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कालबेलिया : नागलोक की परियों का धरती पर नृत्य

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काला रंग मुझे हमेशा से आकर्षित करता है. कहते हैं काला रंग काला इसलिए है क्योंकि वो सारे रंगों को सोख लेता है, परावर्तित नहीं करता…

तो इन नागलोक की परियों ने भी जैसे जीवन के सारे रंग सोख लिए हैं, और फिर इनको लिए जब गोल घूमती हैं तो लगता है जैसे इनसे निकलकर वो सारे रंग इनके चारों ओर इनको देखने वालों के दिलों को रंगीन कर रहे हैं…

ये जो रेगिस्तान में, उड़ती रेत का भंवर भी होता है ना, वो हवा के या तूफ़ान के चलने से नहीं होता… ये नागलोक की परियां काले लिबास में गोल घूमती हुई नृत्य करती है तो इस भंवर का मन भी भंवर में फंस जाता है…

बलखाती भुजाओं में जीवन का समंदर बलखाता सा प्रतीत होता है … जिससे लटकती सीपियों में न जाने कौन से मोती छुपे होते हैं कि काले लिबास वाली रुदालियों से दुःख भी विस्मृत हो जाते हैं…

गोल घूमते घाघरे के साथ सारे ग्रह अपनी गति बढ़ा देते हैं… बेचारा सूरज वहीं खड़ा रह जाता है और इन परियों के माथे का झूमर इनकी मुस्कान के साथ अपने चारों ओर प्रेमिल प्रकाश फैला देता है…

नृत्य के साथ गीत के बोल उनकी हर नृत्य मुद्रा के साथ ऐसे बदलते हैं जैसे इनको मौसम बदलने की फिक्र ही न हो, उनके लिए तो नाचना ही उनकी रोजी है, उनका भगवान और ध्यान…

कहते हैं ये संपेरे नीची जाति के होते हैं… ये नाग को मारते नहीं पालते हैं, उसके ज़हर से औषधि बनाते हैं… हम ऊंची जात वालों को थोड़ा नीचे आने की ज़रुरत है. अपने अहम् में हम न जाने कितनों के जीवन के अमृत को विष में बदल देते हैं…

हे नागलोक की परियां तुम ऐसे ही बलखाते हुए गोल घूमते रहना.. जिस दिन तुम रुक गईं तो अंतरिक्ष के सारे ग्रह वहीं रुक जाएंगे… पृथ्वी भी गोल घूमना बंद कर देगी…

और बंद हो जाएगा दिन और रात का निकलना और मौसम का बदलना… तुम बदलते मौसम की निशानियाँ हों… जिससे इस प्रकृति में निरंतरता है…

– माँ जीवन शैफाली

कालबेलिया

मेरा बड़ा मन था जैसलमेर का कालबेलिया नृत्य देखने का
कैसे वो नृत्यांगना नागिन की तरह बल खाती जाती हैं
लहर-लहर उठती है बदन के लुएँ-लुएँ से
हाथों में बंधी रंग बिरंगी डोरियाँ
उनसे लटकते ख़ूबसूरत रंग बिरंगे फूमन
कलाई से ले कर काँधे तक सफ़ेद चूड़ा
काली ओढ़नी पे ढेरों रंग
माथे पे काली बिंदियाँ, ठुड्डी पर भी

घाघरा यूँ गोल गोल घूम घूम जाता
जैसे घाघरा न हो पूरा रेगिस्तान लहरा रहा हो
रेत की लहरें हैं या बदन की लहरें हैं
रेगिस्तान की अप्सराएँ हैं यह कालबेलिया नृत्यांगनाएं

मेरी ख़्वाहिश इतनी गहरी थी
कि सहरा मेरे शहर आ गया
अपनी झूम झूम नाचती नृत्यांगनाओं के साथ
अपनी आँखों पे यक़ीन करूँ कि उन्हें देखूँ

होंठ मुस्कुरा उठे
रूह झूम झूम नाच उठी
आँखों में मोती झलकने लगे
अंतर्मन तक भरी मैं अपने घर लौटी
शुक्रिया शुक्रिया महसूसती

फिर भी मैं आऊँगी एक दिन
बैठूँगी वहाँ जहाँ शहर ख़त्म होता है और रेगिस्तान शुरू होता है
वहाँ बैठ कर देखूँगी कालबेलिया नृत्य
रात के अंधेरे में बॉन्फ़ायअर के पास
सहरा को समुन्दर होते देखना है मुझे
रूबरू होने का भी एक अपना ही नशा होता है

यूँ चाहे रूहों के रूहों से रिश्ते होते हैं
पर साथ साथ बैठ ग़ुलाम अली की ग़ज़लें सुनना
या फिर धुँध भरी घाटी में हाथ थाम घूमना
या फिर बॉन्फ़ायअर के पास घूँट घूँट पीना आँखों से दिल से
देखते हुए कालबेलिया
कि रूहें भी तो थिरकना चाहती हैं बदन के साज़ पे
रूबरू
बेवजह तो नहीं पहने यह ज़मीनी लिबास

  • राजेश जोशी

ब्रह्माण्ड का नृत्य

रिक्तता की जाती है
ताकि उसे भरा जा सके
रिक्त नहीं होओगे तो भरोगे कैसे

समुन्दर खारा ही सही
उसी का पानी भाप बन बरसता है तुम्हारे आँगन
उसी का पानी भाप बन बहता है नदियों में, नारों में

चाँद हमेशा कहीं न कहीं होता है
तारे भी
कहीं अमावस होती है तो कहीं पूर्णिमा
चाँद बस अपना स्थान बदलता रहता है
उसे लगाना है धरती के गिर्द चक्कर
प्यार और कर्तव्य का बेजोड़ मेल है वो

रात्रि ख़ुश है अपनी जगह, दिन भी
तुम यूँही बेवजह दर्द में रहते हो
दर्द को बिछोड़े का प्रतीक बना लिया है

दिन रात का न मिल पाना
देखो तो, वो मिलते हैं चुपके-चुपके
इतना भेद भरा है उनके मिलन में
कि तुम बता भी नहीं सकते
वो कौन सा पल था जब रात रूखसत हुई
और दिन आया

एक पल के लिए वो इतना घुल मिल जाते हैं
वो पल शाश्वत है तुम्हें बस यूँही देखना है दर्द हर शै में
इतना दर्द जो पाल रखा है अपने अंदर
अपनी आँखों में लगाओ इश्क़ की बिनाई
सब तरफ़, सब इश्क़ में मसरूफ नज़र आएँगे

तितलियाँ कुछ दिनों में हज़ारों दिल रंग से भर जाती हैं
फूल कुछ पलों में ख़ुशबू बिखेर जाते हैं
ज़िंदगी मृत्यु अलग तो कभी भी न थे
मृत्यु है भी क्या, निरंतर चलती ज़िंदगी में एक अल्पविराम
वेडिंग नाइट की तरह मनाते हैं रूमी की मृत्यु का दिन
ठहराव तो अपने ही अंदर है
उत्सव तो अपने ही अंदर है
अपने ही अंदर बीज भी है फल भी

सब अपनी अपनी जगह है
सब एक ऑर्डर में है
अपने अंदर नृत्य होगा
तो ब्रह्मांड नृत्य करता हुआ तभी नज़र आएगा

  • राजेश जोशी
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