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देवकी की आँखों का प्यार, रिमझिम बरसता दुलार

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देवकी चौदह वर्ष की हो गई थी। जवानी में उसने खूब दूध दिया और बच्चे भी। बछिया तो रामधीन रख लेता था पर चार बछड़े जो हुए ना जाने कहां भेज दिए रामधीन ने। जब-जब बछड़े उसके पास से ले जाए गए देवकी बहुत कलपी, सींग चलाए, खूंटे में बंधे-बंधे फड़फड़ाई पर ले जाने से रोक ना पाई।

गुस्से में दो दिन दूध ना दुहने दिया और बाल्टी लात मार कर पलट दी। निगाहें हमेशा ओसारे के दरवाजे पर ही लगी रहती कि ना जाने कब रामधीन उसका बच्चा रोज की तरह पास लाएगा उसका मुंह थन से लगा थोड़ा पीने देगा और फिर उसे हटा कर अपनी बाल्टी भर लेगा।

दो दिन थनों में दूध बांधे उसको भी दर्द होने लगा और आखिर में रामधीन ने एक इंजेक्शन उसके थन पर लगाया। भलभल दूध बहा और बाल्टी भर गई साथ ही देवकी की पीड़ा भी हर गई। शनै: शनै: वह भी स्थितप्रज्ञ हो बच्चे के बिछड़ने को नियति मान पहले की तरह चुपचाप दूध दुहाने लगी।

रिमझिम उसकी आखिरी बछिया थी जो तीन वर्ष पूर्व हुई थी। इसके बाद रामधीन ने कई प्रयास किए गर्भाधान के पर सफल ना हुआ। मवेशी डाक्टर ने भी बोल दिया कि यह छह बार गर्भवती हो चुकी है अब ना हो सकेगी।

अब देवकी रामधीन की आँखों में खटकने लगी। पहले भूसे में दाना मिला सानी की जाती थी अब उसे सिर्फ सूखा भूसा ही डाला जाता था जिसे गले से उतारना कठिन था साथ ही मात्रा भी कम हो गई थी भूसे की। रामधीन को भी लग रहा था कि देवकी पर फालतू खर्च हो रहा है जबकि उससे आमदनी तो खत्म ही हो चुकी थी। लापरवाही या यूं कहें उपेक्षा का यह भाव था कि उसकी नांद में कोई एक बाल्टी पानी तक ना डालता था। भरी गर्मियों में दिन-दिन भर प्यासी बंधी खड़ी रहती थी।

पर देवकी को इस बात का सुकून था कि उसकी बछिया रिमझिम का ख्याल भलीभांति रखा जा रहा था। उसको नहलाना, सानी लगाना, मालिश व बाहर चराने ले जाना नियम से हो रहा था क्योंकि अब वह गर्भ धारण करने की आयु पर पहुंच चुकी थी। भूखी देवकी जब भर पेट चारा खाते उसे देखती तो उसकी भूख स्वतः मिट जाती। ऐसे ही जब उसकी जुबान प्यास से ऐंठती होती तब रिमझिम को पानी की बाल्टी मुंह डाले देखती तो अपनी प्यास भूल जाती।

ऐसा ना था कि रिमझिम उसे भूखा प्यासा देख विचलित ना होती हो। मां को ऐसी स्थिति में देख वह रंभा कर पास बुलाती पर जंज़ीर जिससे देवकी बंधी होती इजाज़त ना देती कि रिमझिम या उसकी नांद के पास वह पहुंच सकती। ऐसे में वह गर्दन हिला उसके आमंत्रण का आभार जताती और तेज सुर में खुद रंभा मानो बच्ची से कहती तू खा ले मेरा पेट तो भरा है।

सूख कर कांटा हुई जा रही थी देवकी भूखे प्यासे। एक दिन रामधीन की घरवाली जिसने देवकी का दूध बेच बेच दस तोले की करधनी अपने कमर में बांध ली थी रामधीन से बोली – पता है भूसे के रेट आसमान चढ़ गए हैं और आप इस निठल्ली देवकी को रोज़ तीन किलो खिला देते हैं। पच्चीस रुपये का तो खा जाती है और पच्चीस पैसे की आमदनी तक ना होती इससे। आखिर कब तक इसे बैठे बैठे खिलाएंगे। आप इसको बेच क्यों नहीं देते।

इस बूढ़ी को खरीदेगा कौन – रामधीन ने जवाब दिया।
अरे तो क्या हमने ठेका ले रखा है इसका वह अपनी भारी भरकम करधनी पर हाथ फिराते बोली।
बेच दो इसे मुकर्बीन को सुना है वह बूढ़ी गायों के भी पंद्रह सोलह हजार दे देता है।

अरे कसाई है वह तो देवकी को कटने के लिए दे दूं क्या?

बैठे बैठे कौन सा सोना दे रही है कट कर कम से कम किसी के पेट तो पड़ेगी।

आखिर मन मार रामधीन को बीबी की बात माननी ही पड़ी। साइकल उठाई और पड़ोस के मुकर्बीन के गांव चल पड़ा।

दूसरे दिन मुकर्बीन सुबह आया और देवकी के पीठ पेट पर उंगली गढ़ा गढ़ा कुल हासिल होने वाले मांस का अंदाजा लगा गुणा भाग कर बोला इसके तो दस हजार ही मिल पाएंगे हड्डियों का ढांचा भर ही तो है इसमें। कुछ बढ़ाने की रामधीन की कोशिश निष्फल हुई और सौदा दस हजार में ही पटा।

सौ सौ के सौ नोटों की गड्डी उसने निकाल ओसारे की छोटी छालदीवारी पर रख दी कि गिन लो पर रामधीन बोला अरे भाई पड़ोस के गांव के ही हो छल थोड़े ही ना करोगे जब कह रहे हो दस हजार हैं तो होंगे ही हमें तो विश्वास है ऐसा कह रामधीन ने पत्नी को आवाज लगाई रुपये छालदीवारी पर अंगौछे में रखे हैं उठा लेना, मैं देवकी को उसके गांव तक छोड़ने जा रहा हूं नए आदमी के साथ तो हर्गिज ना जाएगी।

ऐसा बोल रामधीन ने खूंटे से जंजीर खोली। देवकी को अनिष्ट का आभास हो चुका था तो जी भर कर उसने ना जाने के लिए उछल कूद मचाई। रिमझिम भी खूंटे से बंधी अपनी मां को ना जाने देने के लिए जोर लगा लगा रंभा रही थी। आखिर दोनों देवकी को काबू पाने में सफल हुए। पीछे से पूंछ पकड़ मुकर्बीन ढकेल रहा था और आगे से रामधीन जंज़ीर हाथों में जकड़ आगे खींच रहा था।

दरवाजे से बाहर निकलने से पहले देवकी ने बहुत जोर लगा जंजीर ढ़ीली कर गर्दन घुमा आखिरी बार रिमझिम को जी भर कर देखना चाहा पर एक झलक ही देख पाई होगी कि पीछे से तेज धक्का लगा और आगे से जंज़ीर खिंची तो वह एक झटके से दरवाजे के बाहर आ गई।

सड़क पर पहुंचते ही रमई काका की गौरी चरते मिली उससे आखिरी राम राम उसकी गर्दन पर जीभ फिरा कर करी। आगे इधर उधर भोजन की तलाश में घूमते कलुआ, भूरा मोती दिखे उनसे भी देवकी ने आखिरी राम राम की।

तीनों माजरा समझते हुए मुकर्बीन पर दौड़े पर हाथ में ली हुई लाठी पटकते ही तीनों वापस भाग गए। आगे फनगू का खेत दिखा ना जाने कितनी बार वह यहां उगी बरसीम खाने आती थी और वह बरगद का पेड़ भी जहां चरते चरते थक जाती थी तो उसकी छाया में सुस्ताने बैठ जाती थी।

गांव का तालाब देखते ही उसका मन मचल उठा कितना मीठा पानी है इसका। सूखती जुबां से अपने नथुने सहलाती देवकी ने एक बार जोर लगाया कि आखिरी बार इस तालाब का पानी पी ले पर मुकर्बीन की ठोकर से लड़खड़ा गिरते गिरते बची।

अभी मात्र दो फर्लांग ही निकल पाए होंगे कि पीछे से दौड़ती आवाज देती हांफती हाथ में रुपयों वाला अंगौछा लिए रामधीन की घरवाली पहुंची।

क्या हुआ तुम इस तरह भागती हुई क्यों आईं?

अरे देखो क्या गजब हो गया आपके जाते ही मैं बाहर ओसारे में रुपये उठाने आई तो रिमझिम नोटों को चबा रही थी। बड़ी मुश्किल से उससे छुटाए। चबाने और खींचातानी से सारे नोट फट गए हैं।

मुकर्बीन बोला तो इससे मुझे क्या मैं तो सजे सलामत रुपये दे कर आया था। अब यह गाय मेरी है।

अरे कैसे गाय तुम्हारी हुई तूने रुपये हाथ में दिए थे क्या? तूने तो छालदीवारी पर रख दिए थे। हाथ में दिए होते तो मैं मानता कि तूने दिए थे। ऐसे तो तू कहीं पेड़ पर टांग आए और बोलेगा मैंने तो दे दिए। कहीं ऐसा भी होता है कि बिना हाथ में दिए रुपये दिए मान लिए जाएं। ये कटे चबाए हुए नोट तेरे हैं ले जा। मुझे ना करना गाय का सौदा।

काफी देर वादविवाद हुआ पर कुछ निर्णय ना निकला। आसपास से गुजरते हुए कुछ लोगों ने सलाह दी कि पंचायत बैठा लो उसका जो भी निर्णय हो दोनो लोग मानों।

पंचायत की बात पर दोनों लोग सहमत हुए। मुकर्बीन खाली हाथ अपने गांव चल दिया और देवकी को ले कर रामधीन वापस घर आ गया। घर पहुंच देवकी ने जी भर कर रिमझिम को चाटा और उसकी बुद्धि की सराहना आखों की कोरें गीली करते हुए की कि उसके नोटों को चबाने से आज वह जी भर कर उसे देख पा रही है। निश्चित ही ममता, वात्सल्य की जीत हुई है।

दो दिन बाद पंचायत बैठेगी फैसला चाहे जो हो एक मां को तो दो दिन मिल ही गए अपने बच्चे के सानिध्य के।

– डॉ. आलोक भारती

 

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