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यह सुरेंद्र मोहन पाठक के लिए खतरे की घंटी है…

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मैं किशोरावस्था में तथाकथित लुगदी साहित्य का बड़ा प्रेमी था। हां, हमलोग उसे जासूसी नॉवेल कहते थे। सुरेंद्र मोहन पाठक, वेदप्रकाश शर्मा के साथ मैं तो जेम्स हेडली चेइज और रीमा भारती, केशव पंडित जैसों को भी खूब पढ़ता था।

हालांकि, इनमें पाठकजी को पढ़कर हमेशा ही लगता रहा जैसे वह व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट है। उनका अपने लेखन में दूसरे लेखकों के Quotes डालना, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के साथ पंजाबी में भी कुछ-कुछ डालना मानों पाठकों को बताता था कि वह लुगदी साहित्य में मजबूरी से फंसे हैं, वरना वह साहित्य की मुख्यधारा में जाना चाहते थे। (कम से कम एक पाठक के तौर पर हमलोग ऐसा ही मानते थे)

रीमा भारती जैसे छिछोरे थे, तो केशव पंडित और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लेखक कहीं न कहीं लुगदी में होने को तर्कसंगत बनाते थे- अपने लेखन से। पाठकजी अलग दिखने की कोशिश करते थे और मुझे पता नहीं कि यह कितना सायास और कितना अनायास है, पर जब हार्पर कॉलिंस से उनका उपन्यास छपा, लुगदी के बजाय बढ़िया कागज पर छपा और 60 की जगह 175 रुपए में बिका, उनकी जीवनी आयी और लोकप्रिय हुई तो मुझे लगा कि शायद …शायद उनके जीवन की खला मिट गयी हो…

…पाठकजी सहित तमाम लुगदी-साहित्य मैंने जम कर पढ़ा क्योंकि बाबूजी ने कभी उस पर आंखें चौड़ी नहीं कीं। वह भी मेरे साथ उनको पढ़ते थे, कई बार जब काफी दिनों तक मैं कोई नया उपन्यास नहीं लाता, तो पूछ भी बैठते थे। मेरे घर में महाभारत के साथ ही कामसूत्र भी बिना किसी कवर के, वैसे ही खुली हुई रहती है (इस चक्कर में भले ही दो बहुत महंगे कामसूत्र भले ही भाईलोगों ने उड़ा दिए हों.. हा हा हा)।

…मैं पाठक जी के लेखन से इतना रिलेट करता था कि मैं और मेरा एक दोस्त खुद को सुनील-रमाकांत कहकर बुलाया करते थे। वह भी पाठकजी का शैदाई था और चूंकि वह व्यापार करने वाला था, देर तक सोता था तो वह रमाकांत और मैं चूंकि पत्रकार बननेवाला था, थोड़ा गंभीर टाइप का था, तो सुनील….।

…बहरहाल, अभी काफी वर्षों (सात-आठ साल तो कम से कम) के बाद पाठकजी की एक किताब ‘कॉनमैन’ खरीद ली, वह भी अपने फेवरेट सुनील सीरीज की। यकीन मानिए, पंद्रह दिनों से उस किताब को पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं, एक या दो पन्ने पढ़कर वापस रख देता हूं। मुझे याद है कि पाठकजी का कोई भी नॉवेल मैं एक दिन से अधिक नहीं चलने देता था। यही नहीं, पहले जिन डायलॉग्स, जैसे- हस्सया ई कंजर- पर हंसी आती थी, इस बार देखा कि खीझ आ रही है, या फिर उन जगहों पर जहां पाठकजी अपना ज्ञान प्रदर्शित कर रहे हैं।

…तो क्या सचमुच रुचियां बदल गयी हैं, मेरी? यह बात भले ही बहुत Cliche है, लेकिन परिवर्तन ही शायद सच है। ‘देवदास’ और ‘गुनाहों का देवता’ जब मैंने मैट्रिक में पढ़ी थी, तो आंसू बहाए, उसके लेखक को देवता माना, लेकिन स्नातक में दोबारा पढ़ने पर मुझे ‘देवदास’ बिल्कुल लिजलिजा और ‘गुनाहों का देवता’ वाहियात और कोरी भावुकता में सना एक बेहद कमज़ोर उपन्यास लगे।

शायद मेरा कसने का निकष मजबूत हो गया …शायद मुझे यह बात समझ में आ गयी कि भारत में हर आयु-वर्ग के लिए अलग किताबें क्यों होती थीं, जैसे बुजुर्ग ही आध्यात्मिक किताबें क्यों पढ़ते हैं या थे, या फिर नौजवान अलग और बच्चे अलग…..

मुझे लगता है कि सुरेंद्र मोहन पाठक मुख्यधारा में आने के चक्कर में अपना Core खो रहे हैं, वह अपना जादुई रहस्य बरकरार रखें, मुख्यधारा में तो वैसे भी कूड़े की होड़ कूड़े से है…उसको और क्या बढ़ाना?

पाठकजी का लगभग दो दशकों का समर्पित पाठक अगर उनकी किताब को 15 दिनों में नहीं पूरा कर पा रहा है, तो यह उनके लिए खतरे की घंटी ही है….काश कि उन तक यह बात पहुंच पाती..।

– व्यालोक पाठक

मैं और मेरी किताबें अक्सर ये बातें करते हैं : हस्या ई कंजर

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