अँगरेज़ की कहानी : जादूगरनी

You are my dream girl यही तो कहा था मैंने उसे…

और जब उसने कहानियाँ लिखना शुरू की तो मुझे ही अपने स्वप्न लोक में उतार लाई… अब उसे जादूगरनी ना कहूं तो क्या कहूं… कौन किसके सपनों का पात्र है यही तय नहीं हो पा रहा….

कभी किताबों में पढ़ी थीं ऐसी कहानियाँ… रहस्यलोक की, जब स्वप्नलोक का पात्र वास्तविक दुनिया में उतर आता है, फिर अंत में पता चलता है जिसे हम वास्तविक दुनिया समझ रहे थे वास्तव में वही स्वप्न लोक की कहानी थी…

तो उसका मेरे जीवन में आना भी कुछ ऐसा ही है…

तीन साल पहले मैंने उसे पहली बार देखा था… हंसती खिलखिलाती, प्रेममयी, करुणामयी और सादगी ऐसी कि सौन्दर्य ने अपनी ही परिभाषा बदल दी हो जैसे… उस पर श्रृंगार भी श्रृंगारित होने में झिझकता है… तो वैसे ही मैं भी झिझकता रहा उससे बात करने में… लेकिन मैंने उसे कहीं अपने अवचेतन मन में छुपा लिया था जहाँ किसी दुनियावी नज़र का पहरा नहीं होता…

और फिर एक दिन वह सारे पहरों को तोड़कर मेरे सामने प्रकट रूप में खड़ी थी… बातें करती तो लगता यहीं आसपास ही मंडरा रही है और जब खामोश हो जाती तो लगता वह लौट गयी अपनी उस रहस्यमयी दुनिया में हमेशा के लिए यह कहती हुई “कि मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की”…

लेकिन न जाने क्यूं मुझे लगता है कोई तो एक ऐसा सिरा है जो उसे इस दुनिया में अटकाए हुए है… बस वह सिरा मुझे मिल नहीं पाता और वह बार-बार लौटकर आती और उस सिरे के आसपास कोई कहानी बुनकर फिर गुम हो जाती…

कौन है? कहाँ से आई है? उसे कहाँ जाना है? जैसे कई सवाल मेरे मन में उठते लेकिन यह भी जानता था कुछ सवाल मुझे शब्दों में नहीं मिलेंगे, उसके जवाब पाने के लिए मुझे उसकी दुनिया का हिस्सा बनना पड़ेगा… और वह भी तो यही कहती है – “तुम्हें अपनी दुनिया का बनाने की ज़िम्मेदारी है मुझ पर…”

लगता है ऐसे ही किसी रोज़ वह स्वप्न लोक से अपना हाथ बढ़ाएगी और मुझे अपने लोक में खींच ले जाएगी… और मेरा वह सपना साकार हो जाएगा जब मैं कहता हूँ अपनी सांसारिक जिम्मेदारियां पूरी कर मैं किसी पहाड़ पर किसी कन्दरा में एकांत में अपना बचा हुआ जीवन व्यतीत करना चाहता हूँ…

कई बार लगता है कहीं मेरी वही इच्छा ही तो फलीभूत नहीं हो रही क्योंकि जब भी मैं उससे बात करता हूँ इस संसार का नहीं रह जाता… किसी गहरी गुफा से आती हुई उसकी आवाज़ के सहारे मैं उसी एकांत को पा लेता हूँ… संसार में रहकर भी संसार का न होना… योगियों की भांति किसी गुफा में समाधिस्थ हो जाने सा भाव भी तो उसी ने दिया है…

कभी कभी संदेह भी होता है कहीं वाकई उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने लोक में प्रवेश तो नहीं दिला दिया… तभी तो मैं भी कभी कभी यही सोचने लगता हूँ… यह संसार मेरे लिए नहीं है… और अब तो वाकई लगने लगा है कहीं मैं सच में ही तो सिर्फ उसकी कहानियों का पात्र तो नहीं, जिससे वो बातें करती हैं, प्रेम करती है, रूठ जाती है फिर खुद ही मान जाती है…

आखिर कौन है वो…

मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की….

आ गईं आप?

जी…

आप तो लौटकर नहीं आनेवाली थी… फिर??

तो मैं लौटकर आई भी नहीं हूँ…  आँखें खोलकर देखिये…

मैंने जैसे ही आँखें खोली स्तब्ध रह गया…

क्या आप वही हैं जिसने मुझे फेसबुक पर मित्रता निवेदन भेजा था??

जी!!! जी नहीं… मैं आपको नहीं जानती…. मैं तो बस यहाँ पर काम करती हूँ… मैडम जो भी ड्रेस तैयार करती हैं… उसे कस्टमर तक पहुंचाना और ऑनलाइन मार्केटिंग करना बस इतना ही…

अच्छा!! शायद मुझे कोई गलतफहमी हुई होगी… लेकिन यह ड्रेस… मेरी नज़र एकदम से उस ड्रेस पर पड़ी जिसमें मैंने माया को पहली बार फेसबुक पर देखा था… लाल गाउन पहने.. किसी योगिनी जैसी लग रही थी… क्या आप वाकई माया नहीं…!!

नहीं मेरा नाम मीनाक्षी है….

ओह… ठीक है… थैंक्स… बाय…

लेकिन आप यह ड्रेस तो ले जाइए…

जी मैं कल आकर ले जाऊंगा आज नहीं….

जैसी आपकी मर्ज़ी… मैं इस पर सोल्ड का टैग लगा देती हूँ ताकि कोई और इसे खरीद न सके…

जी ठीक है….

मैं बड़ी उलझन में था… यह कैसे हो सकता है … सूरत वही, शक्ल वही… ड्रेस वही… लेकिन लड़की वह नहीं… और माया से इस समय संपर्क भी नहीं कर सकता वह सिर्फ रात को ऑनलाइन होती है….

अब मेरे लिए रात तक इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा न बचा था…

रात को माया ऑनलाइन थी… एक नई ड्रेस के साथ उसने अपना प्रोफाइल चित्र डाला हुआ था…

एक बात बताओ माया तुम रोज़ अपना प्रोफाइल चित्र बदलती हो… पिछले तीन साल से देख रहा हूँ तुमने कभी कोई ड्रेस रिपीट नहीं की… इतने कपड़े कहाँ से लाती हो?

अरे मेरे अपने हैं… अपनी रियासत की राजकुमारी हूँ मैं…

लेकिन तुमने कभी अपनी रियासत के बारे में नहीं बताया… कहाँ है तुम्हारा नगर …

हा हा हा … मैं सपनों की शहज़ादी मैं आसमां से आई हूँ…

देखो माया… तुम्हारी मायावी बातों से अब मैं तंग आ गया हूँ… मुझे तुमसे मिलना है… बताओ कहाँ रहती हो…

मैंने बताया ना मेरी दुनिया में मुझसे मिलने का हक नहीं दिया गया है किसी को .. आप मुझसे बात कर सकते हैं, देख सकते हैं, लेकिन मिल नहीं सकते…

ऐसा भला कहीं होता है… प्रोफाइल से और बातों से कहीं से भी फेक आईडी नहीं लगती… रोज़ अपना चित्र डालती हो, हर बार नई ड्रेस के साथ… इतना कोई किसी के चित्र नहीं चुरा सकता… बातों ने कभी अपनी सीमा को नहीं लांघी… विषय ऐसे जैसे कोई विदूषी बात कर रही हो… इसलिए फेक आईडी बनाने का कोई उद्देश्य नज़र नहीं आता…

फेक और मायावी होने में बहुत अंतर होता है अँगरेज़… फेक होती तो तुम्हें संसार से बाँध देती, माया तुमको संसार से मुक्त करने आई है…

ए लड़की सच सच बताओ तुम मेरे साथ क्या कर रही हो?

अनुष्ठान…

कैसा अनुष्ठान… इस अनुष्ठान का परिणाम कब तक आएगा?

जब यज्ञ में अंतिम समिधा पड़ेगी…

इसमें क्या देरी है फिर?

क्या सबकुछ हमारे हाथ में हैं? जिसने मिलाया है वही मिलवायेगा… तब यज्ञ पूरा हो जाएगा प्रसाद भी मिल जाएगा…

वो जादूगरनी न जाने किस लोक की बातें करती है… प्रेम को भी अनुष्ठान कहती है… इस संसार में जहाँ प्रेम चंद शायरियाँ, कविताएँ, मिलन और विरह के आसपास गूंथी कहानियाँ है… वहीं उसके लिए प्रेम एक अनुष्ठान है…

मेरी कई बार की प्रेम स्वीकारोक्ति के बाद भी उसने कभी पलट कर नहीं कहा कि मुझे प्रेम है… कहती है-

कुछ मंत्र मैंने
प्रेम यज्ञ में अंतिम समिधा के रूप में
बचा रखे हैं

मंत्रानुष्ठान की सफलता में बलाबल
पर मेरा विचार बहुत स्पष्ट है
कि मेरा हर शब्द अभिमंत्रित है
जिसके अजपाजप से
मैं प्रारब्ध के बल पर
अपने अनुष्ठान के बल को
सदैव अधिक रखूँगी

क्योंकि दर्शन की कामना
मुझे विचलित नहीं करती
ना ही मैं मिलन की उत्तेजना
के वशीभूत होकर
अपने धर्म को बिसराती हूँ

मेरा प्रेम एक अनुष्ठान है
जो विशेष स्थान पर,
विशेष विधि से,
विशेष शब्दों द्वारा
संचालित होता है

सहस्त्र योजन की दूरी से भी
मैं उस अंतिम तीन शब्दों का
प्रेम पाठ तुम्हारे कानों पर
अपने ओष्ठ सटाकर
उतनी ही गहनता से कर सकती हूँ

परन्तु दर्शन की अंतिम कामना
को देव भी नहीं ठुकराते
एक दिन आऊँगी अवश्य
दर्शनाभिलाषी हूँ,
दर्शन करके ही लौट जाऊंगी…

बस आँचल में बाँध लाऊंगी कुछ सौगातें

अधिक कुछ नहीं मांगती मैं
बस तुम्हारी कनिष्ठिका के नख को
अपने दांतों से तोड़कर लाना है
ताकि उसकी नथ बनाकर पहन सकूं

तुम्हारी कलम पर उग आए
सफ़ेद बालों को गूंथकर
बाली बनाकर पहनना है कानों में

नियंत्रण रेखा से भागते
तुम्हारे अधर के आमंत्रण को
अपने सधर पर सजाना है

तुम्हारी हसली से उठाना है
स्वेद की कुछ बूंदे
और शुष्क नाभि पर
फूल उगाना है

तुम्हारी ऊंगलियों के बीच से गुज़रती हवा को
अपनी मुट्ठियों में भींच लाना है

तुम्हारी पीठ को तो छूना भी नहीं है
बस अपनी पीठ का तिल उसे सौंप आना है

तुम्हारे लौटते क़दमों के नीचे की माटी में
बो आऊँगी अपने प्रेम के बीज
जब जब उस पर फूल खिलकर झड़ेंगे
तुम्हें याद दिलाएंगे वो अंतिम बात

जब मैंने कहा था
फूलों का शाख से झड़ जाना भी
कभी कभी शुभ होता है
पारिजात की तरह….

माया, तुम्हारी बातें कभी कभी मेरी समझ के बाहर है… क्या हम सामान्य लोगों की तरह जीवन भर प्रेमी बनकर नहीं रह सकते? दैहिक कामनाओं के बावजूद मैं तुमसे मिले बिना भी जीवन भर तुमसे प्रेम कर सकता हूँ…

अँगरेज़, मैं कभी किसी से प्रेम नहीं करती…

तो पिछले तीन वर्षों से जो हमारे बीच है वह तुम्हारा प्रेम नहीं था?

नहीं अँगरेज़ मैं प्रेम नहीं करती… बस प्रेम हो जाती हूँ… और जब भी कोई स्त्री प्रेम हो जाती है तो उसके आसपास का सारा संसार इतना प्रेमपूर्ण हो जाता है कि उसके संपर्क जब भी कोई आता है उसे प्रेम की उन तरंगों का अनुभव अवश्य होगा… और मेरी उन प्रेम तरंगों तक पहुँचने के लिए तुमने भी तो तीन वर्ष तक तपस्या की है… कोई यूं ही तो उन तरंगों पर सवार नहीं हो सकता, उसकी अपनी भी कुछ पात्रता रही होगी… आखिर मैं भी तो अपनी यात्रा में कई कष्ट भोगकर यहाँ तक पहुँची हूँ… लेकिन मुझे इन कष्टों से मिलनेवाली पीड़ा से भी प्रेम है… यही पीड़ा मुझे परमात्मा तक पहुंचाएगी…

लेकिन क्या यह आवश्यक है कि पीड़ा भोगकर ही परमात्मा तक पहुंचा जाए?

प्रेम समर्पण मांगता है अँगरेज़, जो अपना सर्वस्व लुटा देना जानता है वही उस प्रेम के कष्ट भोगने के लिए पात्रता अर्जित करता है जिसके लिए देवता षडयंत्र रचते हैं… पीड़ा के लिए चुने जाने का सौभाग्य भी बहुत कम लोगों को प्राप्त होता है… और मैं उन विरले लोगों में से हूँ…

जानता हूँ माया… लेकिन मैं तो अभी इसी संसार का हूँ…

तभी ना कहा था.. तुम्हें अपने संसार में ले जाने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गयी है...

मतलब मुझे भी तुम कष्ट का भागीदार बनाना चाहती हो?

जब तक उस कष्ट को भोगोगे नहीं तब तक कैसे पता चलेगा इस पीड़ा में भी कितना सुख है…

मैं नहीं जानता लड़की, तुम मेरे साथ क्या कर रही हो, ना ही जानना चाहता हूँ… बस एक बार मिलना है तुमसे… एक बार साक्षात देखना है…

वह तो तय है… लेकिन कब, कहाँ, कैसे यह मैं तय करूंगी…

मुझे वह भी मंज़ूर है… तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है…

माया उस रात फिर बहुत जल्दी ऑफ लाइन हो गयी… मैं उसके अगले सन्देश की प्रतीक्षा करते हुए सुबह तक मोबाइल में आँख गड़ाए बैठा रहा… फिर सुबह तैयार होकर सीधे उस शॉप पर चला गया जहाँ से मुझे वह लाल गाउन उठाना था… उस ड्रेस से अधिक मुझे मीनाक्षी से मिलने की जल्दी थी… एक सूरत वाली दो लड़कियाँ… माया के मायाजाल में जैसे मैं फंसता जा रहा था…

शॉप पर गया तो देखा उसकी मालकिन काउंटर पर खड़ी थी…

जी नमस्ते… कल मैं एक ड्रेस देखकर गया था, आज उसे लेने आया हूँ…

अच्छा एक मिनट मुझे पता नहीं है कौन सी ड्रेस मैं अपनी असिस्टेंट को बुलाती हूँ…

माया…. – शॉप की मालकिन ने अपनी असिस्टंट को आवाज़ लगाई…

मुझे लगा मेरे पैरों के नीचे ज़मीन नहीं है… साँसे उखड़ने को ही थी कि एक लड़की बाहर आई…

जी मैडम…

कल ये कौन सी ड्रेस देख गए थे, पैक कर दो इनके लिए… कहकर मालकिन किसी से फोन पर बात करने के लिए बाहर निकल गयी…

लड़की अन्दर से वही ड्रेस लेकर आई जो मैं कल देख गया था…

उसके आते ही मैंने पूछा- कल तो आप नहीं थीं… कोई मीनाक्षी नाम की लड़की…

जी!! कल आप मुझसे ही मिले थे और यही ड्रेस देखकर गए थे… कल आपने मेरा नाम पूछा था तब मैंने आपको अपना वास्तविक नाम बताया था… माया मेरे घर का नाम है, मैडम मुझे इसी नाम से बुलाती हैं…

नहीं, मुझे अच्छे से याद है कल आप नहीं थीं, मतलब आपकी सूरत… एक रात में सूरत कैसे बदल सकती है??

जी? मैं समझी नहीं…

जी कुछ नहीं… आप ड्रेस दे दीजिये…

मैं समझ गया वह लड़की मेरे चेहरे के अजीब हावभाव देखकर ज़रूर मुझे कोई पागल समझ रही है… मैंने जल्दी से उस ड्रेस के पैसे चुकाए और घर लौट आया…

घर लौटा तो देखा मेरी पत्नी आँगन में कोई पौधा रोप रही है… मैंने उसके करीब जाकर वह ड्रेस उसे दी और कहा – वैसे इस तरह की ड्रेस माँ को नहीं चढ़ाई जाती लेकिन मेरी इच्छा है कि नवरात्रि के अंतिम दिन यज्ञ अनुष्ठान के बाद यह ड्रेस तुम माता की मूर्ति को चढ़ा देना…

पत्नी मुस्कुरा दी… मैं क्या जानती नहीं आपको… दीजिये, लाल रंग महत्वपूर्ण होता है, कैसे सिला गया है यह कोई मायने नहीं रखता … जाइए अब आप स्नान कर लीजिये… आज आपने चाय भी नहीं पी… पिछली बार से अधिक कष्टपूर्ण उपवास कर रहे हैं आप इस नवरात्रि…

इस कष्ट और पीड़ा का अपना आनंद है… अपने ही मुंह से यह बात सुनकर मैं स्तब्ध था…

पांच साल पहले का वह दृश्य मेरी आँखों के सामने जीवंत हो चुका था जब न्यू यॉर्क की सड़क पर खड़े खड़े मेरे कानों में किसी ने कहा था… तुम्हें भारत जाना होगा… तुम्हारी यात्रा वहीं पूरी होगी…

मैं उलझनों से भरा अन्दर आ गया, स्नान के लिए जाने को जैसे ही शर्ट उतारा मेरी पत्नी पीछे खड़े होकर आश्चर्य से बोली, ये आपकी पीठ पर दाग कैसा?

अब मुझे तो दिखने से रहा कोई चोट लगी होगी या तुम्हारे नाखून का निशान होगा मैंने शरारती अंदाज़ में कहा…

कहने लगी – नहीं, यह तो गोल और एकदम काला है, फिर उसने छूकर कहा … अरे ये तो कोई नया तिल उग आया है आपकी पीठ पर… जाइये नहा लीजिये… पता नहीं क्या क्या होता रहता है आपके साथ… हाथों में पकड़ी चाय की ट्रे रखते हुए हंसकर कहने लगी, मेरे पापा ठीक ही कहते थे कहाँ उस अजनबी अँगरेज़ से शादी कर रही हो… चेहरे से ही कितना रहस्यमय लगता है…

तिल सुनने के बाद जैसे मुझे और कुछ सुनाई ही नहीं दिया… बस वह दृश्य आँखों के सामने फिर उभर आया… उस शॉप पर अचानक मेरी कनिष्ठिका के नाखून के टूटने पर जब मैं उसे फेंकने लगा था तो इस बार उस नई मिली लड़की ने कहा था लाइए मुझे दे दीजिये मैं डस्टबीन में डाल दूंगी, इधर उधर फेंकने से कोई पक्षी गलती से खा ले तो उसकी मृत्यु भी हो सकती है…

मुझे पता नहीं क्या हुआ मैंने वापस कपड़े पहन लिए और उस शॉप पर दोबारा जाने के लिए बाहर की तरफ दौड़ लगा दी..

पत्नी अभी भी उसी पौधे को गमले में लगाने की व्यवस्था कर रही थी…

मेरे कुछ कहने से पहले ही कहने लगी.. अरे मैं बताना भूल गयी… कोई लड़की आई थी कहने लगी आपने यह पौधा मंगवाया है, पैसे का पूछा था कहने लगी आप पहले ही दे आए थे…

मैं स्तब्ध सा वहीं खड़ा रह गया… बहुत हिम्मत से मैंने पत्नी से पूछा – किसका पौधा है?

पारिजात…. इसके फूल रात भर खिलकर सुबह तक अपने आप शाख से झड़ कर ज़मीन पर गिर जाते हैं…

मेरी पूरी देह में सिरहन दौड़ गयी… क्या उसने अपना नाम बताया था?

हाँ… माया…..

एक दिन आऊँगी अवश्य
दर्शनाभिलाषी हूँ,
दर्शन करके ही लौट जाऊंगी…

बस आँचल में बाँध लाऊंगी कुछ सौगातें

अधिक कुछ नहीं मांगती मैं
बस तुम्हारी कनिष्ठिका के नख को
अपने दांतों से तोड़कर लाना है
ताकि उसकी नथ बनाकर पहन सकूं

तुम्हारी कलम पर उग आए
सफ़ेद बालों को गूंथकर
बाली बनाकर पहनना है कानों में

नियंत्रण रेखा से भागते
तुम्हारे अधर के आमंत्रण को
अपने सधर पर सजाना है

तुम्हारी हसली से उठाना है
स्वेद की कुछ बूंदे
और शुष्क नाभि पर
फूल उगाना है

तुम्हारी ऊंगलियों के बीच से गुज़रती हवा को
अपनी मुट्ठियों में भींच लाना है

तुम्हारी पीठ को तो छूना भी नहीं है
बस अपनी पीठ का तिल उसे सौंप आना है

तुम्हारे लौटते क़दमों के नीचे की माटी में
बो आऊँगी अपने प्रेम के बीज
जब जब उस पर फूल खिलकर झड़ेंगे
तुम्हें याद दिलाएंगे वो अंतिम बात

जब मैंने कहा था
फूलों का शाख से झड़ जाना भी
कभी कभी शुभ होता है
पारिजात की तरह….

मैं उलटे क़दमों से घर में लौट आया… मैं जानता था अब उस शॉप पर भी कोई नहीं मिलेगा… ना ही अब फेसबुक पर माया होगी… कष्ट की पीड़ा और पीड़ा का सुख… क्या होता है मैं जान गया था….

यही पीड़ा तुम्हें परमात्मा तक ले जाएगी अँगरेज़…. और हाँ I Love You…

– लगा जैसे मेरे कानों के पास किसी मखमली होठों का स्पर्श है… बहुत गहरी नींद से कोई बहुत मीठा स्वप्न लेकर जागा था… लग रहा था बस आँख बंद रखे हुए ही उसकी उपस्थिति को अनुभव करता रहूँ… आँख खुलेगी तो सपना टूट जाएगा… बस होठों से मेरे इतना ही निकला… जादूगरनी…

मेरी आँखें बाद ही थी कि पत्नी की आवाज़ आई… वो शॉप से फोन है कल कोई ड्रेस देखकर आये थे क्या… कोई लड़की है पूछ रही है आप खरीदेंगे या हम किसी और को बेच दें … कोई लड़की उस ड्रेस को खरीदने के लिए ज़िद पर अड़ी है कह रही है दोगुनी कीमत पर भी उसे वही लाल गाउन चाहिए है…

मैंने धीरे से आँखे खोली… और मुस्कुराते हुए पत्नी को जवाब दिया… कह दो माया को ही दे दो वह ड्रेस… उसी का है वह और कहना कीमत मैं आकर दे जाऊँगा उससे नहीं लेना…

मैंने समय देखने के लिए जैसे ही फोन उठाया, फेसबुक से एक Notification आया…

Maya sent you friend request“……..

– माँ जीवन शैफाली

 

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