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भूख

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भूख कई तरह की होती है. तन की भूख, मन की भूख, मस्तिष्क की भूख, आत्मा की भूख, परमात्मा की भूख….

व्यक्ति इसी क्रम में अपनी भूख मिटाते हुए जन्मों की यात्रा को पूरा करता है…

कई बार किसी को इन सारे पड़ावों को एक ही जन्म में पार कर जाने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है, और कई बार व्यक्ति इनकी तृप्ति के लिए आगे से पीछे की ओर भी पलटता है….

कभी कोई किसी एक ही भूख की तृप्ति के पीछे कई जन्म पार कर जाता है….

कोई कोई ऐसा भी होता है जो तृप्त आत्मा के रूप में जन्म लेता है, और सारी अतृप्त आत्माओं की भूख का कारण बन जाता है….

और कभी कभी भूख इतनी प्रबल हो जाती है कि वो कुछ भी ग्रहण करने की वासना से मुक्त हो जाती है…

यूं तो हर भाव का एक चरमोत्कर्ष बिन्दु होता है… जब आप उस बिन्दु पर पहुँचते हैं तो परम आनंद का भाव होता है. लेकिन उस अवस्था में अधिक देर तक टिके रहना संभव नहीं होता. टिक भी गए तो उस आनंद के भाव को लगातार बनाए रखना भी संभव नहीं होता…

वैसे ही भूख का भी एक चरमोत्कर्ष बिंदु होता है, जिसके बाद तन, मन या आत्मा कुछ भी ग्रहण करने की वासना से मुक्त हो जाती है…

मानव जीवन उसी भूख की यात्रा है, और मुक्ति उसकी मंज़िल है. मनुष्य के जीवन में जो कुछ भी घटित होता है अच्छा बुरा… वो उसे भूखा रखने के लिए होता है… वो भूखा रहे… सम्बंधित भोजन को प्राप्त करने के लिए दौड़े… और उस चरम अवस्था को पा ले, जहाँ से उसकी चेतना उस भूख से हमेशा के लिए मुक्त हो जाए… हर भूख का अंतिम लक्ष्य यही है… भूख से मुक्ति…

– माँ जीवन शैफाली

 

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