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मानो या न मानो : जगदम्बा, एक सच्ची घटना

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बोल जाएगा या नहीं???
और बता सबको, क्यों तंग कर रहा इसे??
क्या बिगाड़ा इसने तेरा??

और तभी सामने घेरे में रखा नीबू हिलने लगा जो उड़द के ढेर पे रखा था.

मृदुला आंख बंद करके बैठी थी देवी सिंह जी के सामने और मां जगदम्बा की मूर्ति के सामने दिया जल रहा था.

कोई ताम-झाम नहीं, बिल्कुल छोटा सा मन्दिर, और ठेठ देहाती बोली बोलने वाले देवीसिंह उस मंदिर के पुजारी.

प्रांगण में खेल रहा मृदुला का 3 वर्ष का गोलमटोल बेटा…

तभी आवाज़ आयी… इसी ने मुझे बुलाया था आवाज़ देकर…

देवीसिंह जी ने आंख बंद करके ध्यान लगाया फिर मृदुला के पति से पूछा – “8 महीने पहले आप लोग कुछ और लोगों के साथ कहीं घूमने गए थे?”

जी.. जी हां… महीप ने जवाब दिया- एक पहाड़ी के उस पार झरना है वहां पर मेरे मुम्बई से आये कुछ मित्रों के साथ मेरा परिवार, हम लोग भी गए थे बहुत गहरा झरना है वहां, यूँ कहिये तीन झरने हैं जिन्हें सूरज कुंड, चाँद कुंड और हाथी कुंड के नाम से जानते हैं.

ह्म्म्म – देवी सिंह जी ने आंखे बंद किये ही जवाब दिया…

“तुम्हारी पत्नी ने वहां पहाड़ियों पर किसी को पुकारा था क्या?

“वो तो हम सभी मज़ाक कर रहे थे कि देखो पहाड़ी से आवाज़ टकरा कर ज़्यादा ज़ोर से किसकी आवाज़ लौटती है.”

“तुम्हें पता है तुम्हारी पत्नी की आवाज़ लौटी ही नहीं वापस, जैसे ही उसने आवाज़ दी…. कोई है?
वो आवाज़ खाई में गिर कर एक इंसान की आत्मा ने पकड़ ली और वापस नहीं लौटी वो आवाज़. फिर तुम्हारी पत्नी ने तुम सब लोगों से कहा जल्दी-जल्दी चलो… सब आ जाओ फटाफट.. घर जाने में देर हो रही है, तो साथ में वो आत्मा भी चली आयी…”

देवी सिंह जी बोले जा रहे थे उस दिव्य शक्ति की प्रेरणा से और महीप 8 महीने पहले की घटना में डूब गया था. अक्षरशः सत्य कह रहे थे देवी सिंह.

उसी घटना की शाम से मृदुला को बुखार आ गया था. महीप ने सोचा 5 किलोमीटर आने जाने की थकान है फिर इतने मेहमानों का खाना पीना भी किया है इसलिए थकान से बुखार होगा.

पर जब दो दिन तक जब बुखार नहीं उतरा और मृदुला का जोड़ जोड़ दुखने लगा, वो तुरन्त डॉक्टर के पास ले गया. डॉक्टर ने भीलवाड़ा ले जाकर दिखाने की सलाह दी.

मृदुला और महीप अपने ढाई साल के बेटे के साथ भीलवाड़ा चेकअप कराने गए और रिपोर्ट ने होश उड़ा दिए दोनों के.

रह्यूमेटिड आर्थराइटिस हुआ था मृदुला को और वो उसके हृदय पर भी असर कर रहा था…

मृदुला ने भर नज़र अपने मासूम बेटे को निहारा और डॉक्टर की बातें सुनने लगी थी. डॉक्टर के मुताबिक उसकी जिंदगी इन गोलियों की मोहताज थी और खान पान में दुनिया भर के परहेज़, दवाइयां लेकर दोनों लौट आये थे.

दवाई खाते खाते सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी, फरवरी निकल गए, मृदुला जब तक दवाई खाती बुखार उतर जाता, वो काम निपटाती घर का और बस फिर बिस्तर पर गिर जाती. कभी रात को 2 बजे उसको भूख लगती वो 4 रोटियां खा जाती. कभी भूख ही नहीं लगती.

पर इतनी बीमारी और ठंड में भी मृदुला रोज सुबह 6 बजे नहा लेती हिम्मत ना होते हुए भी अपनी आस्था को नहीं टूटने देती थी. रोज माँ जगदम्बा को दिया बत्ती करती. उन्हीं के सामने लेटी रहती.

पर इतने महीनों में एक बात ये भी थी कि मृदुला और महीप के शारीरिक सम्बन्ध भी नहीं बन पाए थे. अक्सर महीप उसकी बीमारी के कारण खुद को रोक लेता, पर कभी अगर वो कदम बढ़ाता, ज़रा भी तो मृदुला का बुखार बढ़ जाता.

होली का त्योहार आया, सभी पड़ोसिनों के साथ मृदुला भी तैयार होकर होलिका की पूजा करने गयी. कमज़ोर हो चुकी मृदुला आज भी महीप को नवेली दुल्हन ही लग रही थी.

पूजा करके लौटते ही तिराहा पार करते ही मृदुला बेहोश हो कर गिर गयी.

मृदुला और महीप का व्यवहार अपने पड़ोसियों मकान मालिक सभी से बहुत अच्छा था, उनका बेटा तो मोहल्ले की जान था तो सब लोग इकट्ठे हो गए. और तुरन्त आनन फानन में कोई अगरबत्ती करने लगा कोई डाक्टर को बुला लाया पर कोई फर्क नहीं पड़ा बस मृदुला होश में आ गयी.

तभी उनकी मकान मालकिन उठी और घर से गेंहू निकाल कर इस स्थान पर दौड़ गयी. तुरन्त देवीसिंह जी ने गेंहू देखे और बता दिया ये ब्राह्मण कन्या बस कुछ दिनों की मेहमान है. इसकी आस्था और इसके बेटे की ममता ने इसको रोक के रखा है. उसके घर परिवार के बारे में सब कुछ उन्होंने बताया.

मकान मालकिन वापस लौटी और महीप को सारी बात बता कर मृदुला को गाड़ी में डलवा कर इस स्थान, जहाँ के पुजारी देवी सिंह जी थे वहां ले आयी.

और बाकी जो कुछ हुआ वो मैं पहले ऊपर बता ही चुकी हूं.

देवी सिंह जी अभी भी आंख बन्द किये बैठे थे कि अचानक उन्होंने हाथ में रखे गेंहूँ के दाने मृदुला पे फेंके और आदेश दिया – जा, चला जा ये भगवती का आसरा छोड़ेगी नहीं और इसके सिर भगवती का हाथ रखा हुआ है. जाना तुझे ही होगा.

और इसी के साथ उड़द के ढेर पर रखा नीबू फट गया ज़ोर की आवाज़ के साथ और मृदुला का सारा दर्द बुखार कुछ ही पलों में गायब हो गया.

महीप और मृदुला देवीसिंह जी के चरणों मे झुक गए.

आज देवी सिंहजी तो नहीं हैं, पर महीप और मृदुला और उनका बेटा इस घटना का सुबूत हैं. मैं चश्मदीद तो हूँ ही.

*नानी कहा करती थी ना, कुबेला में कभी भी फूटरी छोरिया ने बाहर नि जाणो. बात बात पे ठी ठी करके नि हसनो, जोर सूं नि बोलणो. सुनसान जगह पे फालतू बकलोली नई करणी. इसी वास्ते बोले थी….

– शालिनी गौड़

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1 thought on “मानो या न मानो : जगदम्बा, एक सच्ची घटना”

  1. jitendra says:

    Most of it is mental perception . Thanks Shaifaly .

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