कश्मीरी कहानी : राधाकृष्ण की बिल्ली

वासुदेव के घर में जब नव-वधू ने प्रवेश किया तो सबसे पहली बात जो उसे समझाई गई वह थी, ‘ध्यान रखना वधू। सामने वाली पोशकुज से कभी बात मत करना। एक तो इस कुलच्छनी की नजर ठीक नहीं है, दूसरे बनते काम बिगाड़ देने में इसे देर नहीं लगती। चुड़ैल हमेशा उस सामने वाली खिड़की पर बैठी रहती है।”

नव-वधू को विश्वास न हुआ। उसने सोचा, व्यक्तिगत शत्रुता के चलते ही शायद यह लोग ऐसा कह रहे हैं। पोशकुज उस मुहल्ले की जानी-पहचानी बुढ़िया थी। सारा मुहल्ला उसकी नजर से खौफ खाता था। जब वह खिड़की पर होती तो उस समय माताएं अपने बच्चों को न स्कूल जाने देतीं और न उनके पिताओं को दफ्तर। मजबूरी की स्थिति में वे स्वयं थोड़ी देर के लिए पोशकुज के पास चली जातीं और उसे तब तक बातों में उलझाए रखतीं जब तक कि उनके बच्चे स्कूल व पतिदेव कामकाज पर न चले जाते।

दिन-भर वह इसी खिड़की पर बैठी रहती और तब तक वहां से नहीं हटती जब तक कि रात को चौकीदार ‘राउण्ड’ पर न निकलता । इस खिड़की पर बैठे-बैठे उसे मुहल्ले-भर का सारा हाल-चाल मालूम पड़ जाता। कौन कहां गया, कौन क्या लाया, किसने क्या खाया-यह सब उसे मालूम रहना चाहिए था। किसी सूचना से वंचित रह जाती तो वह परेशान हो उठती । तब तक उसे चैन नहीं पड़ता जब तक कि किसी छोटे या बड़े से वह भेद लेने में सफल न हो जाती। भेद जानने की लत उसमें इतनी पड़ गई थी कि कभी-कभी वह रात-रात भर आराम से सो भी नहीं पाती थी।

वैसे बात निकालने में वह काफी पटु थी। हालांकि मुहल्ले की औरतें यह अच्छी तरह से जानती थीं कि पोशकुज से कोई बात कहने का मतलब है, उसका चौराहे पर प्रचार करना, मगर फिर भी न जाने क्यों उसके सामने वे वाक् संयम खो बैठती थीं। कहती तो वे जरूर थीं, ‘काकी, याद रखना, भूलकर भी यह बात किसी से न कहना। नहीं तो हमारी खैर नहीं।‘ उत्तर में पोशकुज सबसे यही कहती, “हाय-हाय, ऐसा क्यों समझती हो? मैं क्या नहीं जानती कि कौन-सी बात कहने की होती है और कौन-सी नहीं। बात को इधर-उधर करने की आदत तुम लोगों ने मुझमें देखी क्या ?”

मगर बात सुनकर वह दो बासनों को न टकराती, ऐसा संभव न था। दूसरे ही दिन मुहल्ले की औरतें एक-दूसरे पर टूट पड़तीं। पनघट पर, सरकारी नल पर, मंदिर के आंगन में अच्छी-खासी धमाल मचती। यह देख-देखकर पोशकुज के कलेजे पर मन-भर ठण्डक पड़ जाती। इसके बाद वह एक कुशल मध्यस्थ की तरह उन्हें समझा-बुझाकर उनमें संधि करा देती। यह जानते हुए भी कि यह आग इसी बुढ़िया की लगाई हुई है, मुहल्ले की औरतें निरुपाय होकर केवल दिल मसोसकर रह जाती थीं।

बुढ़िया के मुंह लगने की किसी में हिम्मत न थी। पोशकुज ने अपने पति तक को संत्रस्त कर रखा था। उस बेचारे की इसके सामने एक भी नहीं चलती थी। सीधा-सादा व्यक्ति। दिल साफ, नज़र साफ। खुराफात से कोसों दूर। सुबह स्नानादि करके पूजापाठ करना, साफा बांधकर तम्बाकू पीना, जल्दी-जल्दी भोजन कर दफ्तर के लिए चल पड़ना, शाम को आकर चाय पी लेना और चल देना किसी साधु-संत से मिलने-यह उस देवता-स्वरूप की दिनचर्या थी।

यों तो पूरे मुहल्ले में उसे कोई नहीं जानता था मगर पोशाकुज का पति होने के कारण उसे सभी जानते थे। मुहल्ले में वह तब पहचान में आ जाता था जब उसकी पत्नी का नाम उसके नाम के आगे लिया जाता, यानी उसे, ‘पोशकुज का राधाकृष्ण’ कहकर पुकारा जाता था।

जहां तक घर के कामकाज का प्रश्न था, यह सब पोशकुज ही किया करती थी। खरीदारी करने का उसका तरीका मुहल्ले-भर में प्रसिद्ध था। खिड़की पर बैठे-बैठे दूधवाली, मछलीवाली, सब्जीवाली और जो भी कोई काम का दिखता, उसे वह आंगन में बुलाती। इसके बाद नीचे आकर भाव-ताव में इतनी हुज्जत करती कि एक बार जो उस आंगन में घुसता वह तौबा करता हुआ निकल जाता और फिर दुबारा उस गली से गुजरने का नाम न लेता। मोल-तोल इस ढंग से करती मानो सोना खरीद रही हो। उसकी हुज्जत का मजा लेने के लिए पास-पड़ोस की औरतें एक-एक करके उसके इर्द-गिर्द जमा हो जातीं और यही उसकी मंशा भी होती थी। इधर फेरीवाला आंगन से बड़बड़ाता हुआ निकल जाता और उधर पोशकुज का उन मुहल्लेवालियों से बतियाना शुरू हो जाता।

बातें भी कैसी? मंगनी पर उनके यहां लड़कीवालों ने क्या-क्या भेजा, इनकी बेटी ससुराल क्यों नहीं जाती है, उनकी वधू मायके से आती क्यों नहीं है, इनके लड़के को कोई लड़की देने के लिए तैयार क्यों नहीं हो रहा-बस, यही सब। सास को बहू के खिलाफ और ननद को भौजाई के खिलाफ उकसाना उसके बाएं हाथ का खेल था। झूठी कसमें खा-खाकर वह बड़ी चतुराई से अपने तर्कों को पुष्ट करती थी।

जब से वासुदेव के यहां नई वधू आई तब से पोशकुज के खुराफाती दिमाग में यह बात बराबर चक्कर काटती रही कि कैसे भी हो, वह वासुदेव की नव-वधू को अपने यहां एकान्त में बुलाए और उससे कहे कि तेरी यह सास निर्दयी है। तू इसकी चिकनी-चुपड़ी बातों पर न जाना। अपने समय में इसने अपनी सास को खूब दुख दिए हैं। तू भला क्यों इसकी इतनी सेवा करती है? मगर अभी तक उसे यह सब कहने का मौका नहीं मिला था।

एक दिन की बात है। पोशकुज नित्य की तरह खिड़की पर बैठी हुई कुछ सोच रही थी कि उसकी नज़र नीचे गली में एक व्यक्ति पर पड़ी जो दीवार की ओट में धीरे-धीरे आगे बढ़ता हुआ वासुदेव के घर में घुसा। उसके दाहिने हाथ में लाल रंग की एक टोकरी थी जिसे पोशकुज प्रयत्न करने पर भी अच्छी तरह देख नहीं सकी। उसने कई दिनों तक खूब कोशिश की, किन्तु इस टोकरी के रहस्य का पता लगाने में वह असफल रही। जीवन में आज वह पहली बार असफल रही थी।

उसने चुनौती स्वीकार कर ली : यदि इस टोकरी का रहस्य न जान लूँ तो मेरा नाम भी पोशकुज नहीं। बातों ही बातों में एक दिन पोशकुज ने अपने पति राधाकृष्ण से पूछा, “सुना आपने? सामने वाले वासुदेव के यहां आजकल टोकरियों पर टोकरियां भेंट में आती हैं। कौन लाता है, यह समझ में नहीं आता?”

इसपर राधाकृष्ण ने बिगड़कर कहा, “मुझे क्या मालूम, जाकर उन्हीं से पूछ। तुझे तो हमेशा औरों की ही पड़ी रहती है। काम-धाम कुछ नहीं है ना, इसीलिए खुराफात सूझती है।”

पोशकुज पर पति की इस डांट का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दूसरे ही पल वह खुद वासुदेव के यहां चल पड़ी। आंगन को पार कर जब वह गलियारे में पहुंची तो उसे लगा जैसे भीतर कमरे में फुसफुसाहट हो रही हो और चीजों को जल्दी-जल्दी समेटा जा रहा हो। वह नजरों को चारों और घुमाती हुई कमरे के अन्दर दाखिल हुई।

अन्दर पहुंचकर उसने यों ही इधर-उधर की बात चलाई-ठण्ड बढ़ती जा रही है, शक्कर का भाव बढ़ने वाला है, सब्जियां मंहगी हो गई हैं आदि। इस बीच वह कमरे के कोने-कोने को बड़ी सावधानी के साथ देखती रही। जब उसे कोई भेद मिलता नज़र न आया तो मायूस होकर वहां से चल देने को हुई। वासुदेव की नव-वधू ने रोका, “चाय पीकर जाना काकी। चाय तैयार है।”

पोशाकुज ने चाय तो पी ली, किन्तु जिस काम के लिए आई थी उसे बनता न देख उसका मन मायूस हो गया। वह निराश होकर घर लौट आई और खिड़की पर बैठ गई। खिड़की पर बैठे-बैठे पोशकुज इन्हीं विचारों में खो गई कि आखिर उस टोकरी को उन्होंने कहां छिपाकर रखा होगा, भला उसमें क्या चीज हो सकती थी, कमरे में फुसफुसाहट क्यों हो रही थी आदि”। उसकी विचार-श्रृंखला तब टूटी जब उसने वासुदेव की पत्नी को शाल ओढ़े घर से निकलते देखा।

कुछ ही समय के बाद वासुदेव की नव-वधू नल पर हाथ-मुंह धोने के लिए बाहर आंगन में निकली। पोशकुज को मौका मिल गया। खिड़की पर से ही उसने आवाज लगाई, “क्यों बेटी, तू मेरे यहां आती ही नहीं है? तू तो बड़े घर की बेटी है, तुझे तो सबसे हिलमिलकर रहना चाहिए। लगता है तू भी इनकी संगत में पड़कर इन्हीं जैसी हो गई है।”

नव-वधू से इन बातों का कोई खास उत्तर देते न बना। वह केवल इतना ही कह पायी:’फुरसत ही कहाँ मिलती है, काकी?’ मेरा तो खुद मन करता है कि कभी आपके पास आऊं।‘ पोशकुज को लगा, नव-वधू निश्चय ही सरल स्वभाव की है। उसने खूब मनुहार कर उसे अपने यहां ऊपर बुलाया। मायके के हाल-चाल पूछे। लाड़-प्यार जताकर उसकी बलाएं लीं और फिर कहा, “वधू ! तू यहीं बैठना, मैं अभी आती हूं।” “आप कहाँ जा रही हैं?” नव-वधू ने उत्सुकतावश पूछा। “जरा हलवाई के यहां से चाय के लिए दूध ले आऊँ!” पोशाकुज ने ममता भरे लहजे में कहा।

नव-वधू ने खूब कहा कि इस वक्त चाय नहीं पियूंगी, घर पर में कोई नहीं है और कमरों के किवाड़ खुले हैं। मगर पोशकुज कहां मानती,”आज पहली बार मेरे यहां आई हो। बिना चाय पिलाए कैसे जाने दूंगी। तुम्हारा आना कोई मामूली बात थोड़े ही है।” कहते-कहते वह निकल पड़ी।

पोशकुज के चले जाने के लगभग पांच मिनट बाद नव-वधू को सहसा अपनी रिस्ट-वाच का ध्यान आया, जिसे हाथ-मुंह धोते समय वह नल पर ही भूल आई थी। वह जल्दी-जल्दी नीचे गई और अपने आंगन में प्रविष्ट होकर नल के पास रखी रिस्ट-वाच को उठा लिया। जब वह पोशकुज के दरवाजे की ओर मुड़ी तो उसे अपने घर के बरामदे पर कोई छाया तैरती हुई दिखाई पड़ी। वह ऊंचे स्वर में बोली, ‘कौन है ?” उधर से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

उसके गले से अनायास निकल पड़ा, “चोर ! चोर !! बचाओ, बचाओ।” आवाज सुनकर मुहल्ले की औरतें खिड़कियों से झाँकने लगीं। छोटे-बड़े एक-एक करके आंगन में जमा होने लगे। इसी बीच वासुदेव की पत्नी भी आ गई और उसने रोना-धोना शुरू कर दिया।

“चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो”हर कोई चिल्ला रहा था। किसी एक से मुहल्ले की औरतों ने कहा, ‘आप तो मर्द हैं, जरा ऊपर जाकर देख तो आइए कि कौन है?” “आप नहीं जानतीं । चोर को जब यह मालूम हो जाता है कि अब मैं चारों ओर से फंस गया हूं तब वह आगे-पीछे कुछ भी नहीं देखता। कहीं अब वह मेरा ही खोपड़ा फोड़ दे तो मैं वहीं ढेर हो जाऊंगा !” उसने कन्नी काटी ।

पांच बज चुके थे और दफ्तरों से कर्मचारी अपने-अपने घरों को लौट रहे थे । वासुदेव, वासुदेव का लड़का, पोशकुज का पति राधाकृष्ण आदि, यह लोग भी घटनास्थल पर पहुंच गए। वासुदेव के जवान लड़के ने एक मोटा-सा डण्डा उठाया और चल दिया ऊपर। उसके पीछे-पीछे वासुदेव और राधाकृष्ण भी एक-एक छड़ी हाथ में लिये ऊपर चल दिए। राधाकृष्ण एक-एक सीढ़ी चढ़ते जाते और जोर-जोर से कहते जाते, ‘बदमाश ! निकलते हो बाहर या नहीं? याद रखना इस सोंटे से मार-मारकर भुरकुस निकाल दूंगा।” चोर को ढूंढ़ते-ढूंढते तीनों जने चौथी मंजिल तक पहुंच गए। वहां कुछ अंधेरा था। अतः सभी को इस मंजिल का कोना-कोना छानना पड़ा।

एक कोने पर राधाकृष्ण के कानों ने खड़-खड़ की आवाज गुनी। वह चिल्लाया, “मिल गया, मिल गया। इधर, इस तरफ !” सभी उस ओर दौड़े। चोर छत को जानेवाली सीढ़ियों की ओट में बने एक ताक में दुबका पड़ा था। वासुदेव के जवान लड़के ने आव देखा न ताव और लाठी घुमा दी। एक दर्द-भरी चीख के साथ चोर नीचे सीढ़ियों पर जा गिरा।

निकट आने पर सबने चोर को देखा तो वह पोशकुज निकली। उसके दाहिने हाथ में लाल रंग की एक टोकरी लटक रही थी और पास ही मुर्गाबी के कुछ पंख बिखरे पड़े थे। राधाकृष्ण का चेहरा पीला पड़ गया जैसे मानों हल्दी उसके ऊपर फेंकी गई हो। उसके हाथ-पांव पसीने से तर हो गए और वह विस्फारित नेत्रों से पोशकुज को देखने लगा।

वासुदेव के आश्चर्य की कोई सीमा न रही। वे इस वृद्धा के इस कृत्य की मन ही मन भर्त्सना करने लगे। वासुदेव के लड़के के हाथ से डण्डा छूट गया और वह कभी पोशकुज की ओर देखता, कभी राधाकृष्ण की ओर। पोशकुज आंखें फाड़-फाड़कर सबकी तरफ एकएक करके देख रही थी। उसे अपने इस कृत्य पर ग्लानि हो रही थी,ऐसा स्पष्ट लग रहा था।

काफी देर तक जब ऊपर से कोई नीचे नहीं आया तो औरतों ने अधीर होकर दो-चार व्यक्तियों को और ऊपर भेजा। इनके संग उत्सुकतावश पचास-साठ छोटे-बड़े और ऊपर चल दिए। ये लोग जब ऊपर चढ़ रहे थे तो उधर से वासुदेव, वासुदेव का लड़का और राधाकृष्ण तीनों इनको रोकने के उद्देश्य से जल्दी-जल्दी नीचे उतर आए। भीड़ में से एक ने पूछा, ‘वयों साहब, क्या बात थी? चोर मिला या नहीं?”

राधाकृष्ण ने धीमे स्वर में कहा, ‘हां जी, मिल गया। चलो अब चले।” भीड़ को राधाकृष्ण का यह उत्तर संतुष्ट न कर सका। इस बार उन्होंने वासुदेव से पूछा, ‘क्यों जी, चोर मिला या नहीं? कौन था वह?”

“अजी, जिसे हम चोर समझ रहे थे वह तो दरअसल एक बिल्ली थी, बिल्ली।” वासुदेव ने बात को काटते हुए कहा। भीड़ में सभी हंस दिए। एक मनचले से रहा न गया। उसने पुनः पूछा, ‘क्यों जी? क्या सचमुच बिल्ली ही थी?” इस बार वासुदेव का दिमाग गर्म हो गया। वह जोर से चिल्लाया, “हां-हां, बिल्ली ही थी। पड़ोस के राधाकृष्ण की बिल्ली।”

मूल लेखक: दीपक कौल
(रूपान्तरकार: डॉ० शिबन कृष्ण रैणा)

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