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गाइड : एक आभा-सी संवाद

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आपके चश्मे का नम्बर क्या है?

क्यों? मेरी आँखों से तो मुझे ही देखना है नंबर जानकर क्या करेंगी…

नहीं, देखना है, किस नंबर पर पहुँचने के बाद मुझे पहचान सके…

सातवें जन्म के बाद..

ओह! नम्बर बहुत अधिक है, गाजर खाया कीजिये..

मेरे पास किटी नहीं है जो गाजर खिलाए…

वैसे जासूस भी आप अच्छे नहीं, वर्ना अब तक मेरा फोन नंबर जान चुके होते..

ये अतिविशिष्ट बात हुई…

साधारण बातें मैं असाधारण लोगों से करती भी नहीं…

यही बड़े लोगों की पहचान है, आपसे बात करके अच्छा लगा!

मुझे भी अच्छा लगा…

आपसे बात करना बाकियों से थोड़ा अलग लग रहा है, यूँ मैं अधिकों के सम्पर्क में भी नहीं…

तभी तो कहा था मौन से संवाद का दुस्साहस!!!

पर आपकी हँसी का कारण नहीं समझ पाया था…

समझ जाएंगे धीरे धीरे… ये इतना अधिक महत्वपूर्ण है भी नहीं… बस किसी के रोने का कारण पता होना चाहिए…

मेरे लिए दोनों एक हैं…

जी…

कुछ लिख रहा था, फिर डिलीट कर दिया…

हाँ बहुत देर तक प्रतीक्षा करती रही… फिर लगा अभी नहीं लिख पाएंगे…

ऐसे सँवाद मुझे बाँधते हैं, यूँ तो बाँध भी लीजिये, कोई परवाह नहीं… हाहाहा

चिंता मत कीजिये मैं मुक्त करने आती हूँ बाँधने नहीं…

लिखना चाहता था कि ऐसा लग रहा है कि आपके साथ निभ जायेगी…

हा हा हा… मुझसे आज तक किसी की नहीं निभी… जीवन से कौन निभा पाया है, मृत्यु ही सच्ची सखी है… और वैसे भी रिश्ते नहीं है मेरे पास बाँधने को…

बेहतर है, रिश्तों का बंधन बंधन ही है…

जी…

योग सही है, बन्ध नहीं…

अभी से निराश नहीं करूंगी कुछ कहकर… लेकिन यहाँ योग भी नहीं है… क्या है इसे भविष्य के गर्भ में ही रहने देते हैं ना… वैसे किस शहर में विराजते हैं?

मुसाफिरों के शहर नहीं हुआ करते, उनके पैरों के नीचे सिर्फ रास्ते होते हैं और आँखों में मंजिल की तलाश… बाकी सब भी उसके लिए मुसाफ़िर ही होते हैं…

लेकिन सब सहयात्री भी नहीं होते… कुछ पड़ाव भी होते हैं, जहाँ रूककर थोड़ा विश्राम कर लेना चाहिए आगे की यात्रा के लिए ऊर्जा एकत्रित करने के लिए…

हाँ, सभी सहयात्री नहीं..

वैसे आपसे एक नम्बर पूछना था…

जी

आपका घर का नम्बर क्या है?

12

ह्म्म्म 12 मतलब तीन… मतलब तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा…

हा हा हा लगता है गणित विषय बहुत पसंद है आपको…

हाँ इसलिए तो मकान नम्बर पूछा… कहते हैं डायन भी सात घर छोड़कर डेरा डालती है…

ये शब्द क्यूं? आप खुद को ऐसा ना कहिये…

हा हा हा भाई साहब चिंता मत कीजिये… मैं उससे भी बड़ी वाली हूँ, मैं खुद को नहीं कह रही… ये जो मंज़िल नाम की डायन आपको सातवें घर के बाद मिलने वाली है उसके पहले सोचा छह घर तक साथ चल लूं… आपने ही तो कहा ना यहाँ सब मुसाफिर ही हैं…

हा हा हा…

नकली हंसी है ये तो…

मेरी हँसी ही नकली नहीं….

हाँ पता है आदमी भी नकली ही हो…

हूँ तो…

हम कौन से असली है यहाँ… आभासी ही है

सही है…

हाँ सही तो फिर भी हैं… गलत काम हम करते ही नहीं…

काले सफेद के बीच की सड़क सलेटी है, यही ज़िन्दगी है…

अरे बाबा दार्शनिक बातें!! अब और नहीं… कुछ असली माल हो तो दिखाइये… कीमत की चिंता बिलकुल नहीं… मानवीय संवेदनाओं के लिए यहाँ मैंने बड़ी बड़ी कीमतें चुकाई है…

आप असली हैं?

नकली कैसा होता है पहले ये बताइये?

ये शब्द इजाद ही नहीं मेरी…

आहा… तय कर लिया…

क्या?

आज फिर मरने का इरादा है…

आपसे बातें करके तो मरते को भी जीने की तमन्ना हो जाए…

अरे नहीं, मैं भी यही कहती हूँ कुछ रिश्तों और भावनाओं के लिए शब्द इजाद ही नहीं हुए… चलो निभ जाएगी अपनी…

Oh finally!!! अच्छा, अपना ठिकाना कहाँ है आजकल?

आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे.. बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए…

दरख़्त हूँ, मिट्टी पकड़ कर रहता हूँ… उड़ने वाले आ बैठते हैं मोड़ कर पँख कुछ देर मुझ पर..

सुना है मिट्टी भी हंसती है…

हँसती है, रोती है, खेलती है…

खेल के नियम याद रखियेगा… हार जाना मंज़ूर है मुझे चीटिंग बर्दाश्त नहीं होती…

हम खेल रहे हैं?

.

.

.

इस सवाल ने मुझे झकझोर कर रख दिया… क्या आभासी दुनिया सिर्फ खेल है?

नहीं, मेरे लिए कभी नहीं रही… लेकिन यदि यह खेल सा लग रहा है तो मैं इस खेल की बहुत कच्ची खिलाड़ी हूँ… जीवन में संबंधों से कभी खेलना नहीं आया… जहाँ जुड़ी पूरी पूरी जुड़ी हूँ, बिना किसी चीटिंग के… इसलिए हर बार हार भी जाती हूँ… इस बार हारना मंज़ूर नहीं था, तो संवाद की डोर खींच ली… एक आभासी संवाद के आभा-सी अनुभव लेकर लौट आई…

 

वो ठीक कहता था यहाँ सब मुसाफिर है, कोई सहयात्री नहीं… लेकिन कोई कोई आपके जीवन के भटकाव के समय में गाइड बनकर आता है और राह दिखाकर लौट जाता है… वह कौन था मैं नहीं जानती, ना ही अब जानने का कोई इरादा है… हाँ आज बस जीने की तमन्ना है…

– माँ जीवन शैफाली

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