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लक्ष्मी और दुर्गा का ब्रह्माण्डीय नृत्य

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संसार में भाषा का आविष्कार करने वाले कौन थे, ये तो मैं नहीं जानती लेकिन इतना मैं यकीन से कह सकती हूँ कि अविष्कार के बाद इसका सबसे अधिक उपयोग और उस पर प्रयोग लड़कियों ने किया होगा…

बातें करती हुई लड़कियों को कभी ध्यान से देखा है? उनका सारा संसार उनके संवाद की डोर पर आ बैठता है और वो उस डोर पर रस्सीकूद खेलती हुई न जाने कितने विषयों को अपने आसपास उछाल देती हैं…

उन सांसारिक विषयों से ही उनके आसपास एक ऐसा आभामंडल तैयार हो जाता है जिसमें प्रवेश करने को देवता भी तरसते होंगे… विषय को विकार समझ कर देवताओं के गीत गाने वाले क्या जाने आखिर मुक्ति के लिए देवताओं को भी इसी मनुष्य रूप में ही तो आना है ना…

वैसे बातें कोई बहुत बड़े विषयों पर नहीं होतीं, लेकिन उनके छोटे-छोटे अनुभव ही उनके लिए विराट संसार होते हैं…

हम दोनों वही दो बातें करती हुईं लड़कियां हैं… जिनके आसपास का संसार हमारे पांवों की थाप पर नृत्य करता है, जिसकी तरंगे इतनी ऊंची जाती हैं कि न जाने कितनी ही योगिनियां अपने लोक छोड़कर हमारे सामने अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर साथ में नृत्य करने लगती हैं…

मैं उम्र में और कदाचित अनुभवों में भी उससे बड़ी हूँ… मैंने योगिनियों के अनगिनत स्वरूपों को अपने आसपास नृत्य करते देखा है… उनका रौद्र रूप भी और उनकी परम करुणा भी… लेकिन वह अभी अपने आध्यात्मिक अनुभवों से गुज़र रही है… शक्ति के सारे स्वरूप के दर्शन के अनुभवों को भोगते हुए अपने आत्मिक बल, ध्यान और साधना से चेतना को उच्च से उच्चतर आयामों में प्रवेश करवाना सीख रही है…

छोटी है तो कभी-कभी भयभीत भी हो जाती है… तो दौड़ी चली आती है मेरे पास… लेकिन वह आज भी मुझसे इस बात के लिए नाराज़ है कि आप पिछली दीपावली पर आपके नगर आने पर भी मुझे मिली नहीं, मेरे प्रश्न का उत्तर देना तो दूर पूरा प्रश्न सुना तक नहीं…

मैं जवाब देना चाहती हूँ कि योगिनियों के प्रकट होने का अपना समय होता है, उचित नक्षत्रों और ग्रह दशाओं के पहले मिलना कभी-कभी मनोनुकूल नहीं होता… लेकिन उसके मन का फिर भी न हो सका… पिछले जन्म की लड़ाइयां जो बाकी थीं हम दोनों के बीच, वह समय समय पर होती रहीं… वो झूठ मूठ का गुस्सा दिखाकर भी अपने सच्चे प्रेम को भूल न सकी…

कैसे भुलाती, पिछली दीपावली पर ना मिल पाने का उलाहना माँ काली को देकर आई थी… और साथ ही चुनौती देकर आई थी उस महामाया को कि देखना इस दीपावली ना सही किसी न किसी दीपावली को मैं अवश्य उनके साथ होऊंगी…

जीवन में ध्यान की जिन ऊंचाइयों पर बैठी वह कभी भाग्य को, तो कभी समय को चुनौतियां देती फिरती है, सरस्वती भी उसकी हठ और प्रेम के वशीभूत निकले शब्दों पर विराजित हो जाती है…

और फिर इस वर्ष उसकी चुनौती के आगे हार मानते हुए महामाया ने दीपावली के दिन उसे मेरे पास भेजा…

कुछ संताने माँ को बहुत प्रिय होती हैं .. हम दोनों उसी महामाया की ज़िद्दी, सरचढ़ी संतान हैं… सारे कष्ट भोगकर भी ना अपना स्वभाव छोड़ती हैं, ना माँ का आंचल.. और महामाया कहती हैं… दोनों मेरा ही तो रूप हो… एक लक्ष्मी, दूसरी दुर्गा अष्टमी को जन्मी दुर्गा…

दीपावली के दिन दुबारा उससे मिलना महामाया की बहुत अद्भुत योजना थी, क्योंकि उससे पहली मुलाक़ात पर मैंने उसे लक्ष्मी ही कहकर पुकारा था… और इस दीपावली को उसका अचानक यूं दुबारा आ जाना लगा जैसे दीपावली पर लक्ष्मी का आना तो तय ही था…

पहली भेंट पर मैंने उस पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं, जो कुछ यूं थी…

मेरे घर लक्ष्मी आई है…

“Soul Family” यही कहा था उसने जब हम एक दूसरे से जुड़ने लगे थे… कोई रिश्ता है ये तो जानती थी लेकिन उस मोहिनी के मोह में फंसना नहीं चाहती थी… जानती थी आएगी तो फिर मुझमें संसार का विस्तार कर जाएगी… इसलिए उसकी पहली यात्रा पर उससे मिलना टालती रही… वैसे भी मेरी मुलाकातें मैं कहां तय करती हूँ..

और फिर जैसा कि हमेशा कहती हूँ – जिनको जिनको भी मिलना है लिखा इश्क़ मिलवाएगा , दूर दूर से ढूंढ ढूंढ के पास ले आएगा….

मुलाक़ात का समय आया तो सबसे पहले मैं ही गयी दरवाज़े तक दौड़ लगाकर… घर में प्रवेश के बाद तो सिर्फ तुम्हारी वास्तविक ऊर्जा ही अनुभव होगी, उसके पहले अपनी इस बच्ची को गले तो लगा लूं…

दोनों गले मिले तो मुझसे पहले उसने ही कह दिया… अरे आप तो बिलकुल बच्ची लगती हो… और मेरे मुंह से यही निकला… लग रहा है जैसे एक दूसरे से रूप बदल लिया…

कहते हैं हर मनुष्य की चेतना किसी न किसी दैवीय शक्ति से संचालित होती है. उसके स्वभाव और व्यक्तित्व पर उस ऊर्जा का आभामंडल अनुभव किया जा सकता है.

उसके घर आने से पहले ही उसके आ जाने की आहट अनुभव करने लगी थी… अरे लक्ष्मी के आगमन का समय आ गया है…

कहीं पढ़ा था लक्ष्मी को हमेशा प्रेमिका के रूप में पूजना चाहिए… लेकिन वो तो साक्षात प्रेम है… कोई रूप देना प्रेम को सीमित कर देने जैसा है… इसलिए खूब देर तक उससे दूर से ही बात करती रही… लगा हाथ लगाऊँगी तो मेरे हाथ का मैल हो जाएगी…

लेकिन फिर रहा नहीं गया… चुपके से उसके पीछे जाकर छुप गयी… और उसने अपने दोनों हाथों से ऐसे थाम लिया जैसे यदि मैं संसार हूँ तो वो उसका विस्तार है… वो प्रेम है तो मैं प्रेमिका… और हम दोनों को जो एक साथ देखेगा वो तय नहीं कर पाएगा कौन लक्ष्मी है और कौन दुर्गा…

कहते हैं ब्रह्माण्डीय स्तर पर दो ऊर्जाएं जब सहस्त्रों योजन की दूरी तय करके एकाकार हो जाती हैं, तब उनका दुनियावी स्तर पर कुछ किलोमीटर की दूरी तय कर मिलना आवश्यक नहीं होता. कुछ बातें मायावी रूप में प्रकट होकर रहस्य रूप में सदा छुपी रहें तो ही उनका सौन्दर्य बना रहता है.

तो कुछ रहस्य मैं उससे हमेशा छुपा जाती हूँ… वह उसकी यात्रा का हिस्सा है जो उसे खुद ही चलकर तय करना है… लेकिन कुछ संकेत मुझे स्वप्न जगत से निरंतर मिलते रहते हैं… इस दीपावली की रात लक्ष्मी मेरे घर ठहरी थी और मैंने स्वप्न में देखा हम दोनों की चेतनाएं दिये की लौ की भांति लहरा रही हैं… तब जानती नहीं थी उसका क्या अर्थ है…

आज यह लिखते हुए अनायास ही ये आभास हुआ जैसे हमारी चेतनाएं महामाया की ऊर्जा पर सवार नृत्य कर रही थीं… ब्रह्माण्डीय नृत्य, जो जब संसार में मेरे शब्दों में प्रकट होगा तो न जाने कितनी ही योगिनियां प्रकट संसार से हमारे इस नृत्य में सम्मिलित होकर उस ऊर्जा पर सवार होने को आतुर होंगी… जहाँ हम एक स्वर में कह सकेंगी…

बरसों से सोई चेतना को जगाने
देवता षडयंत्र रचते हैं
और हम षडयंत्र के विपरीत माया रचकर
जीवन बनी रहना चाहती हैं…

हम योगिनियां इश्क का प्रेत निगल कर
देवताओं को कोसेंगे
और देवता हाथों में फूल लिए खड़े होंगे
कि हम माया से मुक्त हों तो
मोक्ष की गोद में सो सके…

– माँ जीवन शैफाली

अंगरेज़न : जंगल की रानी

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