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शून्य से संबोधि तक

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कहते हैं व्यक्ति की उन्नति में स्थान का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है. फिर चाहे वो उन्नति शैक्षणिक हो, आध्यात्मिक हो, व्यवसायिक हो या सामाजिक हो, किसी भी स्तर पर की गई उन्नति में स्थान की महत्ता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता. ये एक स्थापित तथ्य है कि सार्थक प्रयास भी यदि अनुचित स्थान पर किया जाए तो असफलता का कारक बनता है.

स्थान से यहां तात्पर्य प्रकृतिगत अनुकूलता से है. मेरा मानना है कि मनुष्य द्वारा किया हुआ कोई भी कार्य पंच महाभूतों (प्रकृति) की उपस्थिति और सहयोग के बगैर संभव ही नहीं है.

चलिए कुछ उदाहरणों से बात को समझने का प्रयास करते हैं. इतिहास की जिन कुछ एक उद्दात व्यक्तित्वों ने मुझे प्रभावित किया हैं उनमें से एक नाम भगवान बुद्ध का है. मैं मानता हूँ की योगेश्वर भगवान कृष्ण के बाद अगर किसी ने शंकाओं के सबसे तार्किक समाधान दिये हैं वो भगवान बुद्ध हैं. कल्पना कीजिए वही भगवान बुद्ध अपनी तपश्चर्या के दौरान ना जाने कितने वृक्षों के नीचे बैठ कर समाधिस्थ हुए होंगे, पर गया के नीरव वन में खड़े उस पीपल के वृक्ष में या उस स्थान में ऐसा क्या अलग था जिसने राजकुमार सिद्धार्थ को तथागत बुद्ध के रूप में रूपांतरित कर दिया…

दरअसल हम एक अधूरा अस्तित्व लिए धरती पर जन्म लेते हैं और ये अधूरापन तब तक पूर्णता को प्राप्त नहीं होता, जब तक हम स्वयं के होने के कारण की खोज नहीं कर लेते, जीवन…. स्वयं के अन्वेषण का ही दूसरा नाम है.

मुझे याद है वर्ष 2010 में अपने गुरु की प्रेरणा से जब मेरे मन में भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र पर आधारित एक काव्य- रचना लिखने का विचार जन्मा… और उस रचना को मैंने शीर्षक दिया “तथागत – The Life Of A Secred Buddha” यकीन मानिए हफ़्तों तक अथक प्रयास करने के बावज़ूद मैं इस शीर्षक के अलावा कुछ नहीं लिख सका था.

मुझे यही समझ नहीं आ रहा था कि इस रचना का आरंभ मैं किस सूत्र से करूँ, फिर अचानक एक संयोग बना और मुझे एक नाटक के मंचन के लिए बिहार के डेहरी-ऑन-सोन जाने का अवसर मिला…. ये जगह बोधगया के बिल्कुल नज़दीक पर स्थित है, मन में आया एक बार बोधगया हो आना चाहिए… संभव है वहां से ही कोई सूत्र मिल जाए… मैं बोधगया चला गया, महाबोधि मंदिर में भगवान बुद्ध की उस विशाल प्रतिमा सामने खड़े होकर उनके अर्धनिमीलित नयनों को निहारते रहना मेरे जीवन का सबसे अविस्मरणीय अनुभव था…

बाहर आकर मैं बोधिवृक्ष के नीचे बैठ गया… एक अजीब सी शांति मेरी आत्मा पर बरस रही थी, मंदिर के प्रांगण में हज़ारों बौद्ध भिक्षु ध्यानस्त बैठे थे, कहीं कोई आवाज़ नहीं थी. उस दिव्य वातावरण में अगर सबसे मुखरित कुछ था तो मौन…. उसी मौन में एक सूत्र मेरे अंतस में उतरा और जो पहली पंक्तियाँ मेरे अंतस में उतरीं… वो थीं….

 

माया, मोह, नेह का बंधन जब तुमसे तृण-तृण हो जाए,
मन की कालिख़ दूर हटे और निर्मल मन दर्पण हो जाए
उस दर्पण में खुद का ही जब प्रतिबिम्ब तुम देखोगे,
अपने मन की दुर्बलता को अलग उठा कर फेंकोगे
धीरे-धीरे सबके भीतर नव प्रकाश छा जाएगा,
जो कभी तुम्हारे वश में ना था वो सहज सुलभ हो जाएगा
जो मैंने वर्षों में पाया, वो तुम सहज भाव से पाओगे,
जिस तरह से मैं था बुद्ध बना, तुम सभी बुद्ध बन जाओगे….

 

 

 

 

उस स्थान की दिव्यता को मैं अनुभूत कर पा रहा था… और मैं वो सूत्र लिए वापस आ गया और सिर्फ़ आठ दिनों में मैंने उस काव्य रचना को पूर्ण कर लिया. दूसरा उदाहरण मेरे शहर जबलपुर से जुड़ा है, जहाँ के प्रसिद्ध भँवरताल उद्यान में मौलश्री का वृक्ष है, जिसके नीचे ओशो को संबोधि प्राप्त हुई…

अब यहां प्रश्न उठता है हर रोज़ ही हज़ारों लोग बोधिवृक्ष और मौलश्री के वृक्ष के दर्शन करते हैं, कुछ उस स्थान में साधना भी करते हैं पर क्या उनमें से अब तक कोई बुद्ध या ओशो बन सका है….

उत्तर है नहीं… प्रश्न अभी भी वही है कि अगर वो स्थान इतना ही पवित्र या दिव्य है तो उनको क्यों संबोधि प्राप्त नहीं होती… उत्तर है उनमें से कितने लोगों के जीवन में महाभिनिष्क्रमण घटा है.. जोरबा से बुद्ध हो जाने की प्रक्रिया में वे लोग स्वयं को कहां खड़ा पाते हैं.

महज आग्रह पाल लेने से बुद्ध या ओशो नहीं हुआ जा सकता, व्यक्ति की पात्रता और प्रकृति की अनुकूलता मिलकर जिस ऊर्जा वर्तुल का निर्माण करते हैं वही व्यक्ति को संबोधि दिला सकता है.

और यह पात्रता स्वयं को एक पात्र (बर्तन) की तरह पूर्णत: रिक्त कर लेने की प्रक्रिया का नाम है. जहां महाभिनिष्क्रमण स्वयं के अस्तित्व के मिट जाने का सूत्रपात करता है.

मैंने अपनी एक कविता में कहा है “मैं कथानक से सिमटकर शून्य होना चाहता हूँ” हो नहीं सका यह एक अलग विषय है, पर बुद्ध और ओशो यह कर सके… और भी बहुत से लोग कर सके हैं जिन्होंने अपने कथानक को समेटकर शून्य बना लिया है.

बुद्ध को बोधिवृक्ष तक और ओशो को मौलश्री के वृक्ष तक पहुंचना ही था. व्यक्ति शून्यता को धारण करने के साथ ही उस ऊर्जा स्थल तक पहुंच ही जाता है जहां संबोधि संभव है. अगर आप अभी तक संबोधि को प्राप्त नहीं हुए हैं तो मान लीजिए कि आप अभी भी कथानक हैं शून्य नहीं…

– शिरीष गोंटिया ‘शिरीष’

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