एक मुलाक़ात : डॉ. बशीर बद्र साहब से

न जी भर के देखा, न कुछ बात की, बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की!

डॉ. बशीर बद्र साहब की लिखी गई और चन्दन दास जी की आवाज़ में इस गज़ल की ये दो पंक्तियाँ; बशीर बद्र साहब के सामने पहुँचने के बाद, मेरे हाल को बख़ूबी दर्शा रही हैं.

बशीर बद्र! नाम ही काफी है, शख़्शियत बताने की ज़रुरत नहीं. जो पढ़ना, सुनना पसंद करता है वो सभी इनसे भली भाँति परिचित होंगे.

क्या, जिसको सिर्फ पढ़ा हो, और उसके शब्दों से ही होकर हम उससे रूहानी तौर पर जुड़े हों, कभी न मिले हों, न बात की हो, सिर्फ पढ़ा और सुना हो; उसकी याद आ सकती है भला?

पहली बार ऐसा हुआ मेरे साथ कि किसी नामचीन जाने – माने और मुझसे अनजाने व्यक्ति की मुझे लगभग दो दिन से पता नहीं क्यों, पर बहुत याद आ रही थी.

उनकी शायरियाँ, मुशायरे, गाने, इंटरव्यू सुने जा रहा था 2 दिन से लगातार बार – बार.

“जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है,
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा.”

दो दिन पहले ही उनसे मिलने का पूरा मन बना लिया था, मगर मन बनाने से क्या होता है? पद्मश्री सम्मानित डॉ. बशीर बद्र से मिलना आसान और कोई छोटी बात नहीं. उनसे संपर्क किया और फिर तय कर ही लिया कि रविवार सुबह 7 बजे मैं भोपाल निकल ही जाऊंगा.

सुबह हुई, उठते ही मन किया कि फिर कभी चले जाएंगे, आज नहीं. आज सोते हैं, 8 बज गए, मैं लेटे- लेटे सोचता रहा पर अच्छा नहीं लग रहा था, मन खराब हो रहा था. लगा आज ही मिलना चाहिए, जब बोल दिया तो…… उठा ! और नहा धोकर 9 बजे की बस पकड़ के भोपाल पहुँच गया.

जब उनके घर पहुँचा तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं, घर के बाहर नाम देखकर ही उत्साहित हुआ जा रहा था.

जिसका नाम देश – विदेश में, उर्दू -हिंदी शायरी और लिटरेचर में शीर्ष पर हो, जिसकी शायरी को कई देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सभा में अपनी बात रखने को सम्बोधित करते हों, जगजीत सिंह जी जिनकी तारीफ़ करते नहीं थकते थे, ऐसे पद्मश्री सम्मानित डॉ. बशीर बद्र के घर के बाहर में खड़ा हुआ हूँ.

दस मिनट तक बाहर ही खड़ा, घर की दीवारों और मोहल्ले को निहारता रहा, उसके बाद रिंग बजाई, उनके बेटे ने पहचान कर बड़ी विनम्रता से स्वागत किया.

अंदर घर में बैठते ही लगा कि – घर की हर दीवार पर वही हैं. चारों तरफ हर दीवार को उन्हीं की चीज़ों से संजोया हुआ था.

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफिर ने समुन्दर नहीं देखा!
बेवक़्त अगर जाऊंगा सब चौंक पड़ेंगे,
एक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा!!

“ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुमने मेरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा!
पत्थर कहता है मुझे मेरा चाहने वाला,
मैं मोम हूँ, उसने मुझे छूकर नहीं देखा!”

जैसे ही वो आये देखकर लगा कि शायरी खुद मेरे सामने है. मगर वो ठीक से बोल, सुन नहीं पाते अब! बहुत दुःख हुआ कि लफ्ज़ो का जादूगर आज, लफ्ज़ो के लिए ही मोहताज़ है.

जिसने देश – विदेश में अपनी शायरियों, ग़ज़लों, गीतों से मुशायरों और बड़े – बड़े कार्यक्रमों में वाह वाह लूटी है, जिनके शेर लोगों को मुंह ज़ुबानी याद हैं, आज उन्हीं बशीर बद्र साहब को उनके ही शेर सुनाए जा रहे हैं और जानबूझ कर अधूरा शेर छोड़ दिया जाता है कि शायद बशीर साहब को याद आ जाये!

दरअसल डॉ. बशीर साहब को “डिमेंशिया (मनोभ्रंश )” नाम की बीमारी ने जकड़ लिया है, अब उनको, उनके ही शेर सुनाए जाते हैं कि उनकी याददाश्त पहले की तरह दुरुस्त हो जाए.

जानबूझ कर शेर को अधूरा छोड़ दिया जाता है, और जैसे ही वो उस शेर को पूरा करते हैं, उनके चेहरे की ख़ुशी और मुस्कान देखने लायक होती है. अपने ही शेर, ग़ज़ल और गीत सुनकर वो बहुत खुश होते हैं.

“मोहब्बत एक खुशबू है हमेशा साथ चलती है !
कोई इंसा तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता !!”

मैंने भी उनके ही शेर की एक लाइन उनको सुनाई –

अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा, कोई जायेगा !

???…..

और इंतज़ार किया कि शेर को मुक़म्मल खुद शायर ही करेंगे, दस सेकंड बाद उनका जवाब आता है…..

‘तुम्हें दिल से जिसने भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो !! ‘

उसके बाद उनके और मेरे दोनों के चेहरे की मुस्कान में ज़्यादा फ़र्क नहीं था. मन किया कि उन्हें गले लगा लूँ सीधे, मगर फिर उनका एक शेर याद आ गया मुझे और मैं वहीं रुक गया…

“कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से!
ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो!”

मगर बशीर साहब को पता नहीं क्या महसूस हुआ मुझे देखकर, उन्होंने तपाक से मेरा हाथ अपने बाजू में जकड़ लिया और अपना चेहरा मेरी तरफ करके कुछ कहने लगे, मैंने उनको गले लगाया और मेरी आँखें खुद व खुद ही नम हो गईं.

उनके बगल में नीचे, उनकी चेयर के पास बैठकर ऐसे ही बाते होती रहीं और उसके बाद,
फिर आने का वादा करके मैं वापस ‘इंदौर’ लौट आया.

– भास्कर सुहाने

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