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मुझ जंगली का मन तो जंगल में ही भटकता है

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बचपन के दिनों में खाए गए फलों को याद करती हूँ तो दो तीन चीज़े दिमाग में कौंध जाती है, और मैं ‘हाय वो भी क्या दिन थे’ सोचकर बचपन की गलियों में उतर जाती हूँ… जहां माँ गर्मियों के मौसम में रस वाले नरम आम की टोकनी, एक बड़ा सा तपेला लेकर बैठती थी जिस पर स्टील की बड़े छेद वाली छलनी ढंकी होती.

फिर एक एक आम को हाथों से गोल गोल घुमाते हुए उसको नरम करती, फिर ऊपर से उसका मुंह खोल कर सारा रस गुठली सहित छलनी में उड़ेल देती… ऐसे एक एक आम के रस को अपने हाथों से छलनी में गोल गोल हाथ फेराते हुए घोटती…

आम का रस तपेले में गिरता, कूचे छलनी में रह जाते…. गुठलियों पर से भी सारा गुदा निकाल लिया जाता और हम सब बच्चे माँ के आसपास उन गुठलियों को चूसने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए बैठे रहते…

ऐसे ही खरबूज खाने के बाद उसके बीजों को छलनी में राख के साथ घुमाते फिर पानी से धोकर छलनी में बचे बीज धूप में सुखाने रख देते… जब बीज सूख जाते तब दांत से उनका छिलका तोड़ तोड़ कर उसके बीज खाते…

बचपन में कटहल भी खूब खाया है लेकिन कच्चा नहीं, माँ हमेशा पका हुआ कटहल खरीदती और उसके बीज सहित गुदा हमको खाने को देती… जब आम महंगे हो जाते तो ये आम के स्वाद वाला पका कटहल हमारे लिए आम से भी अधिक मज़ेदार फल होता था. और ऊपर से हिदायत ये कि बीज कोई फेंकेगा नहीं, उसे धोकर शाम को माँ उसकी प्याज़ वाली बढ़िया सब्ज़ी बनाती…

हरफर रेवड़ी, करौंदे, शहतूत जैसे जंगली फल तो जंगलों के खो जाने के बाद जैसे लुप्त ही हो गए. और उनकी जगह कीवी, स्ट्रॉबेरी और चेरी जैसे फलों ने ले ली….

बाद में घर में मिक्सी आ गयी तो माँ भी आधुनिक हो गयी थी, उसी में आम का रस बना लिया करती… लेकिन माँ के हाथ का छलनी से बने रस का स्वाद उसमें न आता…

हमारे यहाँ आम के रस में थोड़ा सा देसी घी, चुटकी भर नमक और भुंजा पीसा जीरा डालकर खाने को दिया जाता और उसके साथ बनती दो पर्त वाली रोटी….

आम आज भी मिलते हैं… लेकिन माँ की वो चुटकी भर नमक सी झड़की, शुद्ध घी सा दुलार और भुंजे जीरे सा उनका अनुभव नहीं मिलता…

मालिनी अवस्थी

मालिनी दी ठीक ही कहती हैं – “मुझ जंगली का मन जंगल में ही भटकता है”

मालिनी दी कहती हैं – गर्मी की छुट्टियाँ आते ही मन बचपन की गलियों में दौड़ने लगता है. मैं नही जानती कि आप में से कितने लोग इस फल को “चीन्हते” हैं, मेरे जैसे जंगली होंगे, तो आपने इस अद्भुत फल “जंगल जलेबी” का रसास्वादन अवश्य किया होगा! इसे वन इमली भी कहते हैं और सिंगड़ी भी!

गोरखपुर में गोलघर के हमारे घर के पीछे वाले हाते में इस दिव्य फल का विशाल झुरमुट था, लगभग तीस चालीस पेड़! साथ ही झुरमुट तो आम का भी था, लेकिन गला खराब न हो जाये इसलिए बचपन में ही कच्ची अमिया पर लगी बंदिश, आम के पेड़ को देखने न देती.

मुझे तो भाते जामुन, फालसे और खिन्नी! बहरहाल, बात चल रही थी, घर के पिछवाड़े लगे जंगल की!

उसके कई पेड़ों की दिव्य जलेबियाँ हमारे आँगन में गिरतीं, पड़ोसियों के आंगन में गिरतीं! उन सब पर तो हमारा मानो जन्मसिद्ध अधिकार था! उपाध्याय जी का घर हो या त्रिपाठी जी का, सब मुस्कुराते हुए हाथ में दे देते. मन फिर भी न भरता!

पेड़ों पर लटकती हुई जंगल जलेबियाँ मानो रोज़ चुनौती देतीं, “है कोई?” ज़मीन से लगभग बीस बीस फिट ऊंची जलेबियों में क्या आकर्षण है ये न तो मेरे भाई समझ पाते न बहन! दीदी कहती, “कितना नीरस फल है, कैसे तुम्हे पसंद है?” दीदी को और घर वालों को समझाने में समय ज़ाया करने के बजाय, मैं ऊँची लटकती जलेबियों को कैसे तोड़ा जाए, इसके तरीके सोचती.

जिन्हें अनुभव है वो ये जानते हैं कि जंगल जलेबी के पेड़ की डालियों में कांटे खूब होते हैं, घर के पिछवाड़े के जंगल में पेड़ पर चढ़ने की कोशिशों में कितनी बार फ्रॉक और स्कर्ट फटीं, गिनती नहीं! घर पर जो डांट पड़ती, सो अलग!

लेकिन बालमन तो बालमन! चंचल भी होता है, और धृष्ट भी! पड़ोस के भाई बंधु लड़कों से मिल कारगर लग्घी बनाने की कला सीखी और दो ऐसे दो लंबे अस्त्र तैयार किये जिनसे ऊँची लटकती जलेबियाँ तोड़ी जा सके!

स्कूल से आकर चटकती दुपहर में लग्घी से जंगल जलेबियाँ तोड़ना… मेरा प्रिय शगल रहा. अब जंगल जलेबियाँ जल्दी नही दिखतीं.. महानगरों में तो कहीं नही!

ग्राम, क़स्बों छोटे शहरों में आज भी मिल जाते हैं पेड़! बाजार में नही बिकतीं, तोड़नी ही पड़ती हैं. लेकिन जहां चाह वहां राह.. मुझ जंगली का मन जंगल में ही भटकता है इसलिए मुझे आज भी मिल ही जाती हैं, हाँ अब लग्घी नहीं है..

जंगल-जलेबियों के पकने का और यादों का मौसम एक साथ आ गया…

ऐसे ही हरफर रेवड़ी और खिन्नी भी बचपन में खूब खाई है. गुजराती में हम लोग हरफर रेवड़ी को खटामडा कहते थे, क्योंकि ये एकदम खट्टे होते हैं आंवले जैसे, लेकिन आकार आंवले से चार गुना छोटा… एकदम गोल भी नहीं होते…

एक कच्चे आम का पानीवाला अचार होता था जिसमें माँ नमक के पानी में कच्ची कैरियां और “गरमेल” नाम की कोई जड़ी डालती थीं. बचपन में खाई हुई चीज़ें जैसे बचपन के साथ ही विलुप्त हो गयी. फिर कभी दिखाई नहीं दी.

फलों के आलावा कुछ जंगली सब्जियां भी होती हैं जिनमें से एक है कमल ककड़ी, नंदकिशोर प्रजापति उसके बारे में हमें बता रहे हैं कि –

आज से लगभग पांच छः वर्ष पूर्व दाहोद (गुजरात) के बाज़ार में जब इसे पहली बार देखा तो बड़ा अचरज हुआ, दुकानदार से पूछा तो बताया कि यह कमल ककड़ी है और इसकी सब्ज़ी बहुत ही बढ़िया बनती है.

कमल ककड़ी कमल की जड़ों को कहा जाता है. कमल ककड़ी को ढेंस, भंसेड, भें, मुरार, कमल तना आदि नामों से जाना जाता है.

कमल ककड़ी का उपयोग औषधीय रूप से काफी महत्वपूर्ण हैं. कमल ककड़ी की सब्ज़ी के अलावा अचार व चिप्स बनाकर भी सेवन किया जाता है.

कमल ककड़ी में विटामिन सी, पोटेशियम, फोस्फोरस, कॉपर, फाइबर व खनिज लवणों का अद्भुत मिश्रण होता है. यह खून के संचरण को बढ़ाती है, जिससे शरीर में ऊर्जा बनी रहती है. इससे थकान दूर होती है तथा रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है.

महिलाओं में पीरियड्स के दौरान होने वाली खून की कमी को 4-5 दिन लगातार कमल ककड़ी का जूस पीकर पूरा किया जा सकता है. वज़न घटाने वालों के लिए भी इसका नियमित सेवन बहुत कारगर है. इसके नियमित सेवन से किडनी स्वस्थ्य रहती है तथा पथरी तक दूर हो जाती है. कमल ककड़ी का सेवन मधुमेह रोगियों के लिए भी काफी लाभप्रद होता है.

कमल ककड़ी, सूरण, गराडू, किंकोड़े ये सब जंगली सब्जियाँ कही जाती हैं जिसको आजकल के आधुनिक लोग शायद ही खाते हैं, लेकिन मुझे ये सब बहुत पसंद है. मैं भी मालिनी दी की इस बात से सहमत हूँ कि ‘मुझ जंगली का मन जंगल में ही भटकता है’.

– माँ जीवन शैफाली

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2 thoughts on “मुझ जंगली का मन तो जंगल में ही भटकता है”

  1. Charu Nilesh Pandya says:

    शहतूत! बहुत खायेंगे हैं बचपन में मेरी एक सहेली थी कृष्णा , उसके घर में शहतूत का पेड़ था तो वो स्कूल लेकर आती थी ।

  2. अरूण कान्त पाण्डेय says:

    प्रकृति के आशीर्वाद से

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