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हम तो ऐसे हैं भैया

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ज्ञान और शिक्षा में अंतर उतना ही है जैसे आत्मा और शरीर में है. आत्मा अपने पूर्व जन्मों से कुछ ज्ञान लेकर आती है जैसे एक बना बनाया घर हो और जन्म के बाद शिक्षा का अर्थ कुछ यूं है जैसे उस घर को सुन्दर बनाने के लिए सजावट का सामान.

तो आपसे मिलते ही सबसे पहले लोगों की नज़र आपके घर की सजावटी वस्तु पर जाती है…

अरे आपके घर में आप कूलर चलाते हैं, आपके पास AC नहीं है?
ओह! अभी तक आप पारंपरिक रसोई घर में खाना बनाते हैं, आपके यहाँ मोड्यूलर किचन नहीं?
आपका सोफा सेट बहुत पुराने ज़माने का है आपको नया चाइनीज़ फर्नीचर लगवाना चाहिए…
आपके पास शेल्फ में कोई एंटिक पीस नहीं, आप तो अभी तक दरवाज़े पर परम्परागत रंगोली ही बनाते हैं…

उनके हिसाब से आपके पास वो सब होना चाहिए जो फैशन में है… चाहे आपका घर कितना ही छोटा क्यों न हो…

मुझसे अक्सर लोग ऐसे ही सवाल करते हैं, आप वामपंथी मीडिया से क्या समझते हैं? आपने वामपंथ का कितना अध्ययन किया है? आप वज़न सम्बंधित लेख क्यों लिखते हैं, सकल घरेलू उत्पादन बढ़ाने में इसका क्या योगदान? आपने हॉलीवुड सिनेमा कितना देखा है आप कैसे किसी फिल्म की समीक्षा लिख सकते हैं? आप अंतरिक्ष विज्ञान के बारे में क्या जानते हैं…

उनका सीधा उद्देश्य आपको अज्ञानी साबित करने का होता है, एक ने तो यहाँ तक कह दिया आप परम कॉपी पेस्ट हैं.

ऐसे में आप क्या करते हैं, आपके अहम् पर चोट लगती है, आप तुरंत प्रतिक्रिया देने लग जाते हैं… और अपने सीमित ज्ञान के प्रदर्शन में लग जाते हैं…

“ये फंसी मछली जाल में…” सामने वाला यही सोच कर आपकी बुद्धि पर मुस्कुरा रहा होता है…

यहाँ आपकी शिक्षा काम नहीं आएगी… सजावटी वस्तुएं सिर्फ घर सजा सकती है, घर की नींव आपके ज्ञान से मजबूत होगी तो घर का मजबूत होना आवश्यक है, सर पर छत रहेगी तो सजाने के लिए पूरी उम्र पड़ी है…

तो ऐसे में, मैं तुरंत अपनी हार मान लेती हूँ… जी मुझे तो कुछ भी नहीं आता… क्योंकि मेरी शिक्षा उस क्षेत्र में नहीं है तो मुझे सच में कुछ नहीं आता… हम तो पहले ही हारे बैठे हैं, आप हमें क्या हराएंगे.

यदि मुझे सारे विषयों पर लिखना आता होता तो मैं अकेली सारे विषयों पर लिख देती. लेकिन फिर वो भी पाठक के लिए बहुत उबाऊ होता. क्योंकि हर व्यक्ति की एक विशेष लेखन शैली और अपना शब्दकोष होता है वो बस उसी का उपयोग करता है, या कभी कभी उसमें थोड़े बहुत फेर बदल कर प्रयोग करता रहता है.

इसलिए मेकिंग इंडिया के माध्यम से मैंने अलग-अलग विषयों पर लिखने वाले महारथियों को एक जगह इकठ्ठा किया है. अब मैं न तो विज्ञान पर पूरी तरह लिख सकती हूँ, न वामपंथ पर, न हिंदुत्व पर, न अध्यात्म पर. क्योंकि हर विषय अपने आप में बहुत विस्तृत होते हैं.

किस विषय को आप छोटा कहेंगे? ऐसा कौन सा विषय है जिसे आप सिर्फ एक लेख में पूरी तरह से समाहित कर सकते हैं?

तो यदि आप लेखन के क्षेत्र में हैं तो दो तरह के लोग मिलेंगे, एक जो आपसे ज्ञान में कम है लेकिन शिक्षा इतनी गहन है कि किसी विशेष विषय पर उनकी पकड़ अच्छी होगी.

दूसरे जिनके पास ज्ञान है लेकिन शिक्षा उतनी नहीं हुई है तो वो कम से कम अध्ययन के बाद भी पर्याप्त सन्देश पाठक तक पहुंचा देते हैं…

तो यदि आपके घर में सजावटी सामान कम है तो समय और आर्थिक स्थिति के अनुसार आप उसे कभी भी सजा सकते हैं, लेकिन यदि आपका घर ही कमज़ोर होगा तो सारे सजावटी सामान के साथ भी वो भरभरा के गिर पड़ेगा.

और हाँ आपके अन्दर लेखन प्रतिभा है, तो आप दुनिया के किसी भी विषय पर थोड़े से अध्ययन से लिख सकते हैं. लेकिन वो लिखना आपके मन का होना चाहिए, किसी के उकसावे पर नहीं. यहाँ आप किसी की अपेक्षा पर खरा उतरने के लिए नहीं लिख रहे, बल्कि अपने मन की मौज के लिए लिख रहे हैं.

इसलिए आपसे बेहतर लिखने वालों को देखकर मन में कभी भी यह ख्याल न आने दें कि मैं ऐसा क्यों नहीं लिख सकता. बल्कि आपके पास जो ज्ञान है उसका समुचित उपयोग कर जितनी सकारात्मक रचना आप कर सकते हैं कीजिये.

ताकि लोगों का ध्यान सजावट पर नहीं घर की रचना पर जाए और लोग पूछने के लिए मजबूर हो जाए… जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा.

अपनी सुन्दरता को पहचानिए, आत्म मुग्धता हमेशा अच्छी होती है, खुद पर गर्व करना सीखिए. आपके जैसे दुनिया में आप अकेले हैं कोई आपके जैसा नहीं हो सकता…

वैसे ये दुनिया ऐसी है कि लोग फिर भी बाज नहीं आएँगे… फिर आपको उकसाने का प्रयास करेंगे… तो ऐसे लोगों के मुंह पर प्यारी सी मुस्कान फेंकिये और कहिये हम तो ऐसे हैं भैया…

इस विषय पर स्वामी ध्यान विनय ने बहुत सुन्दर व्याख्या की है इसे अवश्य पढ़िए….

ध्यान बाबा कहते हैं –

ग्रन्थ क्या हैं? जाने हुए सत्य.

अब दूसरों के जाने हुए सत्य को ही आप अपना सत्य मान लेंगे?

ग्रंथों का महत्व सिर्फ इतना कि भाई, भरोसा रखो ऐसा कुछ होता है. बाक़ी सत्य का अन्वेषण तो खुद ही करना है.

कोई भौतिक जगत के विज्ञान का मामला तो है नहीं कि एक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का नियम खोज लिया और बात ख़त्म, अब मुझे ज़रुरत नहीं उसे खोजने की, फिजिक्स की किताब में पढ़ ली बात और समझ ली.

प्रत्येक व्यक्ति भिन्न है, सो उस तक पहुँचने के उसके तरीके भी भिन्न होंगे.

अगर नहीं तो फिर पढ़िए ग्रन्थ और पहुँच जाइए. लेकिन कितने पहुंचे आज तक ‘सिर्फ’ ग्रन्थ पढ़-पढ़ कर?

और अगर यही करना है तो ग्रन्थ पढ़ने जितना श्रम भी क्यों करना. आजकल शहर-शहर घूमते हैं प्रवचनकर्ता, उनको जाकर सुन लेने से भी प्राप्ति हो जाएगी. ये भी नहीं तो टीवी पर चल रही हैं बहुत सी दुकानदारियाँ.

सब खुद को बहलाने की बाते हैं, दूसरों को धोखा देते देते हम इतने माहिर हो गए हैं कि खुद को भी चकमा दे लेते हैं. कोई ग्रन्थ पढ़ लिया, गीता रट ली, किसी सत्संग में शामिल हो गए, किसी बाबाजी से दीक्षा ले ली और ऐंठ गए धार्मिक होने के गुरूर से.

कोई नहीं पहुंचा ‘सिर्फ’ ग्रन्थ पढ़ लेने से. यात्रा की शुरुआत में ये ग्रन्थ आश्वासन देते हैं कि शुरू करो सफ़र, ऐसा हो सकता है, हमें हुआ है. और यात्रा ख़त्म हो जाने के बाद ये आपके गवाह होते हैं…. बस….”

और हाँ, ये जानने जैसी नहीं, समझने जैसी बात है, ज़रा सा गौर से देखिए, मैंने लिखा है ‘सिर्फ’ ग्रन्थ पढ़ लेने से….. सिर्फ पढ़ते रहने से आपको वो पुस्तक रट जाएगी. पर जीवन में कुछ घटित होता नहीं पुस्तकें रटने से.

आप प्रेम शास्त्र की पुस्तकें पढ़ते है, खूब पढ़ते हैं, पर क्या इससे आपके अनुभव में आ जाता है कि प्रेम क्या है. आप जान लेंगे उन परिभाषाओं को प्रेम की, जो इन पुस्तकों में होंगी. इतने मात्र से क्या प्रेम आपके जीवन में घटित हो जाएगा?

तैराकी सीखने के लिए तैराकी से सम्बंधित किताबें पढ़ने से ज्यादा ज़रूरी है पानी में उतरना. फिर किताबें ना भी पढ़ी होंगी तो भी सीख जाएंगे और अगर पढ़ी होंगी तो समझ जाएंगे उन किताबों की व्यर्थता.

किताबें पढ़ने वालों को अकसर भ्रम हो जाता है कि वे सब जान गए हैं. जबकि उन्होंने सिर्फ कुछ सूचनाएं एकत्रित कर ली होती हैं और अनुभव शून्य होता है.

अब बात मेरे पहुँचने की…..

मैंने पहले ही बताया यह कोई इतनी मुश्किल बात नहीं, जिसे समझने के लिए कहीं पहुँचना ज़रूरी है. मैंने बताया आपको कि ये जानने जैसी नहीं, समझने जैसी बात है.

मेरे पहुँचने अथवा ना पहुँचने से आपके जीवन पर कोई अंतर पड़ने वाला नहीं, बिल्कुल इसी तरह आपके पहुँचने, ना पहुँचने से मेरे जीवन पर कोई अंतर नहीं पड़ेगा. ये नितांत व्यक्तिगत बात होती है, होनी ही चाहिए.

तो तुम लेखक बनना चाहते हो?
_______________________

अगर फूट के ना निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो.

अगर बिना पूछे-बताये ना बरस पड़े,
तुम्हारे दिल और दिमाग़
और जुबां और पेट से
मत लिखो.

अगर घंटों बैठना पड़े
अपने कम्प्यूटर को ताकते
या टाइपराइटर पर बोझ बने हुए
खोजते कमीने शब्दों को
मत लिखो.

अगर पैसे के लिए
या शोहरत के लिए लिख रहे हो
मत लिखो.

अगर लिख रहे हो
कि ये रास्ता है
किसी औरत को बिस्तर तक लाने का
तो मत लिखो.

अगर बैठ के तुम्हें
बार-बार करने पड़ते हैं सुधार
जाने दो.

अगर लिखने का सोच के ही
होने लगता है तनाव
छोड़ दो.

अगर किसी और की तरह
लिखने की फ़िराक़ में हो
तो भूल ही जाओ

अगर वक़्त लगता है
कि चिंघाड़े तुम्हारी अपनी आवाज़
तो उसे वक़्त दो

पर ना चिंघाड़े ग़र फिर भी
तो सामान बाँध लो.

अगर पहले पढ़ के सुनाना पड़ता है
अपनी बीवी या प्रेमिका या प्रेमी
या माँ-बाप या अजनबी आलोचक को
तो तुम कच्चे हो अभी.

अनगिनत लेखकों से मत बनो
उन हज़ारों की तरह
जो कहते हैं खुद को ‘लेखक’
उदास, खोखले और नक्शेबाज़
स्व-मैथुन के मारे हुए.

दुनिया भर की लाइब्रेरियां
त्रस्त हो चुकी हैं
तुम्हारी क़ौम से
मत बढ़ाओ इसे.
दुहाई है, मत बढ़ाओ.

जब तक तुम्हारी आत्मा की ज़मीन से
लम्बी-दूरी के मारक रॉकेट जैसे
नहीं निकलते लफ़्ज़,
तब तक चुप रहना
तुम्हें पूरे चाँद की रात के भेड़िये सा
नहीं कर देता पागल या हत्यारा,
जब तक कि तुम्हारी नाभि का सूरज
तुम्हारे कमरे में आग नहीं लगा देता
मत मत मत लिखो.

क्यूंकि जब वक़्त आएगा
और तुम्हें मिला होगा वो वरदान
तुम लिखोगे और लिखते रहोगे
जब तक भस्म नहीं हो जाते
तुम या यह हवस.

कोई और तरीका नहीं है
कोई और तरीका नहीं था कभी.

  • चार्ल्स बुकोस्की (अनुवाद – वरुण ग्रोवर )
Making India

एक उत्कृष्ट लेखक, लेखन का वरदान पाने के लिए उसे भोगने के लिए अभिशप्त है – माँ जीवन शैफाली

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1 thought on “हम तो ऐसे हैं भैया”

  1. Shikha says:

    maine bhi likhti thi magar ab sabd khokhle jaan padte hai , apna kya hai mera jo likhu isliye likhna chhod diya.

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