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तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!

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“तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!”

ये श्री केदारनाथ सिंह हैं, और बड़े दिनों से इस कविता को गुनगुनाते हुए मेरे हृदय में बह रहे हैं।

वही केदार, जिनके लिए “जाना” हिंदी की ख़ौफ़नाक क्रिया थी!

वही केदारनाथ, जो स्वयं को नदियों में चम्बल और सर्दियों में बुढ़िया का कम्बल कहते थे!

वही केदारनाथ सिंह, जो चाहते थे कि दुनिया “उसके” हाथ की तरह गर्म और सुंदर हो!

ये पंक्ति तब चल निकली, जब केदार इस दुनिया की महफ़िल को छोड़ चले।

मज़े की बात ये है कि नए लड़कों ने केदार के इस भाव का गुड़ गोबर कर दिया। चूँकि केदार ये बताना भूल गये, कि ये किसके हाथ के विषय में है।

उन्होंने अस्पष्ट कहा : “उसका हाथ / मैंने अपने हाथों में लेते हुए सोचा / दुनिया को उसके हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए!”

क्या ही आश्चर्य होता कि इस तेज़ भागते दौड़ते युग में केदार का ठहराव भरा एक “स्पष्टीकरण” आता जिसमें वे बताते कि ये हाथ किसका था।

समस्या तब हुयी जब लड़कों ने ये जानने की कोशिश नहीं की, कि ये बात किस हाथ के बारे में है। दुनिया है महज़ एक, और उस रोज़ करोड़ों हाथों को ये स्वप्न दिखाया गया कि दुनिया उनके जैसी हो।

कोई दुनिया से जा रहा था, दुनिया को स्वप्न दिखाते हुए!

बहरहाल, हमने शुरुआत इस पंक्ति से की थी :

“तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!”

इस कविता में केदार ने एक प्रेम-प्रसंग को “टाइमलाइन” पर अभिहित किया है। उनके अनुसार प्रसंग गेहूँ की फली में रस आने से लेकर गेहूँ और भूसे को अलगाने तक लगने वाले समय जितना ही चलता है।

फलियों में रस का आगमन अदृश्य होता है। इसका दर्शन उतना ही दुर्लभ है, जितना कि किसी एड़ी में काँटे को धँसते देखना।

आगे लिखते हैं, “जैसे चलते-चलते एड़ी में काँटा जाए धँस!”

ठीक वैसे ही सूखी फली-सा था लड़का, उसमें रस की भाँति आ गयी वो। एड़ी में काँटे की भाँति आ धँसी, और इस बार दर्द का अनुभव मस्तिष्क ने नहीं बल्कि हृदय ने किया।

अव्वल तो ज़िंदगी में आना और फिर आरंभ होता है एक प्रेम-श्रृंखला का : दिखना, हँसना, छूना!

“तुम दिखीं जैसे कोई बच्चा सुन रहा हो कहानी,
तुम हँसी जैसे तट पर बजता हो पानी।
तुम हिलीं जैसे हिलती है पत्ती
जैसे लालटेन के शीशे में काँपती हो बत्ती।
तुमने छुआ जैसे धूप में धीरे-धीरे उड़ता है भुआ।”

केदार ने एक और प्रक्रिया का उल्लेख किया है, वो है : हिलना। ग़ौर करने योग्य है कि केवल इसी प्रक्रिया को “आने” वाली प्रक्रिया जितना महत्त्व दिया गया है।

“आने” के लिए भी दो उपमानों का प्रयोग : छीमियों में रस और एड़ी में काँटा। और “हिलने” में भी दो उपमान : वृक्ष की पत्ती और लालटेन में बत्ती।

मानो किसी कक्ष में एक सुंदर-सा मुखड़ा, पंखे की हवा से फड़फड़ाता हो और उसे “हिलते” देखती हों दो आँखें। या कि किसी “स्टडी-टेबल” पर सपनों का बोझ लिए झुके कंधे और टेबल लैम्प की काँपती लौ।

और भी ढेर सारे उपमान हैं इसके, मगर केदार ने जो लिखा वो ही अंतिम लगता है!

और इस कविता का अंतिम है :

“और अन्त में जैसे हवा पकाती है
गेहूँ के खेतों को, तुमने मुझे पकाया।
और इस तरह जैसे दाने अलगाये जाते है
भूसे से, तुमने मुझे खुद से अलगाया।”

हवा भी बड़ी बहरूपिया है। हर कवि के ख़यालों में भिन्न रूप लेकर आती है। कहीं माँ की तरह फ़सल के बालों में कंघी करती है, कभी बाजरों में खनखनाती है और कहीं प्रेमिका की भाँति पकाती है।

क्या ही आश्चर्य है कि जिन दानों को गिर जाने से, खो जाने से बचाया फलियों ने, उन्हें ही “भूसा” कह कर अलगा दिया गया।

तब कहीं उन अलगाई गयी फलियों ने कराहट के साथ बुदबुदाया होगा : “मत जाओ दानो / जाना ही तो ख़ौफ़नाक है!”

उसी कराहट और बुदबुदाहट के साथ, इति।

– योगी अनुराग

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