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जादू की झप्पी : लाख दुखों की एक दवा है काहे घबराए

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उनके पास पैसा, शोहरत, कामयाबी यानी वह सब कुछ था, जो किसी की भी हसरत हो सकती है, फिर चाहे आध्यात्मिक गुरु भय्यू जी महाराज हों या सिलेब्रिटी शेफ एंथनी बॉर्डियन या फिर पुलिस अधिकारी राजेश साहनी। वे जिस मुकाम पर पहुंचे, वहां कम ही लोग पहुंच पाते हैं फिर भी उन्होंने जिंदगी से मुंह मोड़ लिया।

दरअसल, सब कुछ होते हुए भी उदासी/हताशा या डिप्रेशन का दौर कई बार इस कदर घेर लेता है कि इंसान ज़िंदगी से बेज़ार हो जाता है। अगर हमारे आसपास ऐसा कोई हो जो डिप्रेशन के दौर से गुज़र रहा हो तो हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने करीबियों को डिप्रेशन से बाहर निकालें। हम कैसे कर सकते हैं मदद, एक्सपर्ट्स से बात करके जानकारी दे रही हैं प्रियंका सिंह

मॉली (बदला हुआ नाम) तीन साल की थी। उसके पैरंट्स का हाल में तलाक हुआ था। इसके बाद से मॉली के बर्ताव में कई तरह के बदलाव हुए। उसने खाना खाना छोड़ दिया। दोस्तों के साथ खेलना छोड़ दिया। वह गुमसुम रहने लगी। यहां तक कि मां से एक-दो बार बोल दिया कि भगवान मुझे अपने पास बुला लें। इतनी छोटी बच्ची के मुंह से ऐसी बात सुनकर मां परेशान हो गई और वह उसे लेकर पीडियाट्रिशन के पास पहुंची।

जांच में डॉक्टर इस नतीजे पर पहुंचा कि मम्मी-पापा के तलाक की वजह से मॉली को डिप्रेशन हो गया था। काउंसलिंग और दवाओं के बाद मॉली ठीक हो गई।

आकर्षक व्यक्तित्व के नलिन (बदला हुआ नाम) अच्छी कंपनी में काम करते थे। 30 साल के नलिन अचानक उदास रहने लगे। उनका मन किसी काम में नहीं लगता। उन्होंने अपने लुक पर ध्यान देना भी बंद कर दिया। धीरे-धीरे ऑफिस से भी बार-बार छुट्टी करने लगे। बड़े भाई ने बहुत पूछा लेकिन कुछ पता नहीं चला। तब वह नलिन को लेकर सायकायट्रिस्ट के पास गए।

2-3 मुलाकात के बाद नलिन ने बताया कि उनकी गर्लफ्रेंड थी, जिससे वह दो साल पहले अलग हुए थे। उन्हें लगता था कि वह आगे बढ़ गए हैं लेकिन वह उसे भुला नहीं पाए और धीरे-धीरे डिप्रेशन में आ गए। बहरहाल, काउंसलिंग, दवा और घरवालों की मदद से नलिन जल्द ही इस दौर से निकल आए।

ये दोनों ही मामले डिप्रेशन के हैं। डिप्रेशन ऐसी बीमारी है, जो कभी भी, किसी को भी हो सकता है। यहां तक कि 3 साल के बच्चे से लेकर 90 साल के बुजुर्ग तक को।

उदासी और डिप्रेशन में फर्क

उदासी और डिप्रेशन के बीच फर्क जानना जरूरी है। उदास तो हम सभी होते हैं और लगभग रोज होते हैं लेकिन फिर जल्द ही नॉर्मल हो जाते हैं लेकिन उदासी अगर लंबे समय (कम-से-कम दो हफ्ते) तक चलती रहे और इसका असर हमारी रोज़ाना की ज़िंदगी पर पड़ने लगे तो यह डिप्रेशन बन जाती है।

दरअसल, यह न्यूरो से जुड़ा एक डिस्ऑर्डर है, जोकि दिमाग के उस हिस्से में बदलाव आने पर होता है, जोकि मूड को कंट्रोल करता है। इसकी चपेट में कोई भी आ सकता है। माना जाता है कि 5 में से 1 एडल्ट ज़िंदगी में एक बार डिप्रेशन का शिकार जरूर होते हैं।

वैसे बड़े ही नहीं, बच्चे भी डिप्रेशन का शिकार होते हैं, खासकर पैरंट्स के बीच झगड़ा होने, स्कूल रिजल्ट खराब आने या फिर किसी खास दोस्त के साथ दोस्ती टूटने पर। ऐसे में पैरंट्स का रोल है कि वे अगर बच्चे को हफ्ते भर तक गुमसुम या परेशान देखें तो सायकॉलजिस्ट के पास जरूर लेकर जाएं।

कैसे पहचानें डिप्रेशन को

जिस शख्स को डिप्रेशन होता है, वह अक्सर इसे पहचान नहीं पाता। अगर पहचान भी लेता है तो स्वीकार नहीं करना चाहता। ऐसे में मरीज के करीबियों की जिम्मेदारी है कि वे लक्षण देखकर बीमारी को पहचानें। ऐसे कुछ लक्षण हो सकते हैं:

1. सायकलॉजिकल

– अक्सर उदास या परेशान रहना
– निगेटिव बातें करना
– खुद को कोसते रहना
– किसी से मिलने से बचना
– खुशी के मौकों पर भी दुखी रहना
– चिढ़कर या झल्लाकर जवाब देना
– सजना-संवरना बंद कर देना

2. बायलॉजिकल

– खूब सोना या बिल्कुल न सोना
– खाने की इच्छा न होना या बहुत ज़्यादा खाना

3. फिज़िकल

– लगातार ज्यादा थकान रहना
– वज़न अचानक बढ़ जाना या तेज़ी से कम हो जाना
– सिरदर्द और बदन दर्द की शिकायत करना

ये हो सकती हैं वजहें

– किसी करीबी की मौत या बिछुड़ जाना
– नौकरी छूटना या कारोबार, पैसे-जायदाद का नुकसान
– रिटायरमेंट के बाद खुद को बेकार समझना
– किसी काम में उम्मीद मुताबिक नतीजा न मिलना
– पैसे का बहुत नुकसान या क़र्ज़ में दब जाना
– भविष्य के प्रति अनिश्चितता
– किसी बड़ी बीमारी या मौत की आशंका
– जिनेटिक यानी जीन्स में कोई गड़बड़ी
– फैमिली में किसी को यह बीमारी होना
– हॉर्मोन्स में बदलाव (डिलिवरी या मिनोपॉज के बाद)
– रिज़ल्ट खराब आना
– ब्रेकअप होना

कब और किस डॉक्टर के पास जाएं

अगर किसी को 10-15 दिन तक उदासी का दौर बना रहता है तो उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। जिस तरह ब्लड प्रेशर, थायरॉइड या फिर दूसरी बीमारियों के इलाज के लिए डॉक्टर की ज़रूरत पड़ती है, उसी तरह डिप्रेशन के लिए भी डॉक्टर से मदद लेना ज़रूरी है। इसके लिए साइकॉलजिस्ट या सायकायट्रिस्ट से मिल सकते हैं।

अगर बीमारी बहुत बढ़ी नहीं है तो साइकॉलजिस्ट से मिलने की सलाह दी जाती है और काउंसलिंग काफी होती है। साइकॉलजिस्ट मरीज को दवा नहीं दे सकते। उनका काम मरीज की काउंसलिंग का होता है। बीमारी बढ़ जाए तो सायकायट्रिस्ट की मदद लेनी पड़ती है। सायकायट्रिस्ट काउंसलिंग के साथ-साथ मरीज को दवाएं भी देता है। इनके पास एमबीबीएस डिग्री के अलावा सायकायट्री में स्पेशलाइजेशन भी होता है।

क्या कर सकते हैं आप

आपके किसी करीबी को डिप्रेशन है तो डॉक्टर को दिखाने के अलावा आपकी भी ज़िम्मेदारी है कि आप उसे इस स्थिति से बाहर निकालें। इसके लिए आप ये काम कर सकते हैं:

1. मानें, उसे है बीमारी

जिस तरह बुखार, पेटदर्द या दूसरी बीमारियों में इलाज की ज़रूरत है, वैसे ही डिप्रेशन में भी इलाज बहुत ज़रूरी है। आप यह न सोचें कि इसकी तो आदत ही है मुंह फुलाए रखने की या दूसरों को परेशान करने की। स्वीकार करें कि वह बीमार है और उसे इलाज के साथ-साथ आपकी मदद की भी ज़रूरत है। जिस तरह चिकनगुनिया के दर्द को हम महीनों बाद भी मानते हैं कि दर्द हो सकता है, उसी तरह डिप्रेशन को भी बीमारी मानना ज़रूरी है।

2. उसकी बात सुनें

मरीज की बातें सुनें। उसकी भावनाओं को समझें। वह जो भी बोलना चाहे, उसे बोलने दें बिना कोई टिप्पणी किए। न उसे सलाह दें, न ही जबरन खुश करने की कोशिश करें। आपको बस उसके मन की बात सुननी है। अगर वह किसी से नाराज़ है या उसके बारे में भला-बुरा कह रहा है और बेशक आपको यह बात पसंद नहीं है तो भी उसे टोकें नहीं।

अगर किसी ब्रेकअप वगैरह की वजह से उसकी यह स्थिति हुई है तो भी उसके एक्स के बारे में कोई गलत बात न करें। उसे मन की बात निकालने का मौका दें। उसकी बात सुनें। हालांकि अक्सर ऐसा होता है कि डिप्रेशन का मरीज शुरू में अपने मन की बात किसी से नहीं करना चाहता। उसके मन को खोलना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में आप जबरन उसे कुरेदें नहीं। इधर-उधर की बातें करें। किसी और के ज़िक्र के बहाने उसकी समस्या पर बात करें जैसे कि मेरी एक फ्रेंड है, जिसके दोस्त ने उसे धोखा दे दिया था। फिर उसने कैसे खुद को संभाला आदि। धीरे-धीरे वह अपने मन की बात कहने लगेगा।

3. आराम से बात करें

मरीज को गुस्सा ज़्यादा आता है। वह बात-बात पर गुस्सा करता है या नाराज़ हो जाता है। ऐसे में आपको अपना संयम बनाए रखना है। यह न हो कि आप झुंझलाने लगें कि एक तो मैं इसका साथ दे रहा हूं या मदद कर रहा हूं और यह मुझसे ही नाराज़ हो रहा है।

दरअसल, पीड़ित को तो पता भी नहीं होता कि आप उसकी मदद कर रहे हैं। वह चीखे-चिल्लाए तो भी आप ऊंची आवाज़ में बात न करें। यहां तक कि अगर वह आप पर कुछ उठाकर मारने की कोशिश करे तो भी आप खुद को कंट्रोल में रखें। खुद को समझाएं कि वह बीमारी में ऐसा कर रहा है।

हां, एक लक्ष्मण रेखा ज़रूर तय करें। मसलन प्यार से समझाएं कि इस तरह मारपीट या गाली-गलौच अच्छी बात नहीं है। आप प्यार से बात करेंगे तो धीरे-धीरे उसका मन शांत हो जाएगा। साथ ही, उसे किसी काम के लिए मजबूर न करें मसलन यह खा लो, चलो बाहर चलते हैं, किसी से बात क्यों नहीं करते आदि। इस तरह के वाक्य न बोलें।

4. उसका भरोसा जीतें

डिप्रेशन के दौरान मरीज अक्सर पूछता है कि मेरे साथ ही इतना बुरा क्यों होता है? ऐसे में आप उसका हाथ थाम कर बोलें कि वह अकेला नहीं है। ऐसा कभी-न-कभी हर किसी के साथ होता है। बातों-बातों में उसे बताएं कि वह दुनिया का पहला शख्स नहीं है, जिसके साथ ऐसा हुआ है या जिसे कोई छोड़कर गया है। ऐसे ब्रेकअप के किस्सों से दुनिया भरी पड़ी हैं। अगर कोई उदाहरण आसपास मौजूद हो और वह सामान्य जिंदगी जी रहा हो तो उससे मिलवा भी दें।

अगर वह फोन, चैट या मेसेज से एक्स पार्टनर को परेशान करता है तो उसे ऐसा करने से रोकें क्योंकि इसका कोई फायदा नहीं है। अगर वह बदला लेने की बात करे तो भी समझाएं कि इसका कोई फायदा नहीं है। बदला किसी बात का हल नहीं है। इससे दूसरे के साथ-साथ अपना भी नुकसान होता है। उसे उम्मीद की किरण दिखाएं।

5. तारीफ करें

उसकी खुलकर तारीफ करें। कहें कि तुम फाइटर हो, तुमने बहुत अच्छा किया। तुममें इस बीमारी से लड़ने की क्षमता है। अपने बारे में अच्छी बातें सुनकर उसका खुद पर विश्वास बढ़ेगा। इसके अलावा, वह जो काम करें उसकी भी तारीफ करें जैसे कि अगर उसने खाने के लिए कुछ बनाया या फिर कोई पेंटिंग की तो जरूर बताएं कि यह बहुत अच्छा बना है। तारीफ से उसके मन में उत्साह का संचार होगा।

6. एक्सपर्ट की मदद लें

अगर तमाम कोशिशों के बाद भी मरीज की उदासी कम नहीं हो रही है और यह दौर 10-15 दिन तक जारी रहता है तो एक्सपर्ट की मदद लें। काउंसलर से लेकर सायकॉलजिस्ट और सायकायट्रिस्ट तक, इसमें मदद कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर दवाएं भी दी जाती हैं। यह न सोचें कि इसकी तो आदत है ऐसे ही परेशान रहने की। एक्सपर्ट की मदद से आप अपने करीबी को जल्द ही इस स्थिति से बाहर निकाल लेंगे। कई बार ऐसा भी होता है कि वह आपसे कुछ बातें शेयर नहीं करना चाहता लेकिन काउंसलर या सायकॉलजिस्ट से कर लेता है। हां, एक्सपर्ट के पास ले जाने से पहले उसे बता दें और इसके लिए तैयार करें।

7. हॉबी क्लास जॉइन कराएं

बहुत ज़रूरी है कि डिप्रेशन के मरीज को उस काम में लगाएं, जो उसे पसंद है जैसे कि कुकिंग, गार्डनिंग, पेंटिंग आदि। डॉग आदि पालने से भी डिप्रेशन से निपटने में मदद मिलती है। वैसे, बेहतर है कि आप उसे कोई हॉबी क्लास जॉइन करा दें। हो सके तो खुद भी उसके साथ जॉइन करें ताकि उसे आपका साथ मिलता रहे और वह अकेला महसूस न करे।

8. एफएम बजाएं

पीड़ित के आसपास अच्छे मधुर गाने बजाएं। याद रखें, ये उदासी भरे न हों। एफएम इसमें काफी मदददगार साबित होता है क्योंकि वहां अक्सर जोश-खरोश वाले गाने बजते हैं और आरजे भी इसी मूड में रहते हैं। कॉमिडी फिल्में भी लगा सकते हैं। कॉमिडी फिल्में तनाव को कम करती हैं। आप अपने दोस्त के साथ मिलकर कॉमिडी फिल्म देखें तो मजा दोगुना हो जाएगा।

9. डाइट बेहतर बनाएं

चॉकलेट खाने को दें। इससे मूड अच्छा होता है। मूड को बेहतर बनाने वाली दूसरी चीजें डाइट में शामिल करें। न्यूट्रिशन से भरपूर खाना खिलाएं जैसे कि ओट्स, गेहूं आदि अनाज, अंडे, दूध-दही, पनीर, हरी सब्जियां और फल। एंटी-ऑक्सिडेंट और विटामिन-सी वाली चीजें जैसे कि ब्रोकली, सीताफल, पालक, अखरोट, किशमिश, शकरकंद, जामुन, ब्लूबेरी, कीवी, संतरा आदि को भी उसकी डाइट में शामिल करें। इसी तरह ओमेगा-थ्री से भरपूर चीजें फ्लैक्ससीड्स, नट्स, कनोला, सोयाबीन आदि भी खिलाएं। खाने की रंगीन चीजों जैसे कि गाजर, टमाटर, ब्लूबेरी, ऑरेंज आदि पर फोकस करें।

10. साथ-साथ करें कसरत

रिसर्च बताती हैं कि रेग्युलर वर्कआउट करने से वे हॉर्मोन (एंडॉर्फिन आदि) निकलते हैं तो जो मन को खुश करते हैं और डिप्रेशन दूर करते हैं। रोजाना 45-60 मिनट एक्सरसाइज ज़रूर करनी चाहिए। आप खुद भी मरीज के साथ वॉक, जॉगिंग, स्वीमिंग और दूसरी एक्सरसाइज करें। आउटडोर गेम्स के जरिए भी तनाव दूर किया जा सकता है।

साथ ही योग और प्राणायाम को भी रुटीन में शामिल करें। सूर्य प्राणायाम करें। यह अपने आप में संपूर्ण एक्सरसाइज है। ताड़ासन, कटिचक्रासन, भुजंगासन, धनुआसन, मंडूकासन आदि आसन भी कर सकते हैं। शवासन जरूर करें। इससे मन काफी रिलैक्स होता है। डीप ब्रीदिंग, कपालभाति और अनुलोम-विलोम से भी मदद मिलती है। 10 मिनट मेडिटेशन करें। माइंडफुल मेडिटेशन ट्राई कर सकते हैं। 10 मिनट नंगे पांव हरी घास पर चलना चाहिए। तेल मालिश से भी डिप्रेशन में फायदा होता है।

क्या न करें

1. डांटें या दुत्कारें नहीं

अक्सर डिप्रेशन में मरीज आपकी बात नहीं मानता या फिर मरने-मारने की बातें करने लगता है। ऐसे में आप उसे डांटें बिल्कुल नहीं। न ही मनोबल तोड़ने वाली बातें करें कि तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता या फिर तुम्हारी खुद की बुलाई बीमारी है यह। इस तरह की बातें न करें। फिजूल सलाह भी न दें कि तुम ऐसा क्यों नहीं करते, वैसा क्यों नहीं करते आदि। मरीज को चैलेंज बिल्कुल न करें मसलन अगर वह कहता है कि मैं मर जाऊंगा तो आप यह न करें कि जाओ मर जाओ या ऐसा करके दिखाओ। उस पर गुस्सा और मारपीट तो बिल्कुल न करें। इससे उसका डिप्रेशन बढ़ जाएगा और वह खुद को और बेकार समझने लगेगा।

2. दोष न दें

डिप्रेशन में दवा और काउंसलिंग की तरह ही परिवार और दोस्तों का सही एटिट्यूड बहुत ज़रूरी है। मरीज को दोष बिल्कुल न दें। यह न कहें कि तुम्हारी वजह से ही ऐसा हुआ। तुम किसी की सुनते तो ऐसा नहीं होता या फिर तुम्हें लोगों की समझ नहीं है, तुम्हारे साथ ही ऐसा क्यों होता है आदि। जजमेंटल भी न बनें कि तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था आदि। तू खुश क्यों नहीं रहता, इससे बाहर क्यों नहीं निकलता आदि।

3. निगेटिव बातें न करें

आपको मरीज के सामने बेहद खुशगवार माहौल बनाकर रखना है। उसके सामने किसी भी तरह की निगेटिव बातें न करें। न यह कहें कि तुम किसी काम के नहीं हो, न ही यह कि तुम्हारी वजह से मेरा भी वक्त बेकार हो रहा है आदि। उसके साथ जोर-जबरदस्ती भी न करें। अगर वह कहीं जाना नहीं चाहता या कोई काम नहीं करना चाहता तो प्रेशर न डालें। उसे थोड़ा वक्त दें।

4. नशे का सहारा न लेने दें

परेशानी में कई बार लोग नशे का सहारा ढूंढते हैं। अपने करीबी को ऐसा बिल्कुल न करने दें। उसे शराब पीने और स्मोकिंग से रोकें। समझाएं कि नशा किसी समस्या का हल नहीं है। नशे में उसका साथ तो बिल्कुल न दें।

5. अकेला न छोड़ें

सबसे पहले मरीज को अकेला न छोड़ें। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि आप लगातार उसके साथ बने रहें और वह आपकी मौजूदगी से परेशान होने लगे लेकिन आप उस पर निगाह ज़रूर रखें ताकि वह कोई गलत कदम न उठा पाए। ध्यान रहे, अक्सर अकेले रहने के दौरान बीमार को नेगेटिव ख्याल आते हैं, इसलिए दोस्त और परिवार के बीच में रहना तनाव कम कर सकता है।

मिथ मंथन

बीमारी नहीं, आदत है यह -डिप्रेशन आदत नहीं है। यह न्यूरो से जुड़ी बीमारी है, जिसका इलाज दवाओं से मुमकिन है।

खुद ठीक हो जाएगी यह बीमारी – दूसरी बीमारियों की तरह इसका भी इलाज कराना जरूरी है। इलाज न कराने पर यह घातक हो सकता है।

पागलपन की बीमारी है डिप्रेशन – डिप्रेशन पागलपन बिल्कुल नहीं है। वक्त पर सही इलाज से यह पूरी तरह ठीक हो जाती है।

दवाओं की लत बन जाती है – डॉक्टर की सलाह से लें तो इसकी दवाएं पूरी तरह सेफ हैं और इनकी लत नहीं पड़ती। इनके साइड इफेक्ट्स भी नहीं हैं।

पूरी जिंदगी खानी पड़ती है दवाएं – ऐसा नहीं है। बीमारी दूर होने पर दवाएं बंद कर दी जाती हैं। हां, इसका इलाज कई बार लंबा चलता है।

इनसे होगी डिप्रेशन की आशंका कम – यों तो डिप्रेशन के करीब आधे मामले जिनेटिक या फैमिली हिस्ट्री वाले होते हैं और उन्हें रोकना मुमकिन नहीं है लेकिन छोटी-छोटी चीजें करके बाकी मामलों को रोका जा सकता है। ऐसी ही कुछ चीजें हो सकती हैं:

– आपके पास जो है, उसके लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा करें। सोचें कि आपके पास जो कुछ है, उसे पाने के लिए बहुत-से लोग तरसते ही रहते हैं।
– दूसरों की मदद करें। इससे सुकून मिलता है। कोई आपके लिए कुछ करता है तो उसके लिए कृतज्ञता का भाव रखें।
– परिवार और दोस्तों के संपर्क में रहें। उनसे नियमित रूप से मिलते-जुलते रहें।
– मुस्कुराते रहें। किसी अनजान को देखकर भी मुस्कुराएं।
– इगो को हटाएं। I से Illness और We से Wellness आता है, अपनी जिंदगी में इस भाव को अपनाएं।
– रोजाना धूप में बैठने से डिप्रेशन के चांस कम हो जाते हैं।
– रात में पॉजिटिव चीजें सोचकर सोएं और सुबह भी उठकर सबसे पहले पॉजिटिव बातें ही सोचें।
– कोई हॉबी अपनाएं जैसे कि पेंटिंग, गार्डनिंग, कुकिंग या फिर कोई इंस्ट्रूमेंट बजाना।
– किसी भी तरह के नशे से दूर रहें। कोई लत भी न लगने दें, फिर चाहे वह मोबाइल गेम्स की ही लत क्यों न हो।
– किसी से कर्ज न लें। जितनी चादर है, उतने ही पैर पसारें।
– बच्चों के साथ खेलें। कुछ देर को खुद भी बच्चा बन जाएं।
– डॉग या दूसरा कोई पालतू जानवर पालें।

यहां से ले सकते हैं मदद

कई बार लोग अपने करीबियों को अपनी समस्या बताने के बजाय किसी अनजान से अपनी तकलीफ साझा करना पसंद करते हैं। अनजान के सामने मन का गुबार निकालना उन्हें ज्यादा आसान लगता है खासकर सामने बैठने के बजाय फोन पर। ऐसे में हेल्पलाइन की मदद ले सकते हैं। ऐसी कुछ हेल्पलाइन हैं:

संजीवनी (दिल्ली)
फोन (डिफेंस कॉलोनी): 011-2431-8883, 011-2686-4488
टाइम: सुबह 10 बजे से शाम 5:00 बजे तक (सोमवार से शुक्रवार तक)
कुतुब इंस्टिट्यूशन एरिया: 011-4109-2787, 4076-9002
टाइम: सुबह 10 बजे से शाम 7:30 बजे तक (सोमवार से शनिवार तक)

सुमैत्री (दिल्ली)
नंबर: 011-2338-9090
टाइम: दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे तक (सोमवार से शुक्रवार तक), सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक (शनिवार से रविवार तक)

आसरा (मुंबई)
नंबर: 022-2754-6669, 2754-6667
टाइम: चौबीसों घंटे, सातों दिन

नोट: ये हेल्पलाइन स्यूसाइड रोकने में काफी मददगार है और डिप्रेशन में भी फौरी राहत दिला सकती हैं लेकिन डिप्रेशन के लिए सही इलाज बहुत जरूरी है। इसका इलाज काफी आसान और सस्ता है। सरकारी अस्पतालों में तो इलाज फ्री है।

ऑनलाइन टेस्ट

डिप्रेशन की जांच के लिए डब्ल्यूएचओ का PSQ टेस्ट या BDI-II टेस्ट कर सकते हैं। ये टेस्ट आप फ्री में ऑनलाइन कर सकते हैं।

फेसबुक

फेसबुक भी अपने यूजर्स को मदद ऑफर कर रहा है। फेसबुक का कहना है कि अगर आपको किसी की पोस्ट से ऐसा लगता है कि वह डिप्रेशन में है तो आप फेसबुक को जानकारी दें। फेसबुक उस शख्स को मदद देगा। होम पेज के राइट में Help सेक्शन में जाकर Report A Problem को क्लिक करें। इसके अंदर Abusive Content में जाकर आप उस पोस्ट की जानकारी दे सकते हैं, जिससे उस शख्स के डिप्रेशन में होने या स्यूसाइड करने की आशंका नजर आती है।

ज़्यादा जानकारी के लिए

मोबाइल ऐप

Positive Thinking
यह ऐप आपको अपना नज़रिया पॉज़िटिव बनाए रखने में मदद करता है। ज़रूरत पड़ने पर यह आपको सलाह भी देता है।
कीमतः फ्री
प्लैटफॉर्म: एंड्रॉयड, आईओएस

Headspace
यह ऐप आपको मेडिटेशन की ऐसी तकनीक सिखाता है, जिसकी मदद से आप ज़्यादा खुशहाल और टेंशन-फ्री ज़िंदगी जी सकते हैं।
कीमत: फ्री
प्लैटफॉर्म: एंड्रॉयड, आईओएस

यू-ट्यूब विडियो
y2u.be/chE00kGtg48
इस विडियो के जरिए आप जान सकते हैं डिप्रेशन से लड़ने के टिप्स।

y2u.be/z-IR48Mb3W0
डिप्रेशन क्या है, इस बारे में पूरी जानकारी हासिल कर सकते हैं इस विडियो से।

फेसबुक पेज

Defeat Depression
डिप्रेशन से निपटने में मददगार टिप्स और जानकारी से भरपूर पेज।
Anxiety and Depression Support
यह फेसबुक ग्रुप डिप्रेशन से लड़ने में आपकी मदद करता है।

मूवीज़

डीयर जिंदगी (Dear Zindagi)
आलिया भट्ट और शाहरुख खान की यह फिल्म डिप्रेशन से पीड़ित एक युवती की कहानी है, जो सायकायट्रिस्ट की मदद से इस बीमारी से लड़ती है।
कहां देखें: यू-ट्यूब पर

It’s a Wonderful Life (1946)
इसमें स्वर्ग से आया एक देवदूत धरती पर आकर एक परेशान बिजनेसमैन की मदद करता है और बताता है कि ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है।
कहां देखें: यू-ट्यूब पर

एक्सपर्ट पैनल
डॉ. निमेष जी. देसाई, डायरेक्टर, इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलायड साइंसेज (इहबास)
डॉ. समीर पारिख, डायरेक्टर, डिपार्टमेंट ऑफ मेंटल हेल्थ, फोर्टिस हॉस्पिटल
डॉ. सोनिया लाल गुप्ता, कंसल्टंट न्यूरॉलजिस्ट, मेट्रो ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स
डॉ. अव्यक्त अग्रवाल, सीनियर पीडियाट्रिशन
डॉ. मीनाक्षी मनचंदा, सीनियर सायकायट्रिस्ट, एशियन इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़
सुनील सिंह, जाने-माने योग गुरु

– राजेश मित्तल के सौजन्य से

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1 thought on “जादू की झप्पी : लाख दुखों की एक दवा है काहे घबराए”

  1. jitendra says:

    Nice information .

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