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बस एक दिन तुम लौट आना अपनी देह में…

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हर देवता में कुछ मानवीय गुण होते हैं और हर मानव में कुछ असुर तत्व, इससे हम उसे देवता या मानव होने से पदच्युत नहीं कर सकते। वैसे ही किसी पुरुष में स्त्री तत्व प्रबल हो जाता है, तो कभी किसी स्त्री में पुरुष तत्व प्रबल हो जाता है, तो हम उसे उसके पुरुष या नारी होने से पदच्युत नहीं कर सकते.

बस उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है। कभी कोई पुरुष नारी की तरह कोमल हृदय होकर समर्पण कर देता है तो कोई नारी पुरुष की भांति आक्रामक हो जाती है.

रेखा जन्मोत्सव की सीरिज़ लिखते हुए मुझसे कुछ लोगों ने रेखा और उसकी महिला सेक्रेटरी के बीच समलैंगिक संबंधों के बारे में पूछा था, तो मैं उपरोक्त बातों के द्वारा उसकी पुष्टि तो कर सकती हूँ, लेकिन साथ में ये भी कहना चाहूंगी, जब रेखा के जीवन में घटित हुई घटनाओं को प्रस्तुत करते हुए मैंने किसी भी पुरुष का नाम लिखने की आवश्यकता नहीं समझी, तो यहाँ पर भी मैं इस बात का ज़िक्र आवश्यक नहीं समझती.

सेलेब्रिटी का जीवन कितना भी सार्वजनिक हो जाए “कुछ” तो हर व्यक्ति का बहुत व्यक्तिगत होता है, जिसे पार करने का दुस्साहस हम उसकी आज्ञा के बिना नहीं कर सकते। सेलेब्रिटी ही क्यों किसी के भी जीवन की सीमा रेखा को पार करने का अधिकार हमें नहीं होता. हम बस सीमा के इस पार खड़े होकर उसे दोबारा अपने ही जैसा हो जाने के लिए प्रार्थना भर कर सकते हैं.

तो ये लेख एक प्रार्थना ही है उन महिला मित्रों के लिए और उनके लिए भी जो मित्र नहीं है, जो है तो नारी की देह में लेकिन उनका पुरुष तत्व इतना प्रबल हो चुका है कि वो कई बार भूल जाती हैं कि वो एक स्त्री है।

हमारे यहाँ अर्धनारीश्वर की अवधारणा है, जब दो शक्तियां अपने पूर्णत्व के साथ एकाकार होती हैं तो उनमें नर और नारी का भेद मिट जाता है फिर वो अर्धनारीश्वर हो जाता है। वे एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं। शिव के बिना शक्ति का अथवा शक्ति के बिना शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शिव अकर्ता है। वो संकल्प मात्र करते है; शक्ति संकल्प सिद्धी करती है।

लेकिन अर्धनारीश्वर बनने के लिए भी नर का पूरा पूरा नर और नारी का पूरा पूरा नारी होना आवश्यक है। तभी तो संकल्प सिद्ध हो सकेगा। वरना मामला अर्धनारीश्वर के बजाय ‘कुछ और’ हो जाता है.

एक बार कल्पना करके देखो उन किन्नरों के नारकीय जीवन की, जिनकी देह को बनाने के लिए प्रकृति ने हस्तक्षेप किया. और वो उसके हाथ की कठपुतली बनकर रह गए.. उनका अपनी ही देह पर कोई अधिकार न रहा… न वो खुद को पुरुष कह सकीं, न स्त्री…

मान लो तुम्हारी पुरुष हो जाने की इच्छा अगले जन्म में इतनी प्रबल न हो सकी और तुम स्त्री से पुरुष हो जाने की यात्रा में ऐसे ही किन्नर की देह में ही रुक गयी तो तुम्हारा अगला जन्म किस पीड़ा से गुज़रेगा तुम कल्पना नहीं कर सकती…

और अगला जन्म तो बहुत दूर की बात है, जो लड़कियां इस पागलपन में अपना लिंग परिवर्तन करवाने जैसा दुष्कर्म कर बैठती हैं, आप जानते हैं उनमें से अस्सी प्रतिशत ओपरेशन असफल हो जाते हैं, वो फिर ना स्त्री रह पाती हैं ना पुरुष और बीच की अवस्था क्या कहलाती है मुझे ये बताने की ज़रूरत नहीं…

ये सिर्फ फैशन और पुरुषों से बराबरी का दर्जा पाने का पागलपन होता तो भी मैं समझ सकती थी, लेकिन यहाँ मामला भावनाओं की विकृति का है. स्त्री देह का पुरुष देह के प्रति आकर्षण शाश्वत सत्य है, परन्तु स्त्री का स्त्री देह के प्रति आकर्षण उन नीली कामनाओं का दुष्परिणाम है जिसे पोर्न कहकर उत्तेजनाओं के बाज़ार में एक उत्पाद की तरह उपयोग किया जा रहा है.

इन्टरनेट पर बढ़ती इस तरह की सामग्री और LGBT Community का खुला प्रचार, जिसे बेशर्म प्रचार कहना अधिक उचित है, ने सिर्फ देह को ही नहीं भावनाओं को भी विकृत किया है.

ईश्वर ने स्त्री बनाकर भेजा तो किसी उद्देश्य से ही भेजा होगा, हम कैसे उसकी रचना में हस्तक्षेप कर सकते हैं. इस चीज़ को बढ़ावा उन NGOs के माध्यम से भी मिल रहा है जो ऐसे लोगों को जीने की आज़ादी के नाम पर सहायता देते हैं… जो अपनी प्रकृति से विकृत हो चुका है, ऐसे किसी विकृत स्वभाव वाले के समर्थन में जब कोई संस्था खड़ी हो जाए तो ऐसा समाज बर्बादी की किस कगार पर खड़ा हो गया है आप कल्पना नहीं कर सकते…

और गलती उन माता पिता की सबसे पहले हैं, जो लड़का और लड़की समान की आधुनिक परिभाषा के चलते लड़कियों को बचपन से ही लड़कों के कपड़े पहनाने लगते हैं या लड़कों की तरह उनके साथ व्यवहार करने लगते हैं… उन्हें खुद नहीं पता कि लड़का और लड़की कभी बराबर नहीं हो सकते, यदि वो शारीरिक स्तर पर भिन्न है तो आत्मिक स्तर पर भी… उन्हें भिन्न ही रहने दो आपकी बराबरी की चाह ने आपकी ही संतान का जीवन बर्बाद कर दिया है.

अधिकारों के स्तर पर समानता दीजिये, जीवन शैली कैसे समान हो सकती है… उन्हें शिक्षा और संस्कार के रूप में समानता दीजिये… जब प्रकृति ने ही उन्हें भिन्न बनाया है तो आप कौन सी समानता की बात करते हैं… हमारे यहाँ जहाँ कन्या को देवी रूप में पूजा जाता है, उन्हें आप खींचकर नीचे ला रहे हैं… ये कैसी समानता है!!

औरत और मर्द की परस्पर निर्भरता और औरत को प्रकृति द्वारा कोमल बनाने के पीछे के निहतार्थ समझ आ जाए तो सारे नारी विमर्श को पूर्ण विराम लग जाए… औरत को मर्द की बराबरी का हिस्सा न प्रकृति ने दिया है न ये समाज दे सकता है….. क्योंकि बात यहां बराबरी की है ही नहीं… क्यों हम मर्द को औरत से ऊपर मानकर उससे बराबरी के दौड़ में शामिल हो जाए… औरत को यदि वो जो है उस-सा बनने देने की आज़ादी मिल जाए तो ही बात बन जाए… लेकिन ताकत और ओहदे को मर्द का प्लस पॉइंट मानने वाले समाज और खुद मर्द इस बात को नहीं समझ सकते… औरत खुद भी समझ जाए तो बड़ी बात है….

तो प्रिय सखी, इस कम्युनिटी ने जो खुद को सतरंगी घोषित किया है ना ये तुम्हारे जीवन के सारे रंग सोखकर लिए गए हैं… एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर पूछना खुद से… क्या इस सतरंगी दुनिया की चकाचौंध के पीछे आते स्याह अँधेरे का यह डर तुम्हें नहीं सताता कि अपने अनिश्चित भविष्य की गर्त में विकृत हो रही देह कहीं पुरुषत्व पाने की प्यास के कारण मातृत्व से भी वंचित न हो जाए…

सखी, बस एक दिन तुम लौट आना अपनी देह में। प्रकृति दुल्हन के रूप में ही जीवन की निरंतरता बनाए रख सकती है, पुरुष को शक्ति दे सकती है। पुरुष होने के लिए एक जन्म और प्रतीक्षा कर लो। वैसे भी कहते हैं आपकी कोई इच्छा इतनी प्रबल हो और इस जन्म में पूरा होना संभव न हो तो अगले जन्म में अवश्य पूरी होती है…

कहते हैं स्त्री के बजाय पुरुष देह में मोक्ष जल्दी मिलता है। सद्गुरु एक पुस्तक “युगन युगन योगी” में बताते हैं कि उनकी साधना के समय कुछ अशरीरी लोगों को उनके अनुयायी लोग देख सके थे। वो एक औरत थी लेकिन मोक्ष की कामना इतनी तीव्र थी कि उस अशरीरी आत्मा के चेहरे पर भी दाढ़ी उग आई थी।

इस लेख की शुरुआत रेखा से की है अंत भी उसी की बात से करूंगी… कि चाहे दैहिक स्तर पर रेखा ने जीवन में कितने ही परिवर्तन और अनुभव ग्रहण किए हो लेकिन वो हमेशा एक तटस्थ आत्मा रही है. एक सम्पूर्ण नारी… एक पूर्ण पुरुष की प्रतीक्षा करती हुई, वो उसे जिस भी जन्म में मिलेगा, मुझे विश्वास है शिव और शक्ति के मिलन की तरह अर्धनारीश्वर की अवधारणा की पुष्टि करेगा… संकल्प सिद्धी की तरह.

तो हे सिद्धी! अपना नारी होना सिद्ध करो… लौट आओ अपनी देह में … गर्व करो… पुरुष बनने की चाह में तो फिर भी तुम्हें कुछ अंग विशेष को छुपाना होगा, लेकिन नारी होकर नग्न भी हो जाओगी तो अजंता की मूरत कहलाओगी…

– माँ जीवन शैफाली

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