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नगरवधू से तवायफ और फिर वेश्या बनने का सफ़र

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मैं पवित्रता की कसौटी पर पवित्रतम हूँ
क्योंकि मैं तुम्हारे समाज को
अपवित्र होने से बचाती हूँ।
मैं अपने अस्तित्व को तुम्हारे कल्याण के लिए खोती हूँ
स्वयं टूटकर भी, समाज को टूटने से बचाती हूँ।
और तुम मेरे लिए नित्य नयी
दीवार खड़ी करते हो,
मैं तो यहाँ स्वाभिमान के साथ
तलवार की नोंक पर रहकर भी,
तन बेचकर, मन की पवित्रता को बचा लेती हूँ ।।

वेश्या की जो परिभाषा हमने समझी या देखी है, वो केवल फिल्मों से, फिल्मों ने हमें बताया तवायफें कोठों की शान होती हैं, शरीर के बदले धन की चाह रखने वाली, खुद को बेचकर अपना गुज़ारा करने वाली, हमने इन सब बातों पर यकीन कर लिया, किन्तु, यह सच 19वीं सदी के बाद का है, इसके पहले तक तवायफें बदनाम नहीं थीं, बल्कि वे मज़हब, शराफत और तालीम का वो घरौंदा थीं, जहां बड़े-बड़े नवाब अपने बच्चों को तहज़ीब सीखने भेजा करते थे।

चलिए आज आपको मैं एक सफरनामे पर ले चलता हूँ और ये सफरनामा है तवायफों से वेश्या बनने का —

तवायफों को तीन श्रेणियों गंधर्व, रामजानी, और गौनहारिन में विभाजित किया गया था, यह श्रेणियां 19वीं सदी से पहले ही तय कर दी गईं थी, जिसका जिक्र श्यामलिक ने ‘बन पद तडितकम’ में किया है।

इसके अनुसार गंधर्व यानि वे महिलाएं, जो किसी एक पुरुष के साथ उसकी दासी बनकर रह जाती थीं, घरों की महफ़िलें सजाती थीं, रामजानी वे महिलाएं थीं, जो नृत्य और संगीत को व्यवसाय बनाकर किसी भी महफ़िल में शामिल होती थीं, गौनहारिन वे बुजुर्ग महिलाएं होती थीं, जो दुल्हन की शादी के बाद उसकी बिदाई पर जाकर महफ़िल को गायन से सजाया करती थीं।

कश्मीर के राजा जयपीड (779-813) के मंत्री दामोदर गुप्त ने अपनी किताब ‘कूट्नीमतम’ में बनारस के उन कोठों का ज़िक्र किया है, जहां कश्मीर से आईं तवायफों ने महफिलें सजाईं और फिर वे यहीं की होकर रह गईं।

मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने 1827 में अपनी बनारस यात्रा पर एक किताब ‘चिराग-ए-दायर’ लिखी थी, जिसमें बनारस की तवायफों के संगीत और कला पर विस्तार से जानकारी दी, मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने शेर में बनारस की महफ़िलों के आकर्षण के बारे में लिखा है, उनकी किताब से स्पष्ट होता है कि मुजरे या महफिलें केवल पुरूषों के लिए नहीं थीं बल्कि उनका पूरा परिवार संगीत-नृत्य का आनंद लेता था।

मैंने काफी प्रयत्न किया कि इनके बारे में कुछ जानकारी प्राप्त कर सकूं लेकिन लेकिन सभी का इतिहास सुरक्षित नहीं है. जो आखिरी सुरक्षित इतिहास मिलता है लेकिन कुछ मशहूर तवायफों में यदि देखा जाए तो –

सिद्धेश्वरी देवी का नाम सबसे पहले आता है, सिद्धेश्वरी देवी चंदा बाई की बेटी थी, सन् 1900 में उन्होंने सियाजी महाराज से संगीत की तालीम ली, उनका कोठा मणिकर्णिका घाट के पास था।

रसूलनबाई, शंभू खां रसूलन बाई के उस्ताद थे और उनका कोठा बनारस की दालमंडी में था, वे कोठे के अलावा बनारस के चौराहों पर भी महफिलें सजाती थीं। इन महफिलों की खास बात यह थी कि यहां रईसों के साथ आम आदमी भी पहुंच पाता था, जिसके कारण रसूलनबाई बनारस के हर आम आदमी की पसंद बन गईं।

वृन्दावनी श्रृंगार की बंदिशें ‘लागत करेजवा में चोट’ जब कानों में गूंजती है तो जुबां पर पहला नाम जद्दन बाई का आता है, उनकी आवाज में तो जादू था ही साथ ही उनका रंग-रूप अच्छे-अच्छों को अपना दीवाना बना लेता था, जद्दन बाई ने संगीत की शिक्षा मशहूर दरगाही मिश्र और उनके सारंगी वादक बेटे गोवर्धन मिश्र से ली थी।

अब सवाल ये है कि मशहूर संगीत और तहजीब की ये मंडिया देह की मंडियों में कब बदल गयी-

मुगलकाल और राजशाही का दौर अंग्रेजों के आने के बाद से कमज़ोर होने लगा था, जब देश में ब्रिटिश क्राउन लॉ लागू हुआ तो तवायफों को वेश्याओं की श्रेणी में ला खड़ा किया, उनकी महफिलों पर अश्लीलता फैलाने का तमगा लगाकर बदनाम किया गया, फिर कोठों को गैरकानूनी करार दे दिया गया, ब्रिटिश काल की अदालतों ने कहा कि यहां नाच गाना नाम का है, कोठों पर असल में जिस्मफरोशी होती है!

तवायफों में ब्रिटिश हुकूमत के प्रति गुस्सा था, इसलिए उन्होंने 1857 में हुई क्रांति को हवा देने का काम किया, कई कोठे क्रांतिकारियों की पनाहगार बने, रसूलनबाई और जद्दन बाई ने तो खुलकर क्रांति में सहयोग दिया।

यही कारण है कि वे अंग्रेजों की नज़र में आईं और उनके कोठे खाली करवा लिए गए। उनके अलावा कई और भी तवायफें थीं जो फुटपाथ पर आ चुकी थीं। कोठे छिनने से सिर पर से छत चली गई। दूसरी मार तब पड़ी जब देश में रेडियो पहुंचा। रेडियो ने संगीत को घर-घर तक पहुंचा दिया था। सो अब तवायफों के पास तक आने की जहमत कोई भला क्यों उठाता।

पेट पालने के कुछ तवायफों ने नवाबों की दूसरी बीवी बनना स्वीकार किया तो कुछ रखैल बनकर जीती गईं। जिन्हें ये दोनों रिश्ते नसीब नहीं हुए उन्होंने जिस्मफरोशी को अपनाया, इस तरह अंग्रेजों के देश से जाते-जाते तक कोठे, मंडियों में तब्दील हो चुके थे, जिस्मफरोशी पहले मजबूरी बना पर धीरे-धीरे यह फायदे का धंधा होता गया, गलियों से मुजरे का संगीत आना बंद हो गया और तवायफें वेश्या बन गईं।

यदि आज भी कभी मन हो कि वेश्या की जगह तवायफ का वो पुराना मुजरा देखने का है, तो एकमात्र ठिकाना है-मर्णिकर्णिंका घाट! कहा जाता है कि यहां ‘वेश्याएं’ एक रात के लिए ‘तवायफ’ बनती हैं, साथ ही अपने मोक्ष की कामना मन में लिए, आंखे बंद कर केवल शिव की भक्ति में मग्न होकर चिताओं के बीच नाचती है!

विशेष

बात जब संगीत की होती है, तो यहां की तवायफों का जिक्र करना जरूरी हो जाता है, 18वीं शताब्दी तक महलों में संगीत की महफिलें सजने का दौर शुरू हो चुका था। काशी संगीत की जन्मभूमि और कई साधकों की कर्मस्थली रही है, ऐसा होना लाजमी भी है, क्योंकि शिव की भक्ति बिना संगीत के अधूरी है, यहां के धार्मिक वातावरण और सांस्कृतिक परिवेश ने संगीत के कलाकारों को अपनी प्रतिभा मांजने का मौका दिया है, इतिहास पर गौर करें तो इसे ‘गुथिल’ जैसे संगीतज्ञों ने अपनी कला से नवाजा था।

‘गुथिल’ के बारे में कहा जाता है कि ये वीणा बजाने में सिद्धहस्थ थे, 14वीं सदी में हस्तिमल द्वारा रचित नाटक ‘विक्रांत कौरवम्’ में बनारस के संगीत की व्याख्या देखने मिलती है, 16वीं सदी में काशी के शासक गोविन्द चन्द्र के समय गणपति अपने कृति ‘माधवानल कामकंदला’ में नाचगाना, कठपुतली का तमाशा और भाँड का विवरण देते हैं । इससे स्पष्ट है कि बनारस में संगीत और महफिलें सजने का दौर 16वीं सदी के दौरान शुरू हो चुका था।

खास बात यह है कि बनारस में तानसेन के वंशज काशीराज दरबार की शोभा हुआ करते थे, मंदिरों, गंगा घाटों और खानपान के अलावा बनारस को उसके संगीत ने ख्याति दिलवाई। नगरवधु और नगर नृत्की जैसी श्रेणियां बन चुकी थीं। लेकिन इस व्यवस्था में केवल कुछ कुशल नृत्कियां ही शामिल थीं, जैसे-जैसे प्रतियोगिता का दौर आता गया वैसे-वैसे व्यवस्थाएं बदलती गईं। 18वीं शताब्दी के अन्त तक तवायफों ने अपनी महफिलें महलों से निकलकर कोठो में सजानी शुरू कर दी।

इतिहासकारों का मानना है कि बनारस में तवायफों का शुरुआती दौर मुगलशासन काल में रहा क्योंकि तवायफ मुगलों की ही देन थी, उन्होंने ही हरम में रखी अच्छे घर की औरतों को तवायफ बनाया लेकिन वहां तब भी महिलाओं ने अपना वजूद नहीं खोया और तहज़ीब तमीज़ की पर्याय बनी रही।

19वीं सदी शुरू होते तक बनारस के राजपरिवारों में महाराज अपने मंत्रीमंडलों के साथ महफिलों का आनंद लेते थे, ज़मींदार और ठाकुर कोठों पर मुजरा सुनने पहुंचा करते थे, इन दोनों ही जगहों पर धन की इतनी बारिश होती थी कि तवायफों को कभी आर्थिक नुकसान का सामना नहीं करना पड़ा। राज दरबारों, रईसों की कोठियों के अलावा मंदिरों और मठों में भी संगीत की महफिल सजती थी।

मुजरा और नृत्य यहां कभी भी अश्लीलता का पर्याय नहीं बने। मंदिरों में भजनों की शानदार प्रस्तुतियां दी जाती थीं। नृत्यनाटिका के जरिए रामायण, शिव पुराण, तांडव जैसे कई पौराणिक कथाओं को जीवंत करने का प्रयास होता रहा। उच्च वर्ग (रईस ) के घरों में पड़ने वाले मुंडन, शादी, कर्णछेदन, उपनयन संस्कारों में भी संगीत प्रस्तुति देने के लिए तवायफों को बुलाया जाता रहा।

वेश्याओं को मैं वंदनीय मानता हूँ क्योंकि वो तन बेचती है ताकि अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके लेकिन उनका क्या जो पैसे के लिए समाज मे अश्लीलता फैला रही हैं, शायद उनके लिए ही रंडी शब्द बना है।

बच्ची हूं, बगल खिलौना है, खेल हूं लोगों की भूख हूं, मेरी देह पे लिखा है, सु-स्वागतम ।।

– अजेष्ठ त्रिपाठी

मुझे ,
इतिहास में काल, स्थान और परिस्थिति के अनुसार सख्ती से परिभाषित किया जाना
किसी स्वयंभू न्यायाधीश की खंडित होती मुहर मात्र ही है।

कर्तव्यपरायणता के शिलालेख, त्याग -मूर्ति व प्रस्तर लिखित उपाधियाँ दिखाकर,
मुझे, मेरा इतिहास-दर्शन कराया जाता रहा है।

कभी मुझे अनगिनत प्रेम-गाथाओं में लौह-स्तम्भ पुकार कर
प्रेमानुभूति के प्रति संवेदनशील द्वारपालिका पद पर पदोन्नत भी किया गया।

हालाँकि, उन स्तम्भों में कुछ जंग लगनी शुरू हो चुकी थी
और ये सब ऐतिहासिक पुनरावर्त्ति करते हुए उन्होंने
उन स्त्रियों को दरकिनार रखने की विशेष ताक़ीद की…
जो, प्रेम व सभ्यता के नाम पर बस्तियों से बाहर, शरणार्थी तंबुओं में बसा दी जाती रही हैं…

जहाँ से गहन अंधकार में, उनकी बस्तियों की ओर..
शारीरिक-पिघलाव हेतु पुरातन आवाजाही बनी हुई है।

इन स्त्रियों के प्रेमियों के पीतवर्णी प्रेम-पत्र आज भी मन की गुफ़ाओं में वातायन बने हुए हैं
जो उनकी देह से रिसते दुर्गंधमय मवाद में भी ऊर्जा-संवाहक बनती है।

इन्हें अपनी विरक्तियों में से रिक्तियों को स्वेद द्वारा यूँ ही पोंछना बख़ूबी आता है
मैंने इन स्त्रियों को कई बार अल्लाकर यह कहना चाहा है कि
इतिहास सदैव गौरवशाली व गरिमामयी के रूप में ही स्वीकार्य है।

वर्तमान-धारकों को इतिहास के प्रेरक पात्र चुनकर उन्हें पूजने की आदत है।
यह हमारी मानसिक विपिन्न्ताओं से निर्मित पसन्दीदा कारागार है।

इसलिये अवसर पाते ही अपनी देह को तेज धूप अवश्य दिखाते रहना
ताकि अतीत की सड़ांध मारती मिश्रित देह गन्ध तुम्हें यह याद दिलाती रहे कि
इस इतिहास में तुम्हे “नगरवधू” पद से उच्चारित कर,
वधू शब्द पर ही प्रश्न-चिह्न लगा दिया था ।

आज भी जब तुम्हारे ‘निशिद्धो पाली’ जैसे आँगनों से ‘पुण्य-माटी’ को पवित्र ‘दुर्गा मूर्ति’ हेतु माँग कर…
विशेष मन्त्र द्वारा शुद्धिकरण किया जाता है
तो, उस वक़्त तुम ‘सोनागाछी ‘जैसी तंग दैहिक साम्राज्यों
से जाते हुए
कुछ जूतों में चिपकी हुई इसी माटी को दूर छिटकते हुए देख कर अट्टहास जरूर करती होगी।

तुम कभी मत भूलना कि, इतिहास मात्र महिमामंडित होना पसन्द करता है..
परिमार्जित होते हुए पुनः परिभाषित होना, तो कदापि नहीं।

– मंजुला बिष्ट

(सोनागाछी, (कोलकाता) एशिया का सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया है, जहाँ सैकड़ों तंग,बहु-मंजिला इमारतों में अनुमानतः करीब 11,000 सैक्स- वर्कर्स रहती हैं।)

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