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कृष्ण : विरह का अनंत अनुराग

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बरसों पहले देखा एक तैलचित्र अब तक मेरी स्मृति में सो रहा है । भगवान कृष्ण का वह चित्र महाभारत युद्ध के बाद का था, संभवत: राजा रवि वर्मा का बनाया हुआ । बात चूंकि बहुत पुरानी हो चुकी है इसलिए पक्के तौर पर नहीं कह सकता । चित्र अपनी गरिमा और गुणधर्म में रवि वर्मा की कला से मिलता जुलता था ।

रणभूमि में हजारों शवों के बीच कृष्ण अकेले खड़े हैं और सीने पर हाथ रख कर स्तंभित देख रहे हैं । भाव यह कि अरे यह मैंने क्या कर दिया ! अथवा इस महाविध्वंस को रोका जा सकता था। वह दृष्टि चित्रकार की अपनी थी। निश्चय ही चित्र को बनाते हुए गांधारी और कृष्ण के संवाद उसके मन में कौंधे होंगे। जब शोकसंतप्त गांधारी कृष्ण को शाप देने को उद्यत होती हैं और वे कहते हैं कि माता हर बार मैं ही तो मरा हूं! हर घाव मेरा ही है!! हर रिसती हुई आत्मा का अंश मैं ही हूं !!! क्या तुम्हारे पुत्र और क्या पांडवों के पुत्र और क्या जन सामान्य?

कृष्ण अपने नाम के अनुरूप जीवन भर अंधकार का वहन करते हैं। दूसरों को प्रेम से प्रकाशित कर स्वयं अंधेरे में निर्वासन की नियति को स्वीकार लेते हैं। क्या है कृष्ण का जीवन?

प्रेम उनके लिए एक लीला है। राधा से प्रेम, गोपिकाओं से प्रेम, सब कुछ तो विरह का अनंत अनुराग है। वे उस प्रेम में गहरा धंसते हैं, इतना गहरा कि गोपियां कृष्णमय हो जाती हैं, राधा सर्वस्व भूल जाती है लेकिन उनका जीवनयोग इतना कठोर है कि वे क्षण भर में स्थितप्रज्ञ संन्यासी की तरह सबकुछ छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं।

और उनके संपर्क में आने वालों की आत्मा गहन अंधकार में डूब जाती है। एक झटके में जीवन स्नेह के शुक्ल पक्ष से विरह विदग्ध कृष्ण पक्ष में भटकने लगता है। यह दुख एकतरफा नहीं है। क्योंकि लीलापुरुष लीला करते हुए एक आम मनुष्य का जीवन जीता है। उसके सारे सुख-दुख अपने होते हैं। भोगे हुए। पर अंत तो हमेशा अंधतम होता है। कृष्ण का अर्थ ही वियोग है। वे किसी को समूचा नहीं मिलते। न अपनी माता को, न अपनी प्रिया को, न अपने सखा को।

कृष्ण महाभारत युद्ध रोकने के अथक प्रयास करते हैं। यहां तक कि पांडवों के सम्मान के लिए पांच गांव तक की हीन प्रत्यास्थता उन्हें स्वीकार है लेकिन यहां भी युद्ध का अंधेरा ही उनके जीवन का हिस्सा है। मानवता के इतिहास का सबसे भीषण युद्ध जिसके साक्षी स्वयं कृष्ण हैं।

राम और कृष्ण बहुत भिन्नता होते हुए भी करुणा के स्तर पर गज़ब का साम्य है। कृष्ण तो राम से भी आगे बढ़ जाते हैं। उन्होंने तो अपने जीवन में उनके भी अपमान सहे जो बहुत साधारण थे। उन्हें दंडित भी तभी किया जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा।

कृष्ण जिन-जिन के जीवन में आए वे सब उनके ही होकर गए। सभी गोपिकाएं, राधा, द्रौपदी, दुर्योधन की पत्नी भानुमति सभी उनसे प्रेम करती रहीं। लेकिन वे सब कृष्ण को पा नहीं सकीं । कृष्ण को कोई पा नहीं सका। कृष्ण के जीवन में सभी धारस्थ रहे और वे स्वयं धारस्थ होकर भी तटस्थ होने का असाध्य काम करते रहे। परित्यक्त प्रेम का ऐसा अनन्य उदाहरण विश्व साहित्य में नहीं मिलता।

हद तो यह कि जिस जरासंध से दूर होने के लिए वे मथुरा से द्वारका चले गए वो द्वारका भी उनकी न हो सकी। और कृष्ण की मृत्यु! एक ब्याध के हाथों? शुरू से अंत तक देखें तो उऩके हिस्से में कुछ नहीं आता है। उन्होंने सिर्फ गंवाया है। बाल्यकाल से लेकर जीवनांत तक। हर बार प्रेम किया, हर प्रेम को त्यागा। सिर्फ अंधकार! गाढ़ा, स्याह अंधकार है उनके जीवन में।

लेकिन वह अंधकार इतना अनुरागी, इतना प्रिय कि सोचते हुए ही रोम-रोम पुलकित हो जाता है। कृष्ण प्रेम की पीड़ा एक अव्यक्त अनुभव है। जिसे मैंने खुद वृंदावन में केसी घाट पर खड़े होकर भोगा है। वहां के भग्न भवनों के पास, घाट पर इधर-उधर। ऐसा लगता है जैसे टीस की एक टेर है, छूटी हुई जो छिटक कर हमारे भीतर धंस गई है।

– देवांशु झा

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