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पुस्तक समीक्षा : ककनमठ, एक ऐतिहासिक प्रेम कहानी

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ऐतिहासिक पुरातत्विक पृष्ठभूमि पर आधारित इस उपन्यास में भारत के अंधकार-पूर्ण काल-खण्ड को कथांकित किया गया है। सम्राट हर्षवर्धन के पश्चात् केंद्रीय सत्ता किसी की भी न रही, जिसकी वजह से देश में छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गए। इन राज्यों के बीच सामंजस्य न था। इस्लामी आक्रान्ताओं ने इस फूट का लाभ उठाया।

किन्तु इस युग में भी यदा-कदा प्रचंड वीरता और वीर पुरुष एवं उनके पौरूष दिखाई पड़ता है। एक तरफ जहाँ राजा महाराजाओं के बीच सत्ता को लेकर युद्ध होता था वहीं दूसरी ओर कुछ राज्यों में संस्कृति और कला को समर्पित राज्यों ने शिल्प और कला का भरपूर विस्तार किया।

लेखक ने इस कथा में मध्यप्रदेश के क्षत्रिय परिवारों को केन्द्रित किया है, उन्होंने अपने पृष्ठ-भूमि के वक्तव्य में यह उल्लेख किया है –‘बहुत कम लोग जानते हैं कि महमूद गज़नवी ने ग्वालियर (गोपाचल) दुर्ग का घेरा डाला और चार दिन में ही घेरा उठाकर उन्हें भागना पड़ा। सिहोनियाँ (तत्कालीन सिंहपानीय) के राजा कीर्तिराज कच्छपघात ने उसे पूरी तरह हराया था। यह भारतीय इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है।

मध्यप्रदेश के पुरातन अवशेषों का भी लेखक ने उल्लेख किया है : ‘मध्यप्रदेश में बह रही अश्व नदी के बाएं किनारे कच्छपघात नरेशों की राजधानी सिंहपानीय स्थित थी जो अब मुरैना जिले में अवशिष्ट है। यहीं पर विश्वविख्यात रथ-मंदिर ‘ककनमठ’ बना हुआ है, इसके 2 किलोमीटर की परिधि के भीतर जैन तीर्थंकर की प्रतिमायें हैं।

‘यों तो चम्बल क्षेत्र में हाल ही में पहाड़गढ़ के पास ‘लिखी छाज’ के नाम खोजे गए गुफागुच्छ की 86 गुफाओं और शैलांश्रयों ने इस क्षेत्र की संस्कृति को मध्याश्मीय और ताम्रास्मीय सिद्ध किया है।‘

‘चम्बल और नर्मदा के बीच विन्ध्याचल के पठारों और मैदानों में संस्कृति का अक्षय कोश भरा हुआ ।’

इस उपन्यास की शुरुआत लेखक ने एक आश्रम से की है, जहाँ एक सन्यासिनी अपनी पुत्री को आवाज़ लगा रही हैं… ‘कंकन, अरी ओ कंकन! देव विग्रह पर दीप तो आलोकित कर दे, संध्यार्चन का समय हो गया है, पुत्री।’

एक सात्विक परिवेश से शुरू होती यह कथा एक ऐसे अलौकिक वातावरण में ले जाती है, जब देव आराधना को प्राथमिकता और नित्यक्रम का हिस्सा माना जाता था। आश्रम पढ़कर एक ऐसी जगह चित्रित होती है, जहाँ मिटटी पर बनी घास और टहनियों से बने घर होंगे, आस-पास मंत्रोचाराण से जगह गुंजायमान रहा होगा, और आश्रम में गुरुदेव भी होंगे।

संध्याकाल का समय है, जब हर व्यक्ति, पशु-पक्षी अपने घर की ओर प्रस्थान करता है, सुबह से घर के बाहर रहने वाले जब घर की ओर लौटकर आते हैं तो घर में प्रेम बरसता हैं जब गाय भी दिन भर घूमकर अपने घर लौट आती है और वातावरण गायों की खुरों की धूल से आकाश आच्छादित हो जाता है और जगम वात्सल्य के क्षीर से सरोबर हो जाती है।

लेखक ने बहुत ही सुंदरतरीके से इस भाव को इंगित किया है, ‘ प्रौढ़ा तापसी के प्यार भरे स्वर में भी मातृ- क्षीरा बेला का वात्सल्य छलक रहा था।’

कंकन दीप जला कर देवाभिषेक के लिए ताम्रकलश लेकर नदी तट पर जल लाने के लिए जाती है। संध्याकाल का समय और फाल्गुन का यौवन! ऐसे में मन में कविता न आये ऐसा हो नहीं सकता सो लेखक ने 16 वर्षीया कुमारिका के माध्यम से एक सुंदर कविता लिखी है जो प्रकृति, यौवन और संध्याकाल का चित्रण कर रही है :

‘कलश मांजते – मांजते वह गुनगुनाने लगी –
आज रूप की डाल बोर से ऐसी महकी है ।
गंध-गर्विता मल्यालीन भी बहकी-बहकी है ।। …..

साहित्य में गद्य और पद्य की अपनी अपनी शैलियाँ हैं। दोनों में ही भाषा-शैली और प्रवाह का होना जरुरी होता है। यहाँ लेखक ने कविता लिख कर प्रकृति को और सुंदर बना दिया है और छंद-बद्ध रचना लिख कर यह दर्शाने का सफल प्रयास किया है कि उस काल में साहित्यिक भाषा विकसित थी और उसका उपयोग कुशलता से किया जाता था।

अपने में मगन हो कंकन इतनी खो गयी कि उसको यह एहसास ही न हुआ कि वह नदी में उतर गयी है और मकर ने उसके पैर को दबोच लिया है। जब दर्द होता है तब अपनी तुन्द्रा से बाहर आती है और मदद की गुहार लगाती है।

जंगल में मदद करने वाला कौन होता है? शायद कोई नहीं कोई भला भटका राहगीर ही आये तो अलग बात है। पर यहाँ लेखक ने अपना कौशल दिखाया है और एक व्यक्ति जो सांध्य-निवृति कर अपने गुरु के पास जा रहा था, वह किसी नारी की दर्दभरी चीख सुनकर नदी तट पर जाता है और वहां इस कुमारिका को मकर के बंध में जकड़ा देख उसकी मदद करता है और मकर को मारकर उस कुमारिका को मुक्त करवाता है।

फिर वह सोच में पड़ जाता है कि आगे क्या करना है, इस बीच उसके गुरु आ जाते हैं और वह उस कुमारिका को पहचान लेते हैं और उस शिष्य से कहते हैं यह तो सन्यासिनी ग्रिजावन की बेटी कंकन हैं।

वह उसे अपने आश्रम में ले जाने को कहते हैं। कुछ देर बाद कंकन को होश आता है तो वह उस बचाने वाले युवक का परिचय देते हैं, “ यह राजकुमार कीर्तिराज है, सिंहपानीय के कच्छपघात नरेश मंगलराज का युवराज।”

यहाँ से कथा के मोड़ लेती है और प्रेमपथ पर चल पड़ती है। लेखक ने लिखा है ‘ कंकन ने पलकें उठाकर युवक को देखा। बीस-इक्कीस वर्ष की पुष्ट और सुगठित देह, भव्य मुखाकृति, ऊँचा मस्तक, गौर वर्ण, ओठों पर रोम-राजी सघन श्मश्रु बनने के लिए व्याकुल, आँखों में नील गम्भीर स्निग्घता। कंकन उसकी ओर क्षण भर देखती रही।

यह एक स्वाभाविक भाव होता है जब किसी कुमारिका के मन में प्रेम पल्लवित होता है।
वहीँ दूसरी ओर लेखक ने लिखा है ‘ गीले वस्त्रों में लिपटी देह-यष्टि इतनी सुडौल और सानुपात, जैसे विधाता ने अपना सारा शिल्प उसे गढ़ने संवारने में प्रयुक्त कर डाला हो।…..

दोनों की आँखें चार होती हैं और दोनों ही प्रेमबंधन में बंध जाते हैं। आचार्य ह्रदयशिव को लगा जैसे ईश्वर ने उनकी इच्छा जान ली थी और इनदोनों को मिलवा दिया था।

सिंहपानीय अपने समय का सुदृढ़, सुगठित राज्य था। इसके कच्छपघात राजा वृज्दमन ने गोपाचल( ग्वालियर) दुर्ग पर आधिपत्य करके सिंहपानीय का राज्य समूचे मध्यक्षेत्र में सर्वाधिक शक्तिशाली बना दिया गया था।

इस दौरान वृज्दमन के पुत्र राजा मंगलराज सिंहपानीय की गद्दी पर थे। उसकी रानी लक्ष्मणा देवी, चंदेल राजा की कन्या थी।

इस दौरान की राजनीति के एक परंपरा थी, कि दो राज्यों के बीच संधि करने हेतु एक वंश की बेटी को दूसरे वंश में विवाह करवा दिया जाता था, जिससे एक राजा का आधिपत्य का विस्तार हो जाता था।

राजा मंगलराज अरणिपद्र के प्रधान धर्माचार्य ह्रदयशिव के शिष्य थे। राजा ने आचार्य को गुरुदाक्षिणा के रूप में एक विशाल शिव मंदिर उनकी तपस्या के लिए सिंहपानीय में निर्मित कराने का संकल्प लिया था।

इससे यह पता चल रहा है कि इस काल में गुरु-शिष्य परम्परा मुखरता पर थी। और शिल्पकला को बढ़ावा दिया जाता था।

लेखक ने अपनी पृष्ठ-भूमि में पहले ही लिखा है कि इस दौरान शैव, और जैन तीर्थांकर की उपासना होती थी। उन्होंने आगे लिखा है; ‘ सिंहपानीय के अतिरिक्त दो और शाखाये थीं, एक की राजधानी डोम थी, और दूसरी शाखा शिवपुरी के नरवरगढ़ क्षेत्र में स्थापित हुई। इनके वंशज आज तक पाडौन नामक छोटे से ग्राम में रहते हैं।

इसको लिख कर लेखक ने अपनी कथा में वर्णित राज्यों की असल में भी होने की पुष्टि दी है।

इन सब के बीच भातृभाव। उन दिनों डोम में अर्जुनदेव कच्छपघात गद्दी पर था। वह मालव-युवराज भोज का सहपाठी था।

इस कथा के अन्य पात्र कदम्बिका देवी, उनकी पुत्री चारुलता, सिंहपानीय राज्य की राज नर्तकी, नीलकंठ, एक ब्राह्मण पुत्र, जो इसी राज्य का राज-कवि।

आश्रम में जब आचार्य को कीर्तिराज और कंकन के प्रेमबंधन का पता चलता है, वे कंकन की माँ, सन्यासिनी गिरिव्रजा से बात करके दोनों के विवाह का वचन देते हैं। इस बीच आचार्य को पता चलता है कि मंगलराज ने अपने बेटे का विवाह मालव राजकुमारी सुदेशणा के साथ तय कर दिया है। यह प्रस्ताव परमार तथा कच्छपघात क्षत्रियों के बीच सम्बन्ध प्रचलित करने के लिए तय किया गया था। यह प्रस्ताव मालव युवराज भोज द्वारा प्रस्तावित था। युवराज भोज दूरदर्शी थे, उन्होंने भांप लिया था की यवन आक्रांता गजनवी से तभी लड़ा जा सकता था जब क्षत्रिय समाज में एकता हो।

यहाँ लेखक के द्वारा जो वर्णन किया गया है उससे साफ़ पता चलता है कि महिलाओं की स्थिति कुछ अच्छी नहीं थी, और उनका इस्तमाल राज्यों की एकता के लिए किया जाता था।

इस दौरान सिंहपानीय में मदनोत्सव का आयोजन हो रहा था, जब सब राजा एकत्रित हुए थे। इस आयोजन में समाज के हर वर्ण के लोग इसको देखने आये थे।

यहाँ लेखक ने बतलाया है कि प्रजा में भेद-भाव नहीं था। वे आनंद-उत्सव मिलकर मनाते थे। यही एक राज्य की संस्कृति और समृद्धि का प्रतिक था।

वहीँ दूसरी ओर नीलकंठ, जिसको राज कवि का दर्जा मिला था, वह वहां की राज नर्तकी के घर आश्रय लेता है और उनकी बेटी चारुलता के प्रेम में बंध जाता है। विवाह के लिए जब वह अपने माता-पिता से आज्ञा लेने हेतु जब अपने ग्राम जाता है, वहाँ उसके प्रेम के चर्चे पहले ही पहुँच चुके होते है और साथ ही यह खबर भी वह राज कवि है। जब वह अपने विवाह का प्रस्ताव रखता है तब उसकी जाति के लोग पहले तो विद्रोह करते हैं पर फिर उसकी पदवी को देख कर वे सभी अपनी स्वीकृति दे देते हैं।

यहाँ लेखक ने यह दर्शाया है कि उस दौरान भी सभ्रांत और धनाढ्य लोगों का अपना वर्चस्व था।

नीलकंठ और कीर्तिराज दोनों में प्रगाढ़ मित्रता हो गयी थी। नीलकंठ को आचार्य, कीर्तिराज और कंकन के रिश्ते की जानकारी मालवराज तक पहुँचाने को कहते हैं और यहाँ वह कीर्तिराज को एक शिवमंदिर का निर्माण करने को कहते हैं।

आचार्य के मन में एक भय भी है , इस सब के बीच कहीं आक्रान्ता का आक्रमण न हो जाये । पर शिवमंदिर के मंदिर के निर्माण में उनके दो उद्देश्य छुपे थे, एक तो मालवराज की राजकुमारी से कीर्तिराज का विवाह टल जाये, दूसरा वह इस बीच आक्रान्ता से लड़ने की कोई रणनीति बना लें और तीसरी उनको ये लग रहा था, मालवराज अगर कंकन को दत्तक पुत्री का दर्जा देते है, तो क्षत्रियों के बीच गाढ़ एकता हो जाएगी और पूरे देश में मध्यप्रदेश की मिसाल दी जायेगी।

आचार्य की दूरदर्शिता का परिचय यहाँ लेखक ने अपने अध्ययन शीलता का उदहारण दिया दिया। आचार्य क्योंकि राज गुरु भी थे, राज के हित में सोचना उनका कर्त्तव्य था, और आचार्य ह्रदयशिव अपने दायित्व को निभाने में कहीं भी चूकना नहीं चाहते थे।

मालवराज को जब कंकन के बारे में पता चलता है, तो वह खुद को अपमानित महसूस करते हैं और सैनिकों को उसको तलाश कर मारने की आज्ञा दे देते हैं। जब सन्यासिनी गिरिव्रजना को इस बात का पता चलता है, तब वह अपनी बेटी को लेकर घने वन की ओर पलायन कर लेती हैं, जहाँ उनकी भेंट अपने पति के पितामाह दुर्गसेन के नायकत्व में कच्छपघात नरेश वृजदमन के गोपाचल दुर्ग अभियान में भाग लेने वाले नरसिंह से होती हैं। सन्यासिनी के पति की मृत्यु इन्ही के जांघ पर सर रख कर हुई थी, वे इतने आहत हुए कि इस युद्ध के बाद वे जंगल में ही बस गए और पशु-पालन करने लगे।

इस बीच मालवराज सिंहपियानी पर आक्रमण करते हैं, नरसिंह को जब कंकन के विवाह प्रस्ताव के बारे में पता चलता है तो वे कीर्तिराज का साथ देते हैं, कंकन भी ज़िद करके पुरुष सैनिक का वेश धारण करके युद्ध में उतर जाती है और मालव राज को धराशाही कर देती है।

सिंहपानीय के सैनिक इस योद्धा पर मुग्ध हो जाते है पर कोई समझ नहीं पाता यह योद्धा आखिर कौन है? दूसरी तरफ गज़नवी को पता चलता है कि गोपाचल दुर्ग पर सैनिक बल नहीं है तो वह उसको जितने की मंशा से उसपर कूच करता है पर कीर्तिराज उसको खदेड़ने में सफल हो जाता है। इस युद्ध में भी कंकन उसका साथ देती है और वह एक दूसरे को पहचान लेटे हैं।

जीत के बाद आचार्य यह खुशखबरी देते हैं कि मालवराज भोज कंकन को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर चुके हैं और अब कीर्तिराज और कंकन के विवाह में कोई भी बाधा नहीं है। अब तक तो शिव मन्दिर भी तैयार हो चुका था जिसमें कीर्तिराज के निर्देशनुसार कंकन के विविध भाव को मूर्ति का आकार दिया गया था और सम्पूर्ण मंदिर ऐसी मूर्तियों से सजाया गया था। कंकन और कीर्तिराज मंदिर में नित्य देव आराधना करते हैं और दोनों का विवाह संपन्न हो जाता है।

इस उपन्यास का कथानक क्योंकि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है, लेखक ने पूरा प्रयास किया है कि वह इन तथ्यों की प्रमाणिकता भी इंगित करता जाए, इसमें लेखन पुर्णतः सफल हुए हैं।

उपन्यास की भाषा शैली और शब्दों का चयन बड़ी ही सुघड़ता से चयनित किए गए हैं जिससे उपन्यास पाठक मन को बाँधने में कामयाब होती प्रतीत होती है। बीच-बीच में लेखक ने छंदमयी कविता को लिख कर चार चाँद लगा दिए हैं।

उपन्यास का मुख्यपृष्ठ लाल रंग का है जिसपर कंकनमठ की तस्वीर बनी हुई है जो बहुत ही आकर्षित बन पड़ी है, पीछे के पृष्ठ पर लेखक का परिचय छपा है।

इस उपन्यास को पढ़ते वक़्त कहीं कहीं प्रूफ-रीडिंग की गलतियाँ आँखों में खटक रही है जैसे भेंट को भेट, कंकन के लिए कहीं कहीं कंकण, कंक, इनके अलावा और भी कुछ शब्दों में गलतियाँ हुई हैं।

पर इन सब के बावजूद इस उपन्यास के द्वारा जो लेखक कहना चाहते हैं उसमे वे काफी हद तक सफल हुए है। मुझे यह उपन्यास पसंद आया है।

– कल्पना भट्ट

पुस्तक : ककनमठ
लेखक: पं. छोटेलाल भारद्वाज
प्रकाशक: प. दिनेश भारद्वाज
मूल्य: 500/- रूपये
प्रथम संस्करण: 1988
द्वितीय संस्करण: 2017

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