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Fritjof Capra, The TAO of PHYSICS के बहाने : तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा

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सुबह जागी तो दो शब्द मुंह पर थे तन्मय और तल्लीन, और लगा कोई रचना इन दो शब्दों के आसपास बुनकर जागी हूँ। एमी माँ (अमृता प्रीतम) के अनुसार इसे ‘सांध्य भाषा’ कहते हैं जब आप अर्धचेतनावस्था में कुछ रच रहे होते हैं और जागने पर भी पूरी तरह से या झलक भर याद रह जाती है।

मुझे झलक भर याद है… भाव था तन मय हो जाना और तन में लीन हो जाना…

अध्यात्म के जिज्ञासुओं ने तन को अक्सर हेय दृष्टि से देखा है और मेरे लिए यह तन ब्रह्माण्ड के रहस्यों को प्रकट करता द्वार ही है, जैसे किसी मंदिर के गर्भगृह का प्रवेशद्वार होता है।

हालांकि यदि हम तन्मय और तल्लीन का संधि विच्छेद करते हैं तो कुछ यूं होता है –
तन्मय का होता है तन् + मय, तम् + मय, तत् + मय और तन् + अमय

और तल्लीन का अर्थ होता है तत् + लीन

तन मय का एक अर्थ होता है तन में लीन हो जाना..
वहीं तन् + अमय का अर्थ होता है, जो तन की सीमा के भी बाहर है…

वहीं तत् + मय और तत् + लीन में, तत् का अर्थ होता है वह, वही या उस, उसी… अर्थात जो तत् यानि ‘उसी’ में लीन हो गया।

मैंने कोई धर्म ग्रन्थ नहीं पढ़े, ना ही वेद उपनिषद का ज्ञान है। मेरे मन में अक्सर यह प्रश्न जागता था कि क्या मुझ जैसे सांसारिक लोग भी कभी अध्यात्म के पथ पर आगे बढ़ पाएंगे, जिसे ध्यान का अर्थ भी पता न हो?

जब भी कोई प्रश्न आपके अन्दर से बहुत गहन स्तर से जागता है, आप वास्तव में जिज्ञासु से मुमुक्षु होने की प्रक्रिया में हैं, आप सरल हैं, आप अपनी अज्ञानता को भी उतनी ही सरलता से स्वीकार करते हैं तो आपकी सरलता ही आपके आध्यात्मिक मार्ग के लिए रास्ता बन जाती है. इसलिए जब जब मैंने अस्तित्व से प्रश्न किया है, अस्तित्व ने मुझे जवाब अवश्य दिया है.

तो यदि हम ॐ तत् सत् का अर्थ किसी पुस्तक में पढ़ते हैं तो उसका अर्थ होता है कि –

हर उत्पत्ति के मूल में ‘ओम् तत् सत्’ है। इसका एक अर्थ यह भी है कि सर्वोच्च शक्ति जिसे हम परमात्मा या भगवान कहते हैं, वही जीवनी शक्ति के वाहक हैं और जीवनी शक्ति पूरी सृष्टि में विद्यमान है। ‘ओम्’ सर्वशक्तिमान का द्योतक है। ‘तत्’ का शाब्दिक अर्थ है वह। ‘सत्’ का अभिप्राय शाश्वत से है। यह परम सत्य का प्रतीक है। सभ्यता के आरंभ से ही तीनों शब्दों का प्रयोग सर्वोच्च या सर्वशक्तिमान के लिए किया जाता रहा है। इन तीनों शब्दों का प्रयोग वेद मंत्रों का उच्चारण करते समय किया जाता है। परमात्मा को जब कुछ अर्पित किया जाता है, तब भी इनका उच्चारण किया जाता है।

तब मुझे समझ आया कि मुझे तो यह भी नहीं पता था कि परमात्मा को अर्पित क्या करना है, मेरे पास इस मेरे ‘मैं’ के अलावा कुछ भी नहीं था जो मैं जानती थी, तो मैंने अपना ‘मैं’ ही उसे अर्पित कर दिया। और जैसा कि शास्त्रों में लिखा है जब आप परमात्मा को कुछ अर्पित करते हैं तब ॐ तत् सत् का उच्चारण करना चाहिए।

इस जन्म में मैंने भले ही शास्त्रों का ज्ञान न पाया हो लेकिन पूर्वजन्मों के संचित ज्ञान से ही अवचेतन मन से ये दो शब्द उभर कर सतह पर आए… तन्मय, तल्लीन…

Ma Jivan Shaifaly

उस सुबह के बाद मैंने खुद को इतना हल्का अनुभव किया जैसे अब देह का भी वज़न अनुभव नहीं होता। लेकिन इस अवस्था को समझने के लिए आपको अपनी दृष्टि को बदलना होता है। जब आप देह के अनुभवों से परे होने लगते हैं तो देह अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के लिए तरह तरह के प्रयास करेगी, जिसे आप शरीर का भारी होना, उसके हर अंग में दर्द होना और भी बहुत सारी चीज़ें या बीमारी कहेंगे, लेकिन यदि आप उसके आकर्षण में एक बार फिर फंसे तो ध्यान का सारा परिश्रम विफल हो जाएगा, और आप भौतिक रूप से सिर्फ कुछ बीमारियों का अड्डा बनकर रह जाएंगे, जैसा अमूमन लोगों के साथ होता है।

इसे यदि विज्ञान की भाषा में समझे तो हमारा शरीर स्थूल रूप से सिर्फ अणु परमाणु का संगठन है, और जैसा विज्ञान कहता है परमाणु न तो पार्टिकल्स है न ही वेव्स… यह एक दूसरे में रूपांतरित होते रहते हैं… और पार्टिकल्स या वेव्स कभी स्थिर नहीं होते, इसलिए यदि आपकी देह में कुछ स्पंदन अनुभव हो रहा है तो आपको और अधिक संवेदनशील होकर उसे अनुभव करने की आवश्यकता है।

और जैसा कि हमारे शास्त्र कहते हैं शरीर में उपस्थित आत्मा शुद्ध ऊर्जा का रूप है… ये जितनी अधिक हल्की और उर्ध्वोमुखी होगी उतना शरीर संवेदनशील होता जाएगा। आज की मेरी स्थिति ऐसी है कि यदि मैं देह के किसी भी अंग पर ध्यान लगाऊँ तो मुझे हृदय की तरह हर अंग में स्पंदन अनुभव होता है।

और जैसा कि मेरे साथ हमेशा होता है कि शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है फिर भी आधुनिक परिपेक्ष्य में जिस समय जो ज्ञान की बातें मुझ तक पहुंचानी आवश्यक होती है वह मुझ तक पहुँच ही जाती है।

तो Dr BM Hegde का वीडियो मुझ तक पहुँचा और मैं अपने अनुभवों को उनके माध्यम से शब्द दे सकी कि सिर्फ आपका मस्तिष्क ही आपका MIND नहीं, आपके शरीर की प्रत्येक कोशिका में MIND है जिसे आप Conscientious कहते हैं। इस लेख के अंत में डॉ साहब का वीडियो दे रही हूँ, उसे अवश्य सुनें।

इसी बात को सद्गुरु यूं कहते हैं कि यदि उन्हें किसी वस्तु के बारे में जानना है तो वो किसी से पूछते नहीं, बस उस पर अपना हाथ रखते हैं और सबकुछ जान जाते हैं चाहे वो कोई चट्टान ही क्यों न हो, आपके शरीर की प्रत्येक कोशिका को स्पर्श कई जन्मों तक याद रहता है। अर्थात आपकी प्रत्येक कोशिका में MIND है!

वैसे ही मुझे लगता है आपके हृदय में ही नहीं आपके शरीर की प्रत्येक कोशिका में स्पंदन होता है यदि आप एकाग्रचित्त होकर उसे अनुभव कर सके, क्योंकि आपकी चेतना उस ‘तत’ का ही हिस्सा है, जब आप होश पूर्वक दोबारा खुद को उस में विलीन कर देते हैं तन्मय या तल्लीन हो जाते हैं तो आपके लिए ब्रह्माण्ड के नए द्वार खुल जाते हैं… जब आप कह सकते हैं तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा।

और यदि आपको उपरोक्त सारी बातें एक खाली दिमाग की बकवास लगती हैं और लगता है कि मैं किसी मानसिक बीमारी या हार्मोनल बदलाव की शिकार हूँ, तब भी आप अपनी इस बीमारी का मेरी तरह सदुपयोग कीजिये, उस बीमारी या हार्मोनल बदलाव को Autosuggestion दीजिये कि नहीं मुझे कोई बीमारी नहीं यह मेरे आध्यात्मिक अनुभव है, यकीन मानिए आप वास्तव में आध्यात्मिक हो जाएँगे… यकीन न आए तो Dr BM Hegde के इस वीडियो को अवश्य सुनिए जिसके बारे में दो विस्तृत लेख लिखे हैं जिनके links मैं नीचे दे रही हूँ।

Swami Dhyan Vinay

और वैसे भी ध्यान बाबा कहते हैं, सोचने भर से सबकुछ हो जाता है… इसके पीछे मुझे वो क्वांटम भौतिकी के नियम समझाने का प्रयास करते हैं, लेकिन मैं मूढ़मति हमेशा से ही “जादू” कहकर खुश होना चाहती रही और आज भी वही चाहती हूँ… लेकिन जैसा कि ऊपर कहा जिस समय जो किताब मुझे पढ़वानी होती है वो मुझ तक किसी न किसी बहाने से पहुंचाकर ही दम लेते हैं “ये लोग”।

तो मेरे हाथ में आजकल जो किताब रहती है वो है Fritjof Capra की The Tao Of Physics, जिसके लिए ध्यान बाबा ने मुझसे मिलने से पहले फोन पर ही नौ वर्ष पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि “कुछ पढ़ें न पढ़ें, Fritjof Capra की The Tao Of Physics ज़रूर पढ़ें…”

इसे भविष्यवाणी इसलिए भी कह रही हूँ कि यह वाक्य इतने रहस्यमय अंदाज़ में कहा गया था कि मुझे लगा था जैसे कोई मेरे कानों के पास आकर अस्तित्व की तरफ से सन्देश दे रहा हो, कि यह पुस्तक आपके जीवन का TURNING POINT होगी, हालाँकि TURNING POINT भी Fritjof Capra की ही दूसरी पुस्तक है। और इस भविष्यवाणी की जादुई आवाज़ से मैं इतनी मुग्ध हुई थी कि उस ऑडियो को मैंने रिकॉर्ड करके रख लिया था, और आज दस साल बाद भी वह ऑडियो मेरे पास सुरक्षित है।

कभी कभी सोचती हूँ कि यदि परमात्मा वास्तव में हमसे मनुष्य की भाषा में संवाद स्थापित कर सकता होता तो यकीनन उसकी आवाज़ ऐसी ही होती।

– माँ जीवन शैफाली

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