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नव युग चूमे नैन तिहारे, जागो, जागो मोहन प्यारे…

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पूर्व में सूर्योदय हो चुका है। बाल अरुण अपनी पूर्ण आभा से प्रकाशित हो अपने प्रखर तेज से दसों दिशाओं को आलोकित करने वाला है। नभ में विहग पंक्ति रक्ताभ्र मेघ पर ऐसे सुशोभित है मानो किसी स्वर्णमय पात्र में कस्तूरी का छिड़काव किया हो।

रात भर कोलाहल कर रहे सियारों का स्वर मन्द हुआ है। धूर्त निशाचर उजाला हुआ जान कहीं छिप गए हैं। पापी कुकर्मी और रात के अँधेरे में ही अपनी जीविका की प्रत्याशा पाले और इसलिए अंधकार ही जिनका अभीष्ट है ऐसे दुर्विनीत दुरात्माओं की दुर्दमनीय मलीन आत्मा किसी दुराशा से दोलायमान है।

प्रकृति के विपरीत विकृति में ही निरंतर सुख खोजते गुप्त कार्यों में लगे गोप्ता और उनका सहजता से संरक्षण करने वाले निषिद्ध कर्म को ही विहित कर्म मानने वाले, रोग की आशंका से अनजान भोग को ही सर्वस्व जानने वाले, इन्द्रियाधीन, अविजित मनसा, सुख के वास्तविक अर्थ से अनजान स्वयं दुखों का वरण करने वाले, अपचारी जनों का अपकर्ष हुआ है।

प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, नित्य स्नायी, ब्रह्म ज्ञान के जिज्ञासु, आत्म विद्या विभूषित, सरल वाग्मी, कृत शुभ संकल्पी, स्वाध्यायी, वेदपाठी विद्यार्थियों के सुमधुर कण्ठ से निःसृत वेद मन्त्रों की पावन ध्वनि से आकाश गुंजरित हो रहा है।

प्रातःकाल अपने वत्स से दूर वन प्रदेश को जाती, बार बार पीछे मुड़कर रम्भाती हुई, अभी अभी जिसका दूध निकाला है ऐसी सद्य दुहितागाय, अपनी ही स्वामिनी द्वारा बल पूर्वक ठेली जाती हुई देखी जा रही है।

घर से कुछ ही दूर स्थित वृक्ष जो वैशाख मास की वृत्त धारिनियो द्वारा प्रतिदिन सींचा गया है, के शिखर पर बैठा कोलाहल करता काक समूह जो किसी वृद्धा के लिए कष्टकर और प्रौषित पतिका के लिए प्रिय के आगमन का अचूक सूचक और इसलिए आशा का संचारक, परस्पर दो विरोधियों के स्वभाव से अनभिज्ञ अपने ही भाव में स्थित फिर भी योगियों से अतुलनीय निरपेक्ष भाव से विराज रहा है।

– केसरी सिंह सूर्यवंशी

जब उजियारा छाये
मन का अन्धेरा जाये
किरणों की रानी गाये
जागो हे, मेरे मन मोहन प्यारे

जागी रे जागी रे जग कलियां जागी
जागी रे जागी रे जागी रे

नव युग चूमे नैन तिहारे
जागो, जागो मोहन प्यारे

भीगी भीगी अँखियों से मुसकाये
ये नई भोर तोहे अंग लगाये
बाहें फैला ओ दुखियारे
जागो मोहन प्यारे…

जिसने मन का दीप जलाया
दुनिया को उसने ही उजला पाया
मत रहना अँखियों के सहारे
जागो मोहन प्यारे…

किरण परी गगरी छलकाये
ज्योत का प्यासा प्यास बुझाये
फूल बने मन के अंगारे
जागो मोहन प्यारे …

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