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Jungle Book : चिकचिक की पढ़ाई आई काम, वर्ना शेरसिंह का होता काम तमाम

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कल रात से चंपकवन के राजा शेरसिंह का कुछ अता पता नहीं था। रानी शेरनी ने बताया कि शेरसिंह कल रात को यह देखने निकले थे कि जंगल में सब ठीक ठाक है कि नहीं। लेकिन तब से वे वापस नहीं लौटे।

शेरसिंह रोज रात को सोने से पहले जंगल का एक चक्कर जरूर लगाते थे। वे जंगल के राजा थे तो अपनी प्रजा की देखभाल करना उनका कर्तव्य था। लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ था कि वे रात को न लौटे हों।

जब सुबह तक भी शेरसिंह नहीं आए तो रानी शेरनी ने अपने सेनापति भोलू भालू को इसकी सूचना दी। थोड़ी देर में शेरसिंह के गुम होने की खबर जंगल में आग की तरह फैल गयी। जिसने सुना वही शेरसिंह को ढूँढने निकल पड़ा।

दोपहर तक सबने मिलकर चंपकवन का कोना कोना छान मारा। लेकिन शेरसिंह का कुछ भी पता नहीं चला। चंपकवन के सारे जानवर उदास हो गये।

शेरसिंह के गुम होने से चीकू नीकू की मंडली भी बहुत दुःखी थी। लेकिन साथ ही वे शेरसिंह अंकल को खोजने के उपाय भी सोचते जा रहे थे। तभी नीकू खरगोश कुछ सोचते हुए बोला,

“दोस्तों! हमने पूरे चंपकवन का कोना कोना देख लिया है लेकिन शेरसिंह अंकल का कुछ भी पता नहीं चला। इसका सीधा सा मतलब है कि अंकल चंपकवन में नहीं हैं। जरूर वे चंपकवन से बाहर चले गये हैं।”

“लेकिन अंकल कहीं भी जाते तो आंटी को बताकर जाते। वे बिना बताए गये हैं। कहीं वे किसी मुसीबत में तो नहीं फंस गये?”

मीकू बंदर ने अपनी शंका जाहिर करते हुए कहा। यह सुनते ही मंडली के सारे जानवर चिंतित हो गये। तभी चिकचिक गिलहरी बोली,

“मीकू तुम सही कह रहे हो। अंकल जरूर किसी मुसीबत में हैं। अगर वे खुद से कहीं जाते तो बता कर जाते और अबतक वापस भी लौट आते। कहीं उनको किसी शिकारी ने तो नहीं पकड़ लिया?”

“हाँ चिकचिक तुम ठीक कह रही हो। हमने पहले यह नहीं सोचा। हमें एक बार फिर चंपकवन का चप्पा चप्पा देखना होगा। शायद शिकारी का कहीं कोई सुराग मिल जाए।”

गज्जू हाथी की बात सुनते ही डुगडुग डॉगी सोचने लगा कि उसने पहले ऐसा क्यों नहीं सोचा। खैर अब भी ज्यादा देर नहीं हुई थी। उसने शेरसिंह अंकल की गुफा के पास से सूंघना शुरू कर दिया। वह सूंघते हुए आगे बढ़ता जा रहा था और बाकी दोस्त उसके पीछे आ रहे थे।

धीरे धीरे वे जंगल के बाहर शहर तक आ गये। शाम हो गयी थी। चारों तरफ अंधेरा फैलने वाला था। उनके लिए अंधेरे में देखना तो आसान था। लेकिन इतने बड़े शहर में शेरसिंह को ढूँढना भूसे के ढेर में सुई खोजना था।

यहाँ शहर में चीकू, नीकू, मीकू, डुगडुग और गज्जू ही आए थे। हालाँकि चिकचिक भी साथ आना चाहती थी लेकिन उन्होंने चिकचिक को लाना उचित नहीं समझा। क्योंकि एक तो चिकचिक बोलती बहुत थी दूसरे उनको पता नहीं था कि शहर में उनको किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा?

दो तीन घंटे वे इधर उधर भटकते रहे लेकिन शेरसिंह का कुछ पता नहीं चला। तभी गज्जू की नजर सामने लगे एक पोस्टर पर पड़ी। पोस्टर पर अनेक जानवरों की तस्वीरें बनीं थीं। साथ ही कुछ लिखा भी था। अब पाँचों के सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि पोस्टर पर जो लिखा है उसे पढ़ा कैसे जाए? उन्होंने कभी पढ़ाई तो की नहीं थी। इस समय उनको चिकचिक की याद आ रही थी। चिकचिक चंपकवन में आने से पहले सुंदरवन में रहती थी। वहाँ रहकर उसने थोड़ा बहुत पढ़ना सीखा था। तभी नीकू उदास स्वरें बोला,

“काश! हम पढ़ पाते कि इस बड़े से कागज पर क्या लिखा है?”

“मुझे लगता है इससे हमे शेरसिंह अंकल का पता चल सकता है। इस वक्त चिकचिक हमारे साथ होती तो वह हमें बताती इस पर क्या लिखा है?”

यह कहकर चीकू ने अपनी गर्दन झुका ली। तभी पीछे से चिकचिक चहकती हुई बोली,

“दोस्तों! तुमने चिकचिक को याद किया और चिकचिक हाजिर हो गयी।”

चिकचिक को देखकर पाँचों के चेहरे खिल गये। गज्जू उसे सूंड से उठाते हुए बोला,

“चिकचिक! जल्दी से पढ़कर बताओ इस बड़े से कागज पर क्या लिखा है?”

“#जम्बो_सर्कस…

“भाइयों और बहनों! देखिए जानवरों के अद्भुत करतब.. आपके अपने शहर में..रोजाना तीन शो.. जम्बो सर्कस आपके शहर में इस माह की तीस तारीख तक ही है.. जल्दी करिए.. अपने बच्चों के साथ प्रगति मैदान पहुंचिए..”

चिकचिक एक साँस में पढ़ती चली गयी। सभी के चेहरे शर्म से झुक गये थे। आज उनको पढ़े लिखे न होने का अफसोस हो रहा था। जबकि छोटी सी चिकचिक ने फटाफट सब पढ़ लिया था। तभी चिकचिक ने परेशान सी आवाज में कहा,

“कहीं शेरसिंह अंकल इन सर्कस वालों के पास तो नहीं हैं? हमें तुरंत प्रगति मैदान पहुँचना चाहिए। आज तीस तारीख है। मतलब सर्कस का आखिरी दिन.. इसके बाद पता नहीं ये लोग कहाँ चले जाएँ?”

प्रगति मैदान ढूँढते ढूँढते रात हो गयी। जब वे लोग सर्कस के पंडाल तक पहुँचे तब आखिरी शो चल रहा था। अंदर का नज़ारा देखकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। शेरसिंह सहित कई जानवर वहाँ थे। बाकी सभी जानवरों को लोहे के एक बड़े से पिंजड़े रखा गया था लेकिन शेरसिंह एक अलग पिंजड़े में बंद थे।

शो खत्म होते ही सभी जानवरों को पंडाल के पीछे बनी जगह में ले जाया गया। चीकू नीकू की मंडली भी अंधेरे का फायदा उठाकर छिपते छिपते पीछे पहुँच गयी। सर्कस वाले थक कर चूर हो चुके थे। उन्होंने दोनों पिंजड़ों पर ताला डाला और वे वहाँ से चले गये। शायद खाना खाने। बस एक आदमी वहाँ बचा था जो उन जानवरों की देखभाल कर रहा था। दोनों पिंजड़ों की चाभी भी उसके पास थी।

एक आदमी को काबू में करना चीकू नीकू की मंडली के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था। सबने मिलकर उस आदमी पर धावा बोल दिया। मीकू ने पास पड़ी रस्सी लेकर उसके चारों ओर लपेट दी। अब वह हाथ पैर नहीं चला सकता था। गज्जू ने अपनी सूंड से उसका मुँह बंद कर दिया। चिकचिक बाहर जाकर खाना खाने गये लोगों पर नज़र रख रही थी। चीकू नीकू ने फटाफट पिंजड़े का ताला खोला और सभी जानवरों को आज़ाद कर दिया। सभी बिना आवाज़ किए बाहर निकल गये।

गज्जू उस आदमी का मुँह अपनी सूंड से बंद किए था इसलिए वह सबसे बाद में निकला। उसके बाहर आते ही वह आदमी जोर जोर से चिल्लाने लगा। लेकिन तब तक सभी जानवर चंपकवन की ओर दौड़ लगा चुके थे।

चंपकवन पहुँचकर चीकू नीकू ने सबको बताया कि कैसे चिकचिक ने सर्कस का पोस्टर पढ़कर उन्हें शेरसिंह तक पंहुचाया। अगर चिकचिक जंबो सर्कस के पोस्टर पढ़ न पाती तो वे कभी शेरसिंह तक नहीं पँहुच पाते। यह सुनकर शेरसिंह ने चिकचिक को शाबाशी दी और अगले दिन सभी जानवरों को पढ़ाने का काम उसे सौंप दिया।

– अलका श्रीवास्तव

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