहुंचाई जाती है, कुछ चीज़ों तक आपको पहुंचना होता है…

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी मई माह – तीसरा अंक

ऐसे में आपको अंधविश्वास की छलनी से छानकर, सख्त यथार्थ के कंकर बीनकर, शकुनों को पहचानने की क्षमता हासिल करना होती है…

बहुत सारे विकल्पों में से सबसे बेहतर चुनने का विवेक पाने के लिए कसौटी पर खरा उतरना होता है, बेहतर सिर्फ सुन्दरता या प्रभाव की दृष्टि से नहीं, बल्कि उचित पात्र तक ऊर्जा पहुँचाने के लिए…

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी मई माह – चौथा अंक

सबकुछ हासिल करने के बाद इस बात के लिए तैयार होना पड़ता है कि पाया-खोया कुछ नहीं, सिर्फ माया है, लेकिन इस माया को भी पूरे यथार्थ के साथ जीना होता है…

तब पृष्ठभूमि में चल रहे संगीत की पहचान होती है… चिड़ियों का चहचहाना, हवा का गुनगुनाना, दूर किसी मंदिर में ढोल का बजना और अंतरिक्ष से हृदय में उतरते ब्रह्म नाद के संगीत से चेतना में कम्पन्न होना… तब पग अपने आप थिरकने लगते हैं… नाचने लगता है मन मयूर… कोई वंचित नहीं रहता जीवन के इस नृत्य से, लेकिन अपने नृत्य में जो निपुण हो जाता है वह कृष्ण का रास हो जाता है, शिव का तांडव हो जाता है और फिर लोग कभी-कभी यह भी कह उठते हैं – पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे…

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी जून माह – पहला अंक

‘मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी’ भी विशेष रूप से मेरे लिए तैयार किया गया आयोजन है जिसे आप सबके साथ मिलकर उत्सव बनाने के लिए मैंने खुद को पूरी तरह से समर्पित कर दिया है. नए पड़ाव पर और भी नई चीज़ें मिलेंगी हमें अस्तित्व की ओर से जिसे देख देखकर हम अचंभित और कृतज्ञ होते रहेंगे, लेकिन फुर्सत के क्षणों में एक चक्कर पिछले उन सारे अंकों पर अवश्य लगाइयेगा जिन्होंने हमें यहाँ तक पहुंचाया है…

– माँ जीवन शैफाली

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी जून माह – दूसरा अंक

 

 

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