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इनबॉक्स बनाम कन्फेशन बॉक्स : ये दुनिया आभासी नहीं आभा-सी है

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बचपन में दूरदर्शन पर एक टीवी सीरियल या फिल्म देखी थी, अब याद नहीं कि सीरियल था या फिल्म लेकिन उसका विषय और मुख्य कलाकार मस्तिष्क की किसी पर्त में जमा रह गया. इसलिए क्योंकि विषय बहुत अलग था.. मुख्य कलाकार थे पेंटल, एक परिपक्व अभिनेता… जिन्होंने उन दिनों कई टीवी सीरियल और फिल्मों में काम किया था…

कहानी कुछ यूं थी, मुख्य कलाकार यानी पेंटल एक बिजली के खंबे से टकराकर दुर्घटना का शिकार हो जाता है, जिससे उसके मस्तिष्क पर ऐसा आघात होता है कि उसके बाद सामने जो खड़ा हो उसके मन में क्या विचार चल रहा है उसे तुरंत ही सुनाई दे जाता था.

जीवन में आये इस नए परिवर्तन से पहले तो वह बहुत प्रसन्न होता है कि, वाह अब मुझे लोगों के मन की बात पता चल जाएगी, अब मैं किसी से धोखा नहीं खाऊंगा. परन्तु जैसे जैसे वह लोगों के व्यवहार के विपरीत उनके मन की बात जानने लगता है, उसका मन क्षुब्ध होने लगता है, दुःख, करुणा, निराशा और क्रोध के मिश्रित भाव से उकताकर वह शिव के मंदिर में जाकर प्रार्थना करता है कि हे ईश्वर मुझसे मेरी यह शक्ति छीन लो, मुझसे लोगों का दुःख और उनके मन में चल रही बातों को और सुनने और सहने की ताकत नहीं है…

तभी उसे शिव की मूर्ति से भी आवाज़ सुनाई देती है… बस इतने में ही थक गए? सोचो मैं पूरी दुनिया को कैसे संभालता हूँ…

यह एक काल्पनिक कहानी थी, जिसे बहुत अच्छे से फिल्मांकित किया गया था, विभिन्न लोगों के मन की बात और उसके उलट उनका व्यवहार… एक सीधे सादे इंसान के जीवन में उथल पुथल ला देता है…

सोचिये यदि आपको किसी के मन की बात सुनाई देने लग जाए, उनके सुख दुःख आप उसी स्तर पर अनुभव करने लग जाए जिस स्तर पर व्यक्ति अनुभव कर रहा है तब आपकी मन:स्थिति क्या होगी…

आभासी दुनिया ने जहाँ एक ओर मनोरंजन, राजनीति, अपराध, आतंकवाद का प्रचार प्रसार किया है, वहीं दूसरी ओर मानवीय संवेदनाओं के लिए एक नया द्वार खोल दिया है. पता नहीं अब भी होता है या नहीं लेकिन पहले चर्च में एक कन्फेशन बॉक्स हुआ करता था, जिसमें एक पादरी बैठा होता था, और बाहर से आने वाला व्यक्ति अपने मन की बात, अपने सुख दुःख साझा करता था, उससे कोई गलती हुई है तो उसको कन्फेशन बॉक्स में बैठे पादरी के सामने स्वीकार कर अपनी कुंठा से मुक्त होने का प्रयास करता था.

हम लोग यह काम भगवान की मूर्ति के सामने कर लेते हैं, किसी इंसान को हम बीच में नहीं लाते, क्योंकि हमने ईश्वर को हमेशा से एक मानवीय स्वरूप देकर अपने रक्षक के रूप में उसे नियुक्त कर रखा है. हमारे लिए एक छोटा सा पत्थर भी आस्था का प्रतीक है, जिससे बात कर हम उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर देते हैं. फिर वह पत्थर भी इतना जीवंत हो जाता है कि वह आपकी सुनता है और बहुत सूक्ष्म दृष्टि से किसी ने अनुभव किया हो तो मार्ग दर्शन के लिए संकेत भी देता है.

तो ऐसे ही आभासी दुनिया ने फेसबुक के इनबॉक्स और Whatsapp के बक्से को ऐसा ही एक कन्फेशन बॉक्स बना दिया है… यह कई लोगों ने अनुभव किया होगा, एक ऐसी अनजानी दुनिया, जिसमें व्यक्ति कभी आपसे मिला नहीं है, आपको व्यक्तिगत रूप से जानता नहीं है, वहां लोग आते हैं अपना सुख दुःख साझा करते हैं…

आप किस स्तर पर उनके अनुभवों को सुनते समझते हैं मैं नहीं जानती लेकिन मेरे लिए यह छोटा सा बक्सा वही कन्फेशन बॉक्स है… कई लोग आते हैं, कोई अपनी बीमारी से परेशान है, कोई पारिवारिक समस्याओं से घिरा है, कोई पैसों की तकलीफ झेल रहा है, कोई अपने अतीत के किसी गलत कदम पर आज भी ग्लानिभाव से भरा है… और चाहता है कि किसी के साथ यह बात साझा करूं, कोई मुझे चाहे उपाय न बता सके लेकिन मन पर रखे इस पत्थर से बोझ को किसी को कहकर हल्का हो जाऊं…

मेरे पास सच में कोई समाधान नहीं होता, लेकिन हम कम से कम उन्हें यह बता सकते हैं कि जीवन इतना अधिक विस्तृत और संभावनाओं से भरा है कि हम अपनी समस्याओं के कुँए से ज़रा सा उछलकर झांककर देखेंगे तो बाहर असीमित समंदर दिखाई देगा. एक बार उसे देख लिया तो अपना कुआं हमें बहुत छोटा दिखाई देने लगता है…

मैं क्या करती हूँ? ना मैं उनकी बीमारियों का इलाज बता सकती हूँ, ना उनकी पैसों की समस्या हल कर सकती हूँ, ना अतीत के कर्मों से उनको मुक्ति दिला सकती हूँ… मैं जो कर सकती हूँ वह है उनको उस कुँए से थोड़ा सा उछल सकने की ऊर्जा देना…

आज जब सोशल मीडिया पर लोग एक दूसरे को उनके व्यक्तिगत निर्णयों पर भी इलज़ाम लगाते हुए टैग करते हैं, उन पर गालियाँ बरसाते हैं, आज जब लोग व्यक्तिगत वार्तालाप का स्क्रीन शॉट सार्वजनिक कर बदनाम करने का प्रयास करते हैं, ऐसे जीवित व्यक्ति बनने के बजाय मुझे पत्थर बन जाना बेहतर लगता है…

पत्थर पत्थर होता है, आप चाहें तो उसको किसी पर फेंककर लोगों को घायल कर सकते हैं, चाहे उससे कोई खूबसूरत आकार देकर सुन्दर सी कृति तैयार कर सकते हैं… तय आपको करना है…

मैं तो बस वह पत्थर हूँ, जो डूबते के लिए पैर का अंगूठा भर रखने के लिए सहारा देता है, ताकि उसके सहारे वह अपनी पूरी ताकत लगाकर एक उछाल मार सके और पानी के बाहर आकार सांस ले सके…

मैं बस वही पत्थर हूँ, जिससे बात कर आप अपने प्राण उसमें डाल कर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करते हैं… आपकी आस्था और विश्वास की मैं सदैव कृतज्ञ रहूँगी…

इसलिए जब भी किसी पर पत्थर उछालने के लिए हाथ उठने लगे तो मेरी यह कविता एक बार अवश्य सुन लेना और मेरा धन्यवाद लेना क्योंकि –

औरत जब क्षमा मांगती है
तो फलों से भरी एक डाली झुक जाती है
उन झुके हुए तनों को ताने नहीं लगते फिर
आंगन में खेलते भूखे बच्चे
हाथ बढ़ाकर तोड़ लेते हैं फल
यहीं से मजबूत होना शुरू होती है संस्कारों की जड़ें
और फैलाती है अपना वंश

औरत का क्षमाशील होना बहुत सुना होगा,
क्षमा मांगती औरत के मुंह से कभी सुनना लोरी
जन्मों के जागे कर्म भी सो जाते हैं,
उनका हिसाब नहीं लेता कोई सूदखोर ईश्वर
क्षमा मांगती औरत के आँचल में आ जाता है ढेर सारा प्रेम
वो अकेली नहीं संभाल सकती इतना सारा प्रेम
इसलिए बांटती चलती है क्षमा में चुपड़ी प्रेम की रोटी

इस जन्म में क्षमा मांग ली है मैंने
अपने पिछले सारे जन्मों के कर्मों के लिए
इसलिए मेरे हिस्से में आया है चूल्हे का सुख
मेरा जीवन एक सांझा-चूल्हा है
यहाँ सभी को आने की अनुमति है
अपना सुख-दुख पकाकर
जिसको जैसे जो बनाना आता हो बना जाता है
मेरे आँगन में रोज़ लंगर लगता है
ज़मीन से जुड़े लोग ज़मीन पर बैठकर
तृप्त होकर जाते हैं

इसलिए तृप्त कोख से जब भी कोई शिशु जन्म लेता है
मेरी छाती में उतर आता है दूध

सारे तूफानों को झेलकर
जब भी कोई फूल खिलता है
मेरी माटी महक जाती है धरती की तरह

जब भी कोई कुमारी पड़ती है पहले प्रेम में
मैं उसका प्रेमी हो जाती हूँ

जब भी किसी राज कुंवर को हो जाता है प्रेम
मैं उसकी प्रेमिका सी हो जाती हूँ

उम्र की चालीसवीं दहलीज़ पर
जब भी किसी स्त्री को होता है आभास
कि वो फिर कर सकती है प्रेम
तो मेरी धरती का कोई बंजर टुकड़ा
श्राप से मुक्त हो जाता है

मेरी मुक्ति की यात्रा से जुड़ी है
कइयों की यात्रा
इसलिए जब भी कोई योगी
समाधिस्थ होता है
मैं निर्वाण को प्राप्त होती हूँ…

औरत जब धन्यवाद देती है तो
धन्य हो जाता है समय का वो हिस्सा
जो उसकी उम्र जितना लंबा है,

उस धन्यवाद काल में
जब भी कोई उसके नज़दीक आता है
वो धन्य हो जाता है

धन्यवाद मुद्रा में जीती किसी औरत
को कभी गाली नहीं लगती
किसी कुंठित व्यक्ति की कुंठा भी
उसके पास आकर तरल हो जाती है

धन्यवाद एक तापमान है
जो ठोस से ठोस द्रव्य को भी द्रव में बदल सकता है

मैंने उन सारे लोगों को धन्यवाद दे दिया है
जिन्होंने मुझे दुत्कारा
और उस अपमान और कुंठा को
मैंने कीमिया बनाकर
एक नए तत्व की खोज की

धन्यवाद वही तत्व है
जो ठोस को द्रव
और द्रव को वाष्प में बदलकर
चेतना को वाष्पीभूत कर देता है

यदि कभी अस्तित्व से
जादू बरसता दिखाई दे
तो समझना धन्यवाद देती हुई किसी स्त्री का
तुमसे गुज़रना हुआ है

जो सिखा रही है कि
जो गुज़र चुका उसे धन्यवाद दे दो
वो यदि तुमसे न गुज़रा होता
तो तुम वह न होते जो आज हो

इसलिए मैं धन्य होती हूँ
जब कोई मुझे किसी वाद की तरफ खींचता है
और मैं हर बार अपवाद की तरह
उसमें से खुद को बचा ले आती हूँ

आप सभी को जीवन का धन्यवाद

– माँ जीवन शैफाली

संता और बंता : एक आभा-सी संवाद

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2 thoughts on “इनबॉक्स बनाम कन्फेशन बॉक्स : ये दुनिया आभासी नहीं आभा-सी है”

  1. Hakim Lal says:

    मजे के साथ सजा भी है यह अनुभव

    1. Making India Desk says:

      साक्षी भाव से किया गया हर कार्य… निष्काम कर्म हो जाता है _/\_

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