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इस रिश्ते को क्या नाम दूँ?

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दुनिया को तो एक ही रिश्ता समझ आता है, काम का रिश्ता।

मैं इस रिश्ते को क्या नाम दूँ??

उसका नाम सोना था।

सांवली, प्यारी सी।

विधाता ने पता नहीं किस प्रारब्ध की सजा देने हेतु उसे मेरे घर में जन्म दिया था।

सबकी लाडली, अपनी वृद्ध माँ की आँख का तारा, जिसका शायद यह अंतिम प्रसव था। जन्म के 20 दिन बाद ही उसे किसी जानवर ने काटा, पिंडली पर, सम्भवतः नेवला रहा हो, देखते ही देखते हथेली भर जितना बड़ा घाव हो गया। इलाज किया, बड़ी मुश्किल से दो माह बाद ठीक हुई ही थी कि पूरे शरीर पर दाद निकल आयी।

फिर से मलहम, इंजेक्शन… इलाज शुरू किया। नाक के पास एक दाद पर मक्खन लगा हुआ था, एक कौआ आया, चोंच मार दी। फिर से घाव फैल गया।

तीसरी बार चिकित्सा हुई। बच तो गई मगर एक नाक का छेद बन्द हो गया। अब तो उसकी माँ ने भी दूध देना बंद कर दिया। वह अपनी मां के साथ ही जंगल जाती। सर्दियों के दिन थे। एक दिन बाकी सभी तो आ गई, मां बेटी नहीं आईं। दूसरे दिन सुबह जाकर देखा, खेतों के उस पार, माँ गिरी पड़ी थी।

वह 19 वर्ष के इस जीवन को त्यागकर प्रयाण कर चुकी थी। सोना खड़ी आंसू बहा रही थी, लाश के पास। बड़ी मुश्किल से मनाकर, उसे घर लाया। इसके बाद वह निरन्तर कमजोर होती चली गई। बरसात आयी, जंगल मे खूब हरी घास उगी।

सोना जाती जरूर, लेकिन जिस जगह उसकी माँ मरी, वहाँ दिन भर खड़ी रहती और शाम को लौटते दल के साथ लौट आती। उसे घर पर अच्छी खुराक देने की व्यवस्था की।

एल्बेंडाजोल के दो डोज़ दिये, जिससे अब वह काफी भली और चुस्त लगने लगी। मगर तीन माह बाद, फिर से उसकी दूसरी नाक सूज गई। 15 दिन इलाज करवाया एक बार ठीक हुई, फिर से बीमार हो गई। शायद नेवले का असर था।

वेटनरी डॉक्टर ने भी हाथ खड़े कर दिये। घाव बढ़ता जा रहा था। खून रिसने लगा। बार बार, मेरे द्वारा की जाने वाली तीमारदारी से अब हमारे बीच ऐसा सम्बंध बन गया कि वह इंजेक्शन, ड्रेसिंग, पट्टी हेतु स्वयं प्रस्तुत हो जाती।

एक माह की यंत्रणा झेलती झेलती वह पस्त हो गई। अब तो खड़ी भी नहीं रह सकती। पैरों में सूजन आ गई। दूसरी नाक भी बन्द होने से उसे सांस में बहुत कठिनाई होने लगी। चारे में खून टपकता। मैंने उंगली से नाक साफ की, उसमें से कीड़े टपकने लगे। H2O2 के झाग में लिथड़े कीड़े, ऐसा लगता मानो मुझे ही काट रहे हैं।

लोगों ने कहा “अब यह किसी काम की नहीं, क्यों सेवा करते हो?”

जगत की रीत यही है, जो काम का नहीं, उसे छोड़ दिया जाता है। उसने अपने हिस्से के दूध से मेरे बच्चे पोषित किये हैं। गुजर चुकी माँ की अंतिम निशानी, मैं ऐसे कैसे छोड़ दूँ?

गायें हमारे परिवार का ही तो हिस्सा है। बड़े परिवार के मुखिया का जीवन कितना अभिशप्त होता है? एक एक कर, उसके अपनों को बारी बारी से विदाई देना, दुनिया का सबसे बड़ा हृदयविदारक कष्ट है। सबको भेजना होता है और उसे वहीं ठहरना होता है।

हिंदुओं को नेतृत्व करना ऐसे ही सिखाया जाता था। हर बार भद्रं चक्षुर्भि: नहीं दिखता। न चाहते हुए भी धीरज, धर्म, तितिक्षा और सहनशीलता का प्रशिक्षण शायद इसी जीवन शैली से विकसित हुआ हो!!

रात को घर लौटते ही उसके पास जाता, और वह सिर हिलाकर अपनी उपस्थिति देती, “अभी जिन्दा हूँ!”

उसके नथुनों का मांस बाहर निकल आया था। वह रक्तपान करती महाकाली जैसी लग रही थी। मैं उसका यह रौद्र रूप देख, कांप गया!! पीड़ा सहन करने की सारी हदें पार कर दी उसने। वह अब भी मुझसे बातें कर रही थी। संकेत करती “मेरे पास बैठो!”

मृत्यु का इंतज़ार कितना दारुण होता है। हर सुबह जाकर निवेदन करता “हे देवी— अब अपनी लीला संवरण कीजिये!” विगत 15 दिनों से मेरा खाना-पीना सब अस्त व्यस्त हो चुका है। दुनिया के घटनाक्रम, ये इलेक्शन, हंगामे, कुछ भी आकर्षित नहीं करते।

मैं रात को गर्म बिस्तर में —- सोता नींद नहीं आती, —- मेरी सांस चल रही है, उसे एक एक सांस में कठिनाई हो रही है। अब तो उसके बाड़े में झाँकते हुए भी डर लगता है। जितनी बार भी जाता, उसकी आँखों से पता चलता कि मेरी उपस्थिति से उसकी तकलीफ कम हो रही है।

भगवान, कलयुग में गाय, सन्त, सज्जन, ब्राह्मण, की योनि में जन्म क्यों देता है? गायें आपके परिवार पर आने वाले कष्ट को खुद पर ले लेती हैं। जब ग्रहों का कुयोग बनता है और किसी एक को भुगतना ही होता है तो वह पीड़ा गऊ अपने शरीर पर ले लेती है।

कल शाम को घर लौटते ही पाया कि नित्य की ही तरह उसकी सांस चल रही है।

“हे देवी!! मुझसे क्या चाहती हैं? अपना चोला छोड़ क्यों नहीं देती? अब तो स्वामिनी ने भी दो एकादशी बोल दी है। कान में गायत्री मंत्र सुनाया, रहम करो माते!! अपने लोक को प्रस्थान कीजिए। एक सप्ताह से न आपने कुछ खाया, न पिया। हे माँ, मुझ पर दया कीजिए। मुझसे नहीं देखा जाता।”

मैंने पैरों को हाथ लगाया। धूलि मस्तक पर लगाई।
परिक्रमा देकर प्रणाम किया। “जाइये, फिर कभी गाय का जन्म मत लेना!”

रोते हुए अपने कक्ष में जाकर लेट गया। पूरी रात, विचित्र उच्चाटन में बीती। घर वालों के सामने अपने भाव छिपाने पड़ते हैं। बच्चों पर बुरा असर पड़ता है।

सुबह हुई….. शायद आज लीला संवरण हो गयी होगी। जाकर देखा, नहीं हुई।

हे देवी, मुझे क्षमा करें। अपराध सहस्राणि, आप तो विश्वस्य मातरः हैं न!

महामृत्युंजय मंत्र सुनाया कान में। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे, उर्वारुकमिव बन्धनात्, गंगाजल छिड़का। बार बार क्षमा माँगी। अम्मा!!!

आखिर वह कौनसा सुख था जो आपको मिला? हे अम्बे!! मैं आपके लिए कुछ न कर सका। दो साल हो गए, अगर इसी का नाम जीवन है तो ऐसा जीवन कभी किसी को न मिले। उस नेवले से इनकी दुश्मनी थी या मेरी, कह नहीं सकता।

जन्म से लगाकर, पल पल जिसका पीड़ा में बीत गया, एक एक दिन, जो उसके साथ बिताए, याद आने लगे। उसने कभी भी अपने दर्द और विवशता को प्रकट नहीं किया। हमेशा निर्विकार रही। मात्र दो साल में उसने क्या क्या त्रासदी नहीं देखी। शायद पशु है वह, इसलिए …… आज पहली बार….. आंखें डबडबा गईं उसकी।

हमेशा की तरह एक अंतिम फुंफकार की और ॐ शांति! शांति!!शांति!!

– केसरी सिंह सूर्यवंशी

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1 thought on “इस रिश्ते को क्या नाम दूँ?”

  1. बेहद मार्मिक….??

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