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The Quantum Doctors : बीमारी को ऐसे दुत्कारें ‘चल हट भाग यहां से’

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यदि आप Autoimmune disease का अर्थ देखेंगे तो होता है – An autoimmune disease is a condition in which your immune system mistakenly attacks your body.

अब यदि ऐसे में आप अपने इम्यून सिस्टम को समझाएं कि जिस पर तुम आक्रमण कर रहे हो वो तुम्हारा ही भाई बंधु है तो क्यों नहीं सुनेगा? जो आक्रमण करने की बुद्धि रखता है वो मैत्रीभाव भी तो रखता होगा। तो यदि आपको अपना इम्यून सिस्टम दुरुस्त करना है तो आज से ही खुद से प्रेम पूर्वक कहना शुरू कर दीजिये… अहा! तुम कितने स्वस्थ हो, ऊर्जा से भरपूर, सुन्दर, मैं तुम्हें बहुत प्रेम करता हूँ!!

जी हाँ सच मानिए यह होता है, यदि आपको यकीन नहीं आता तो मैं आपको दो डॉक्टर्स के उदाहरण देती हूँ। सबसे पहले मिलिए डॉ आलोक भारती से।

पहले इनका अनुभव पढ़िए, डॉ साहब कहते हैं –

होली के बाद से पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित हमारे फरुखाबाद में भी एक स्किन डिसीज टिनिया क्यूरिस महामारी की तरह फैली हुई है।इसमें शरीर के किसी भी हिस्से पर बड़े से लाल पैचेस हो जाते हैं जिन से वहां तेज जलन पड़ती है।

यह लगातार इलाज से भी जा नहीं रहे। डर्मेटोलॉजिस्ट के यहां भीड़ लगी है और हम जैसों के पास भी रोज दो चार रोगी आ ही जाते हैं। डर्मेटोलॉजिस्ट हर तरह की दवा प्रयोग कर जब हार जाते हैं तब आल्टरनेटिव पैथी होम्योपैथी डाक्टर के पास या बाहर के बड़े शहरों में केस रिफर कर रहे हैं।हाल तो यह हो गया है कि इस फंगल इंफेक्शन की दवा मेडिकल स्टोर्स पर आउट ऑफ स्टाक है और ब्लैक में बेची जा रही है।

फंगल इंफेक्शन है तो एक से दूसरे को लगता भी जल्दी है। तीन चार दिन पहले इसका रोगी क्लीनिक पर आया था।जनरल डाक्टर्स की तरह मैं भी बिना ग्लब्स पहन हर रोगी को देखता हूं ।ना जाने कैसे उसके इंफेक्शन वाली जगह पर हाथ लग गया होगा।

इतवार को नहा कर क्लीनिक जाने के लिए कपड़े पहन रहा था अचानक पत्नी की नज़र गर्दन पर पड़ी और बोली अरे आपको भी यह हो गया है अब आप किसी को दिखा इलाज करा लो । घर में कोई छोटा आईना ना होने से मैंने उससे कहा गर्दन की फोटो खींच दिखाओ मैं भी तो देखूं कैसा और कितना बड़ा है, मुझको जलन तो ज़रा भी महसूस ना हो रही है।

उसने फोटो खींची और चलते समय कहा आज दिखा ज़रुर आइएगा वरना बढ़ जाएगा। मैंने हंसते हुए कहा मैं इसको अभी से ‘चल हट भाग यहां से’ कहूंगा यह दो दिन में ही मेरे पास से भाग जाएगा।

दिन में पचासों बार ‘चल हट’ कहा होगा उसको दो दिन तक। और दूसरी तस्वीर आज सुबह खिंचवाई है उससे। जिसमें लाखों लोगों को महीनो परेशान करने वाले टिनिया क्यूरिस महोदय अपमानित हो विदा ले चुके हैं और जो हल्की सी लालीमा दिख रही है वह इनएक्टिव पैच है जो कुछ दिन बाद ही जाएगा निशानी छोड़ दिया है उन्होने अपनी दुत्कार से खिसिया कर।

बीमारी को ‘चल हट’ या उपयोग में लाई जाने वाली गालियों से अपमानित अवश्य करें दवा लेते हुए भी। अब यह बतलाने की आवश्यकता नहीं है कि मैंने कोई दवा नहीं ली सिर्फ दुत्कारने के अलावा। आप जिस भी दिक्कत से परेशान हों दवाई अवश्य लें पर गालियां भी दें बीमारी को जम कर जब जब मौका मिले।

देखिए मेडिकल साइंस अपने चरम पर पहुंच चुकी है। कोई नई दवा ईजाद नहीं हो रही है और पुरानी दवाएं अनावश्यक प्रयोग से कारगर ना हो पा रही हैं। आने वाले समय में डॉक्टर्स खुद मरीज से बोलेंगे साहब दवा तो हम दे रहे हैं पर बीमारी से लड़ना आपको खुद ही पड़ेगा। और यह लड़ाई हम तभी जीत सकेंगे जब हम अपने अंदर की इम्यूनिटी को पहचानेंगे।

बीस साल बाद की स्थिति आज बता दी है। हम तो शायद ना हों पर हर डॉक्टर यही बोलेगा देख लेना।

वास्तव में ये ऐसा ही जैसा हमने बचपन में एक कहानी में सुना था कि एक व्यक्ति एक पेड़ को रोज़ गाली देता था, उसे दुत्कारता था और एक दिन वह पेड़ मर जाता है, या फिर आप जिन पेड़ पौधों से प्रेम पूर्वक बातें करते हैं तो उनका विकास बाकी पौधों के मुकाबले में अधिक अच्छे से होता है.

[अलसी का मुखवास बनाने की विधि]

अब आप मेरा उदाहरण देखिये, 2014 में सूर्य साधना, ध्यान और अलसी के प्रेम में पड़ते हुए अपना थाइरॉइड 13 से सामान्य पर ले आई थी। (सामान्य 2 से 5 के बीच में होता है)। जी हाँ सच कह रही हूँ यदि आप पानी पीने से पहले भी यदि उस पर प्रेम भरी दृष्टि डालेंगे तो उसकी आण्विक सरंचना में बदलाव आ जाएगा और वह अमृत के समान आप पर असर करेगा। उसी पानी को आप घृणित भाव से पियेंगे तो वही पानी आपके लिए ज़हर बन जाएगा। और इसे आपके विज्ञान ने साबित भी किया है। इस लिंक पर आप वीडियो देख सकते हैं –

Dr Masaru Emoto’s Water Experiment

चलिए मेरी बात पर यकीन नहीं तो मैं पद्म भूषण से सम्मानित Dr BM Hegde से मिलवाती हूँ। इनको आप जब सुनेंगे तो आपको लगेगा आप किसी डॉक्टर से नहीं किसी तपस्वी या योगी से मिल रहे हैं, जिन्होंने अपने अध्ययन, ज्ञान और अनुभवों से विज्ञान के मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा मारा है।

जब हम विज्ञान की बात करते हैं तो उसमें एक शब्द आता है RESEARCH, विज्ञान के नाम पर जो चीज़ खोजी जा चुकी है हम उसी पर दोबारा खोज करते रहते हैं। डॉ हेगड़े कहते हैं हम करोड़ों रुपये सिर्फ रिसर्च के नाम पर बर्बाद कर रहे हैं, जो चीज़ें पश्चिम के वैज्ञानिक एक बार पहले बता चुके हैं, चाहे अधूरा ही सही लेकिन उसी अधूरे ज्ञान को घुमा घुमा कर प्रस्तुत किया जा रहा है और हमारी आनेवाली पीढ़ी वही पढ़ भी रही है, जबकि हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों और तपस्वियों ने इतना कुछ खोज कर हमारे सामने रख दिया है कि हम यदि सिर्फ उसी को अपनी जीवन शैली में अपना ले तो जीवन भर स्वस्थ और खुशहाल रह सकते हैं।

डॉ हेगड़े कहते हैं – One Day Science will be exposed!

खुद एक एलोपैथिक डॉक्टर होने के बावजूद वे आयुर्वेद के ज्ञाता हैं, आयुर्वेद के श्लोक तो उन्हें मुंह ज़बानी है।

डॉ आलोक भारती ही की तरह वे कहते हैं Auto Suggestion से बड़ी से बड़ी बीमारी ठीक कर सकते हैं, इसे ही तो Autoimmune दुरुस्त करना कहते हैं।

आप एकाग्रचित्त होकर खुद से कहिये सिरदर्द तुम चले जाओ, सिरदर्द तुम चले जाओ और यकीन मानिए आपका सिरदर्द चला जाएगा। डॉ हेगड़े भारत के प्रसिद्ध डॉक्टर अमित गोस्वामी की पुस्तक Quantum Doctor का ज़िक्र करते हुए अपनी इस बात की पुष्टि करते हैं कि कैसे सिर्फ खुलकर हंसने से, प्रेम से, Taoism and spiritual alchemy से आप बड़ी बड़ी बीमारी ठीक कर सकते हैं। जैसा कि मैंने Thyroid के बारे में लिखा था उसे एक बार फिर आपके सामने रख रही हूँ –

Thyroid : माया को गलमाया मत बनाइये

जैसे हर गोपी को कृष्ण अपने साथ रास करते दिखाई देते थे वैसे ही Thyroid का हव्वा इस तरह से फैलाया गया है कि हर स्त्री को अपने छोटे मोटे हार्मोनल बदलाव भी थाइरोइड होने की आशंका से घेर लेता है।

एक बार आपने उस बीमारी को याद किया नहीं कि उसका होना तय है क्योंकि स्त्री अपने साथ होने वाली बीमारियों को लेकर इतनी गहनता से जुड़ जाती हैं कि वो एक तरह से इस बीमारी का आह्वान कर रही होती है।

(एक स्टडी के अनुसार – Women get autoimmune diseases at a rate of about 2 to 1 compared to men — 6.4 percent of women vs. 2.7 percent of men (1). Often the disease starts during a woman’s childbearing years (ages 14 to 44).)

मैं यह नहीं कह रही कि ऐसा वे जानबूझकर कर रही हैं लेकिन महिलाएं आत्मपीड़ा में बहुत सुख अनुभव करती हैं। मेरी एक परिचित महिला थीं, उन्हें गठिया रोग हो गया था, ना ज़मीन पर बैठ पाती थीं, ना ठीक से चल पाती थीं।

कहीं भी आना जाना होता तो बड़े गर्व और खुशी से कहती मेरे लिए एक कुर्सी का बंदोबस्त कर दीजिये, मैं ज़मीन पर थोड़ी ना बैठ पाती हूँ। मैं जहाँ जाती हूँ मेरे लिए अलग बैठने का बंदोबस्त किया जाता है। और हाँ खाना भी थाली में अगल से मुझे परोसकर दे देना है क्योंकि मैं ठीक से चल के खाना हाथ से ले ना सकूंगी।

वो इस बीमारी की भयंकर पीड़ा से जूझ रही थी, लेकिन उस बीमारी से इतना अधिक लगाव हो गया था कि दर्जनों डॉक्टर, वैद्य के पास जाने के बाद भी वो कभी ठीक ना हो सकी। मैं खुद कई महीनों तक शहर से दूर वैद्य से इलाज के लिए उनके साथ जाती रही, लेकिन बीमारी ने दस पंद्रह वर्षों में उनके शरीर पर ही नहीं अवचेतन मन पर भी जड़ें जमा ली थी, जो उन्हें कभी ठीक न होने के लिए उकसाती रहती। इसलिए वो खाने पीने की चीज़ों और अन्य ऐसी आदतों से मोह नहीं छोड़ पाई जो उनकी इस बीमारी को बढ़ा रही थीं।

बल्कि उनकी छोटी बहन जो इसी बीमारी से ग्रस्त थी, उसने इस बीमारी से बहुत जल्दी छुटकारा पा लिया क्योंकि उसे किसी भी काम के लिए किसी और का मोहताज होना पसंद नहीं था।

क्या आप जानते हैं Thyroid को गलमाया (गले का रोग) भी कहते हैं. तो Thyroid एक तरह से सिर्फ माया है जिसमें आप जितना रस लेंगे उतना उलझते जाएंगे, यह माया, आपके लिए गलमाया न बन जाए इसका ख्याल रखिये. ये नाग, या कोई भी बीमारी जैसे ही अपना फन उठाए अपने पैर से अर्थात संकल्प शक्ति से कुचल डालिए। अपने आभा मंडल को इतना मजबूत कीजिये कि कोई भी बीमारी आपके पास आने से घबराए।

कहते हैं ना आदत बुरी बला। वैसे ही बीमारी भी एक बुरी बला है। इस बीमारी का हव्वा इतनी बुरी तरह से फ़ैल चुका है कि सद्गुरु जैसे आध्यात्मिक पुरुष के पास भी लोग अपनी आध्यात्मिक शंका या परमात्मा के विषय में पूछने के बजाय Thyroid के बारे में पूछ रहे हैं।

ईश्वर ने सिर्फ चेतनाओं को जन्म नहीं दिया उसके प्रकटीकरण के लिए देह भी बनाई तो उसका भी कुछ विशेष उद्देश्य होगा। अपने जीवन के लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, तो बीमारियाँ अपने आप कोसो दूर भागेंगी।

कदाचित आज के डॉक्टर्स मेरी इस बात से नाराज़ हो सकते हैं लेकिन मुझे लगता है हर रोग एक माया ही है। पहले गुरु, शिष्य के आत्मिक स्वास्थ्य पर काम करते थे कि किसी की चेतना को अधिक से अधिक रोगमुक्त कर कैसे उसकी आध्यात्मिक उन्नति की जाए। फिर इस पर शिक्षा प्रारम्भ हुई तो वैद्य शरीर तल पर आए, तब भी सिर्फ नाड़ी देखकर, साँसों की आवाजाही की गति देखकर, आँखें देखकर या साँसों की गंध सूंघकर इलाज किया जाता था।

जैसे जैसे विज्ञान ने तरक्की की हम चेतना से शरीर तल पर आते गए। अब तो मामूली बुखार में भी बड़े बड़े टेस्ट करवाने पड़ते हैं, भारी भारी एंटी बायोटिक खाना पड़ती है।

सेहत और इलाज की दृष्टि से विज्ञान जितनी तरक्की करता गया हम उतने अधिक रुग्ण होते गए, क्योंकि हम जो भी रसायनयुक्त एलोपैथिक दवाई खाते हैं, शरीर उसको स्वीकार नहीं करता और शरीर के किसी न किसी अंग को अवश्य नुक्सान पहुँचता है। जबकि आयुर्वेदिक कोई भी जड़ी या बूटी शरीर के लिए परिचित वस्तु है, जिसे हजारों वर्षों से हमारे लोग खाते आए हैं, इसलिए शरीर उसे पहचानता है और इससे लाभ भी उठाता है।

हमारी प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता ख़त्म होती चली जा रही है। इसके पहले कि बीमारी हम पर जीत हासिल कर ले, अपने स्वास्थ्य को वापस पा लीजिये।

आपका शरीर स्वयं इतना सक्षम है कि जब तक कोई बाहरी आघात न हो, हर किस्म के अंदरूनी रोग से वो खुद लड़ सकता है बशर्ते आपकी दिनचर्या आपको चेतना स्तर पर स्वस्थ रखने जितनी कारगर हो, क्योंकि एक स्वस्थ आत्मा स्वस्थ शरीर में ही वास करती है।

और अंत में स्वामी राम की पुस्तक “हिमालय के संतों के संग निवास” से पुस्तक का अंश जो पूरे लेख का सार है –

– माँ जीवन शैफाली

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