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गीत गाया पत्थरों ने….

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कुछ कवितायेँ ऐसी होती हैं जिसको पढ़ते से अचानक से किसी फिल्म की कहानी याद आ जाती है. गीतिका वेदिका की यह कविता जब मैंने पढ़ी, तो पढ़ते से ही याद आई फिल्म “गीत गाया पत्थरों ने”…

ऐसी कहानियां हिन्दुस्तान में ही बन सकती है कि नायक द्वारा ठुकराए जाने पर नायिका घूंघट ओढ़े उसके घर में नौकरानी तक बनके काम करने को तैयार हो जाती है… कि पति का प्रेम भले न मिल सके लेकिन दिन रात पति को देखकर ही जीवन गुज़र जाए…

यहाँ तक कि उसे संवाद की भी कोई चाह नहीं… उसकी आवाज़ से ही कहीं वो पहचान में न आ जाए तो वो अजीबो गरीब भाषा में बाकी लोगों से बात करती है….

मीरा सा समर्पण हमारे यहाँ सिर्फ किस्से कहानियों में ही नहीं वास्तविक जीवन में भी बहुत आसानी से देखा जा सकता है….

इसलिए हमारे पास कृष्ण के लिए गाये मीरा के प्रेम गीत भी भजन हो जाते हैं… प्रेम जब परमात्मीय हो जाता है तो मन से शब्द रूप में निकली हर पीड़ा भजन हो जाती है…

तो गीतिका की यह कविता सिर्फ कविता नहीं… विरह की वेदना में गाया गीत है जो भजन सा प्रतिध्वनित होता है… ये पत्थरों पर उकेरा गया चित्र है… ये वही पत्थर है जब प्रेम उसमें प्राण प्रतीष्ठा कर देता है तो पत्थर भी गाने लगते हैं… और तब हमारे सिनेमा जगत से व्ही शांताराम जैसे रचनाकार ऐसी फिल्म बना जाते हैं जो शताब्दियों बाद भी याद की जाती है… गीत गाया पत्थरों ने ….

और साथ ही याद रह जाता है फिल्म का वो अंतिम दृश्य जब नायक पहचान जाता है नायिका को और अपने जीवन की सबसे अद्भुत मूर्ति को, अनावरण कार्यक्रम के दिन तक पूरा नहीं कर पाता..

लेकिन फिर भी मूर्ति का अनावरण होता है… और नायिका की सबसे बड़ी मूर्ति की गोद में जीवन की जो सबसे अद्भुत रचना वो नहीं बना पाया था, उसी मूर्ति की गोद में बैठा हुआ उसका अपना पुत्र एक बच्चे की मूर्ति उकेर रहा होता है….

किसी भी फिल्म में मैंने इतना सुन्दर सन्देश इतने अद्भुत तरीके से प्रेषित करते नहीं देखा… आज भी मैं फिल्म का वो अंतिम दृश्य देखती हूँ तो रोम रोम पुलकित हो जाता है कि सच में… एक पत्थर में प्राण प्रतीष्ठा करना हो, किसी मरते हुए रिश्ते को फिर से ज़िन्दा करना हो तो जीवन की निरंतरता से बढ़कर और कुछ नहीं… जीवन कभी नहीं रुकता… एक माँ से उसके संतान में प्रवाहित होता रहता है…

गीतिका वेदिका भी अपनी कविता में यही कह रही है….

जी में आवे के मर जाऊँ
लालन देखूँ मर ना पाऊँ
बैरी मेरी पीर न समझे
क्या समझे मैं क्या समझाऊँ

अब पूरी पढ़िए गीतिका वेदिका की कविता…

मन की गठरिया ठगने वाला
क्षण-क्षण प्यार परखने वाला
जीवन दर्द-दर्द हो, साँसे गर्द-गर्द हो
मेरे रुदन पर हँसने वाला

ऐसा प्रेमी न पाएं कोई सहेलियाँ ।
जीवन बन के न रह जाये पहेलियाँ ।।

१.
अपने तन-मन काम बना ले
हिय के पापी गड़बड़ झाले
भटक गया रे गहरे समंदर
कैसे मन को मन समझा ले

आयी क्या हूँ भाग लिखा के
झीने अपनी प्रीत के धागे
बांधूं गठानें मड़िया-मन्दिर
भूल गया जो प्रीत लगा के

जीवन बन के है रह गया अठखेलियाँ ।।
ऐसा प्रेमी न पाएँ कोई सहेलियाँ ।।

२.
नन्हा रोवे मेरे आँचल
धैर्य धराये वो न इक पल
न कुछ जिम्मा, जिम्मेदारी
गलन फिरे ज्यों भौंरा चंचल

जी में आवे के मर जाऊँ
लालन देखूँ मर ना पाऊँ
बैरी मेरी पीर न समझे
क्या समझे मैं क्या समझाऊँ

उसको भायें सदा ही रँगरेलियाँ ।।
ऐसा प्रेमी न पाएं कोई सहेलियाँ ।।

– गीतिका वेदिका

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1 thought on “गीत गाया पत्थरों ने….”

  1. Chandra Shekhar Varma says:

    बहुत सुन्दर कवितायें है। उत्कृष्ट लेखन

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