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फ़ादर्स डे : एक था बचपन, बचपन के एक बाबूजी थे

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फादर्स डे के बहाने…

अपने पापा के साथ मैं बहुत दोस्ताना नहीं हूँ. पिता-पुत्र के संबंधों की प्रचलित गरिमा हमारे बीच मौजूद है. पापा से मुझे कुछ कहना होता है तो माँ जरिया बनती है और यही स्थिति पापा की भी है.

हालांकि, अब कई बार संवाद सेतु की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन स्थिति उतनी सहज भी नहीं है, जितनी अपने से बाद वाली पीढि़यों में पाता हूँ. माँ के साथ अत्यंत सहज, बिल्कुल दोस्ताना और पापा के साथ एक स्वाभाविक दूरी.

बावजूद इसके, बाप-बेटे के रिश्ते में ऊर्जा की कभी कमी नहीं महसूस हुई. मेरे पापा का दादा के साथ भी कुछ ऐसा ही संबंध रहा. मैंने बहुत से मित्रों का भी अपने पिता के साथ ऐसा ही संबंध देखा है. पिता-पुत्र के बीच संबंधों को “आज्ञाकारिता” के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति रही है. लेकिन संबंधों के इस मनोविज्ञान को सिर्फ आज्ञाकारिता कहना… सरलीकरण अधिक प्रतीत होता है.

दरअसल, अतीत में पिता होने का अर्थ बेहद स्पष्ट था- एक ऐसा व्यक्ति जिसकी छवि बेहद सख्त हुआ करती थी… जिसकी जिम्मेदारियाँ परिजनों के बेहतर जीवन-यापन के लिए संसाधनों को जुटाने की थी… हद दर्जे तक व्यस्त… बच्चों के लालन-पालन के संदर्भ में लगभग अनुपस्थित या हमेशा पृष्ठभूमि में रहने वाला.

अर्द्धनारीश्वर की संकल्पना वाली हमारी संस्कृति ने पिता के वात्सल्य को माँ की ममता की तुलना में हमेशा कमतर आँका. ऐतिहासिक संदर्भों में अधिकांश वैश्विक संस्कृतियों ने भी पितृत्व की अवहेलना ही की है. दूसरी ओर, अपने अंदर उठने वाले अनुराग, स्नेह, दया, परवाह, दुलार की हूक की अनदेखी के लंबे इतिहास के कारण खुद पिता इस झूठ को स्वीकार करने लगा कि वह कठोर है और चुपचाप इस उपेक्षा को ओढ़ लिया, जबकि साक्ष्य के रूप में ढेरों अध्ययन दर्शाते हैं कि समर्पित पिता हमेशा खुद पिता के लिए न केवल महत्वपूर्ण है, बल्कि प्राकृतिक भी है.

हालांकि, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि पितृत्व और मातृत्व में मूलभूत अंतर है. बच्चे के जन्म से पूर्व और बाद में मातृत्व एक स्पष्ट विस्तार है. यह माँ और बच्चे के बीच गर्मजोशी से भरा सौहार्दपूर्ण व्यवहार है, जो बच्चे और माँ को शारीरिक रूप से जोड़ता है. लेकिन पितृत्व शारीरिक विस्तार से सीधे नहीं जुड़ा है और न ही यह शारीरिक घोषणा है, जो बच्चे के जन्म के साथ जुड़ी हो.

पितृत्व एक आत्मीय खोज है जो धीरे-धीरे बच्चे और पिता के बीच पनपती है. वैश्वीकरण के बाद पितृत्व-मातृत्व की इस प्रचलित अवधारणा में तेजी से बदलाव आया है. स्त्रियों ने घर की देहरी लांघ अपनी कामकाजी छवि बनाई. परिणामस्वरूप घर के कामकाज से लेकर बच्चों के लालन-पालन तक में पुरुषों के सहभागिता होने लगी. पिता का अपने बच्चों से शारीरिक लगाव बढ़ा और उसने यह साबित किया कि वह स्थापित मान्यताओं से अधिक उभयलिंगी होता है. उसमें सख्त और पोषक दोनों बनने की क्षमता है.

आज पिताओं ने यह साबित कर दिया कि लंबे समय से चली आ रही पुरुषों की आक्रामक भूमिका उसकी क्षमताओं को कम आंकने और उसे ढेरों मानवीय संवेदनाओं का अनुभव से वंचित रखने से अधिक कुछ नहीं है.

न्यू यॉर्क के फैमिलीज एण्ड वर्क इंस्टीट्यूट के अनुसार पिता बच्चों की सार-संभाल में तीन चौथाई योगदान देने लगे हैं, जितनी माँएं आज से वर्षों पहले दिया करती थी. अमेरिका स्थित पीऊ रिसर्च सेंटर के मुताबिक 1965 में अमेरिका में एक पिता अपने बच्चों की देखभाल पर माँ के 10 घंटे में सप्ताह भर औसतन ढाई घंटे का योगदान करता था.

वर्ष 2011 में माँ के 14 घंटे में पिता का योगदान औसतन 10 घंटे का हो गया था. ये बड़े आंकड़े हैं, जो दिखाते हैं कि पुरूष भी अब बच्चों के पालन-पोषण में प्राथमिक भूमिका निभा रहे हैं. यानि समय अब साझा पैरेंटिंग का हो चला है. और यही कारण है कि आज के दौर में माँ की ममता के समक्ष पिता का वात्सल्य कहीं से कमतर नहीं ठहराया जाता है.

पिता और बच्चों के बीच रिश्तों में सहजता, खुलापन और दोस्ताना संबंध विकसित हो रहा है. और सबसे अच्छी बात, आज पिता यह अनुभव करने लगे कि पितृत्व सिर्फ कर्तव्य नहीं है, बल्कि परिपूर्णता का एक एहसास है, जो उनके पिता होने के वास्तविक अर्थ को परिभाषित करता है.

अमेरिका जैसे देशों में पिता की बदलती भूमिका के मद्देनजर पितृत्व अवकाश की अवधारणा भी तेजी से विकसित हुई है. अपने देश में भी पितृत्व को सामाजिक मान्यता मिलने लगी है. फादर्स डे जैसे आयोजनों को इसी श्रृंखला की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है. और हाँ, इन बदलावों को देखते हुए मैंने भी खुद में बदलाव किया…

फादर्स डे पर पापा को एक प्यारा सा मैसेज किया… ये जानते हुए भी कि पापा खुद से मैसेज नहीं देखते हैं और इसके बारे में उन्हें माँ से ही जानकारी मिलने वाली है…
(आँकड़ें / तथ्य पत्र-पत्रिकाओं से)

– अभिषेक दास

मैं ही हूँ अपनी माँ भी, बाबूजी भी

कोने में कहीं दबा बैठा था उकड़ूँ सा दर्द
आँखों में कहीं बहुत पीछे आँसू
जहाँ शायद आँखें ख़त्म हो जाती हों
ज़ोर लगा कर याद करनी पड़ती वो तारीख़
जब छोड़ गई माँ
जब छोड़ गए बाबू जी
हिसाब लगाना पड़ता कितने साल जिए बाबू जी माँ के जाने के बाद
माँ नहीं चाहती थी कोई भी उम्र बाबू जी के बाद
आज पढ़ कर अचानक से किसी की लिखी एक कविता
वो दफ़न हुए आँसू जेठ के महीने में आई बरसात की तरह उमड़ पड़े
छाती भारी होने लगी
गला रूँधने होने लगा
मौत किसी की भी हो
आँसू जो बह रहे होते हैं
अपने बिछड़े हुओं के हक़ के होते हैं

उसके हाथों में देख कर लाल रंग की छोटी सी पोटली
याद आने लगा वो मंज़र
कैसे दूरज्ञाना मंदिर के लाकर रूम
जिसमें पड़ी थी अनगिनत पोटलियां
हमने अपने वाली उठाई
इतने ही अवशेष बचे थे जिन्हें पानी में बहाना था
पोटली, सिर्फ़ एक छोटी सी पोटली
पूरी ज़िंदगी की पोटली
अनन्त प्यार की पोटली
चाहतों, ख़्वाहिशों की पोटली
कहानियाँ सुनते वक़्त रात को कभी सोचा था यह भी
एक दिन यह कहानी सुनाने वाले मेरे हाथ में एक पोटली में बंद होंगे?

लगा था सब भूल गया
या फिर बहुत धुँधला तो हो ही गया
अब तो तारीख़ भी याद नहीं रहती
नहीं पता था यह सब तो मेरे साथ इतना इकमिक हो गया है
कि याद किया ही नहीं जा सकता
मैं ही हूँ अपनी माँ भी, बाबूजी भी

– राजेश जोशी

तुम्हारे सच्चे मित्र घर में बैठे हुए हैं और तुम्हारी फ्रेंड रिक्वेस्ट का इंतज़ार कर रहे हैं. भेज कर के तो देखें , एक्सेप्ट न हो तो कहना!

आजकल सुबह के बाद सीधी शाम ही होती है, सुबह उठकर तैयार होकर ऑफिस और ऑफिस से शाम को वापस हॉस्टल. घर पर जब था तब 1 दिन में तीन पहर होती थी, मगर इंदौर में दोपहर तो दो – पहर भी नहीं ठहरती. कब कौनसा त्यौहार आना है सब पता रहता था, अब आज कौन सा दिन है यही देखने के लिए आजकल कैलेंडर देखते हैं.

Father’s Day आ गया है. कोई कितना भी ‘मदर्स डे’, फादर्स डे और ऐसे दिनों का विरोध करे; मगर हम जैसे लोगों के लिए ये, एक ऐसे दिन के रूप में आता है जिस दिन हम सालों के प्यार और आशीर्वाद को एक छोटे से सेंटेंस ‘Happy Father’s Day’ कहकर खुश होते हैं. पिता भी अब इंतज़ार करते हैं कि बेटे का फ़ोन आएगा, मैसेज आएगा, फेसबुक पर शायद कुछ लिखा होगा? क्यों न करे!

पाश्चात्य संस्कृति कहकर क्या- क्या छोड़ोगे? नंगे हो जाओगे साहेब! जिस धर्म, जिस संस्कृति में जो चीज़ अपनाने में सहज लगे अपनाओ. घुटने पर फटा जींस रास नहीं आ रहा, कोई बात नहीं. छोड़ो! पिता को दो शब्द कहने में पाश्चात्य संस्कृति का भाषण देने लगते हो? कमाल है!

नींद नहीं आ रही है , 12:30 बज गए हैं रात के, शायद मेरे अंदर बैठा पिता जाग रहा है. सोच रहा हूँ कि मुझे घर से बाहर पढ़ने की इजाजत देने के लिए पापाजी और अंकलजी के दिमाग से कौन – कौन सी बातें होकर गुजरी होंगी?

दरअसल घर का मैं पहला सदस्य हूँ जिसने घर से बाहर जाकर पढ़ाई की. पिता की तरह सोचने में लग रहा कैसे हाँ कर दी? वो भी तो वहीँ पढ़े, अंकलजी भी वहीँ पढ़े, दादाजी भी वहीं पढ़े, बहन – भाई भी वहीँ पढ़ रहे हैं फिर मेरे ग्वालियर जाने के लिए हाँ कैसे कर दी?

घर की निगाह में इस फैसले के पीछे कोई विशेष उद्देश्य हो, मगर मेरी आँखें सिर्फ घर से बाहर जाने का सोचकर ही चमक रहीं थी. 20 साल में यह पहला मौक़ा था कि जब बेटा इतने समय के लिए घर से बाहर जाके रहेगा, घर और शहर दोनों से. इसके लिए उन्होंने मुझे इजाज़त दी या मैंने उनसे ले ली कुछ याद नहीं आ रहा.

पापा शायद मेरे बहुत करीब रहे हैं, मगर मैं उनके उतना करीब रहा ये पता नहीं. रिश्तों से दूर ही भागता रहा और नए रिश्तों को ढूढ़ने में लगा रहता. एक उम्र आती है जब हम घर में दोस्त न ढूढ़कर, बाहर ढूँढने लगते हैं. हमें लगता है, इनसे ज्यादा हमें बाहरी सदस्य समझने लगा है. बेशक! समझने भी लगा हो, मगर उनसे ज्यादा? सवाल ही नहीं उठता. मैं भी बाहरी लोगों से दोस्ती करता रहा और घर पर किसी एक से भी दोस्ती नहीं हो पाई, इस बात का मलाल आज भी होता है.

जब भी घर से वापस इंदौर आता हूँ, तो सामान ऐसे पैक करते हैं सभी मेरा कि जैसे ही खोलूँ तो सामान के साथ उनको भी पास खड़ा पाऊं. घडी ढूढ़ने पर आवाज़ सी आती है – तुमने ही रखी हुई थी बैग के बाईं जेब में भूल गए? शर्ट कहाँ गई. बैग में सबसे नीचे है!

कमाल है, इंदौर आकर बैग खोलते ही, पूरा घर फर्श पर आईने की तरह चमकने लगता है.

जब घर पर सभी के साथ होता हूँ तो अपने को पूरा पाता हूँ, यहाँ पूरे से थोड़ा कम सा महसूस होता है. मन से उठना, मन से सोना, अपने हिसाब से काम करना सब कुछ बदल सा जाता है.

ये सब तो ठीक है मगर बात ये है कि नींद नहीं आ रही, शायद मैं खुद खाली न हो जाऊं इस डर से जाग रहा हूँ.

कुछ लोग आज के दिन को तंज के रूप में भी लेंगे. अलग- अलग तरीके से आधुनिकता के नाम से उलाहना देते दिखेंगे, उनकी बात पर बहुत खूब, बहुत उम्दा कहने वाले भी उनके अपडेट पर मिल जाएंगे.

आज कई पिताओं के दर्शन हुए, मैंने अभी तक पिता की तस्वीर नहीं डाली शाम हो गई क्या लोग मुझे माफ़ करेंगे, रखना है तो दिल में रखो dp में क्या रखना. मैं तो कहता हूँ 24 घंटे रखने में भी उनको अपराध बोध हो रहा, तो उम्र भर दिल में रखेंगे या दिल पर ये आप खुद समझ सकते हैं. अच्छा कुछ तो ऐसे होते हैं घड़ी से मिलाकर 12 बजे अपनी फोटो की जगह अपने पिता की फोटो डालते हैं और ठीक रात 12 बजे बदल देते हैं. इतनी ईमानदारी से ‘फादर्स डे’ सेलिब्रेट करते हैं.

पिछली बार मैंने ‘मदर्स डे’ पर अपने व्हाट्सअप की पिक्चर में अपने घर की सभी लेडीज़ की फोटो डाली हुई थी, मदर्स डे खत्म हुए 4-5 दिन ही हुए थे किसी दोस्त का मैसेज आया अब तो निकल गया हटा लो. मैंने पूछा क्या? क्यूंकि मैंने बदलना उचित नहीं समझा; पर उसने इस तरह कहा कि मुझे फिर रखने में लगा कि हो गया, हो गया. सही तो है, हटा लेना चाहिए.

तो इस फादर्स डे पर मैं सभी पिताओं को आव्हान करके कहता हूँ कि – 24 घंटे के लिए नायक बनने का समय आ गया है आपका. आप भी कुछ भावपूर्ण कमेंट लिखकर; अपने बेटे / बेटी की फोटो पर लिखी लाइन्स को सार्थक बनाएं. 24 घंटे के लिए ही सही!

मैं वाकई ये फादर्स डे, मदर्स डे, ब्रदर्स डे, सिस्टर डे, अर्थ डे, एनवायरनमेंट डे ऐसे सभी दिनों को एक छोटे से उत्सव या समारोह की तरह मनाने का सोचने वाले को पुरस्कार देना चाहता हूँ. कमाल का और दूर का सोचा है उस बन्दे ने. वो जानता था कि कोई चीज़ एक समान कभी नहीं रहती चाहे वो कोई वास्तु हो या किसी का किसी के लिए प्यार बदलता रहता है, कभी कम कभी ज्यादा. जो भी होता है , इन “दिनों” में लोग पूरा कर भी लेते हैं. मेरे लिए तो ये “दिन” किसी मौके से कम नहीं होते.

मुझे अभी भी याद है कि – कुछ महीने पहले, किसी लेख को पढ़ के , मेरे पिताजी ने उस पर कमेंट किया था. उसमे मैंने बहुत कुछ लिखा था जो मेरे अंदर चलता रहता है , जो मैं सोचता रहता हूँ. मेरी फिजा मेरे घर में ही , मेरे कई जानने बालों ने या कहें रिश्तेदारों ने अलग तरह से परोसकर ख़राब कर रखी थी. मैंने वहाँ घटित कई घटनाओं का वो पहलु प्रस्तुत भी किया जो पहलू एक्चुअल में था. मुझे कमेंट अभी भी याद है , उन्होंने लिखा था –

“इतना कुंठित क्यों हों ?”
पढ़कर लगा कि अब कोई बोझ नहीं , मैंने कही तो निकाला. शाम को फ़ोन आता है , कुछ समय तक तो न वो कुछ पूछ पा रहे थे , न मैं कुछ बोल पा रहा था उस कमेंट को देखने के बाद. यहाँ- वहाँ की बातें करके अचानक से उन्होंने पूछा –

कोई बात है क्या ?

नहीं तो !

अच्छा ! कोई बात नहीं , अगर हो तो दोस्त की तरह बता सकते हो , अभी दोस्त की तरह ही बात कर रहा हूँ. बहुत सी बातें होतीं हैं जो हम किसी को नहीं बताते , मैं भी कई बातें तुम्हारी मम्मी को नहीं बताता. कुछ बातें होती हैं जो हम दोस्तों से शेयर कर पाते हैं. दोस्त ही समझो.

एक मिनट के लिए तो लगा ; यार कह के हाल – ए – दिल वयां कर दूँ , लेकिन सेन्स काम कर रहे थे इतने इमोशनल मोमेंट पर भी . लगा पापा फंसा तो नहीं रहे ; बातों – बातों में कुछ और जानना चाह रहे हों. हमने कहा – आपने इतना कह दिया बस वही बहुत है , कुछ भी होगा तो सबसे पहले आप से ही कहूँगा. बाकी घरवाले भी जल्द ही दोस्त बन जाएंगे. एक शिकायत दूर हुई उस दिन, मुझे घर में ही दोस्त मिल गया.

इतना ही कहूँगा तुम बाहर दोस्त ढूढ़ रहे हो , और तुम्हारा अहित सोचने बाले (ऐसा तुम सोचते हो ) तुम्हारे सच्चे मित्र घर में बैठे हुए हैं और तुम्हारी फ्रेंड रिक्वेस्ट का इंतज़ार कर रहे हैं. भेज कर के तो देखें , एक्सेप्ट न हो तो कहना !

– भास्कर सुहाने

मौलश्री का पेड़

इन्द्रधनुषी युगों पहले
पिताजी की ऊँगली थाम, नन्हे-नन्हे कदम उठाती
जाया करती थी, उस मौलश्री के तले |

चबूतरे पर झड़ते उन नन्हे फूलों को,
चुनती छोटी-छोटी उंगलियाँ,

और

उन छोटी उँगलियों के बीच से गिरते फूलों को
संभालती वे बड़ी उंगलियाँ…..
उन बड़ी उँगलियों का स्पर्श, वह सुरक्षा की भावना

और

उनके स्नेहिल व्यक्तित्व की छतरी की छाया तले
सुरक्षित-निर्भीक और संतुष्टित मै….

आज, गयीं थी उसी मौलश्री के नीचे
छोटे-छोटे कदम उठाती स्वतः
जैसे किसी चुम्बकीय शक्ति से प्रेरित …..
अतीत के झरोंखे से हठात, बह आई
मौलश्री के फूलों से सुगन्धित हवा…..

ले गयी मुझे उन बीते युगों में –
वह स्कूल का जाना, पिता का हाथ थाम
वह लौट कर माँ से जिद कर कच्ची कैरियां खाना –
माता-पिता की स्निग्ध छाया में
मौलश्री तले कूदते-फांदते समय का,
हवा के झोंके सा उड़ते चले जाना

और

फिर एक दिन,
उन्ही हथेलियों द्वारा
दान कर दिया जाना किसी अजनबी को,
मानों किसी अदृश्य शक्ति का संकेत
और एक फूल का उसकी डाली से टूट कर विलग हो जाना…
पर फिर भी, बेटी ही तो रही मै उनकी |

आज,
वह स्निग्ध छाया नहीं,
मेरी जिद को सहने वाली काया नहीं,
न ही,
मुझे सुरक्षा-भाव देती, हाथ थमने वाली वो उंगलियाँ..
दूर-दूर तक कोई छतरी नहीं, रेगिस्तानी धूप में
कन्यादान करने वाले तो पिंड-दान करवाते चलते बने

पर,

पीछे रह गयी मै, आज यूँ खड़ी मौलश्री के छाया तले
गुनती हुई उन दिनों को……..
यह मौलश्री का पेड़,
देता है गवाही अपने सूखे हुए फूलों से
जिनके सूखने के बाद भी, हवा होती है सुगन्धित
फैलाती याद उन बीते हुए दिनों की
जिन्हें पीछे छोड़ आई मै, वक़्त की ऊँगली थाम
छटपटाती उस माया-मृग-मरीचिका में,
ढूँढती उन उँगलियों को,
जब आज भी मेरी उँगलियों के बीच से समय का फूल सरकता जाता है
कि नन्हे हाथों को सँभालने को
अब और कोई नहीं…………

– सुनीता पाण्डेय

पिता

पिता
पिछले कईं बरसों से काट रहें हैं
मृत्यु की प्रतीक्षा की लंबी घड़़ियों को
अख़बार की सुर्खियों में
घर के बेज़ान कोने में बैठकर
धुएँ के छल्लों के बीच
अपनी अनुपयोगिता सिद्ध करते पिता
कभी बहुत उपयोगी थे
तब हम साँझ ढलते ही
लटक जाते थे छज्जे पर
दूर से आते पिता
हमारी असीम संभावनाओं के केन्द्र बिंदु
जहाँ से खुलते थे
हमारे भविष्य के कपाट
उदासीनता के धुँधलके में
सूखे विराट वृक्ष से पिता
अपनी उम्र की अंतिम
डाल पर बैठकर
एक-एक पत्ते को गिराकर
विदा लेने को आतुर
अशक्त होकर भी सशक्त से

– ऋतु त्यागी

“काबुलीवाला” की मिनी

सभी भाई बहनों मे सबसे बड़ी मैं अपने बाबूजी की सबसे ज़्यादा लाडली. उनकी “काबुलीवाला” की मिनी… हाँ यही नाम दिया था उन्होंने.

हर जगह बाज़ार, पिक्चर, सब्ज़ी लेने, कहीं भी मैं हमेशा उनके साथ. अनुशासन प्रिय बाबूजी से कितनी ही बातें सीखीं, जो अब मेरे जीवन के आदर्श हैं, नियम हैं.

अनुशासन मे कोई समझौता नहीं… मुझे याद है एक बार पलँग की चादर मुझसे चार बार बिछवाई थी… चारों तरफ से बराबर और एक भी सल नहीं… गणित उनका प्रिय विषय था हम भाई बहनों को गणित वही पढाते थे. मजाल है पूरी प्रश्ननावली छुड़ाए बिना कोई उठ जाए.

बार बार आँखें नम हो रही हैं… आज भी जब परेशान होती हूं, तो सपने मे आकर उसका हल बता जाते हैं मेरे बाबूजी.

तुम बहुत ही जल्द चले गए… कुछ और दिन रहते… मेरे बच्चों को बड़ा होता देखते… ईश्वर की मर्ज़ी…

एक था बचपन… बचपन के एक बाबूजी थे… अच्छे सच्चे बाबूजी थे… दोनों का सुंदर था बँधन…

– मीना रेगे

जो लड़कियाँ अपने बाबू जी की कुछ ज़्यादा ही चहेतियाँ होती हैं
और जिनके बाबूजी उनके सब कुछ होते हैं
फ़्रेंड, फ़िलॉसफ़र, गाईड
उनकी तलाश बहुत लंबी हो जाती है
और अक्सर अधूरी रह जाती है

मेरे बाबूजी पढ़ाते मुझे टैगोर की काबुलीवाला
मिनी की शादी का जब आता दृश्य
उसके हाथों पे मेहंदी, लाल जोड़े में वो चलती हुई
काबुलीवाले को याद आती अपनी लड़की
जो अब हो गई होगी मिनी जितनी लंबी ऊँची
तो मैं उठ कर बाबूजी की कुर्सी के पीछे चले जाती
उधर काबुलीवाला रोता

इधर मैं
बाबूजी सीली आँखों से पढ़ते रहते कहानी
उन्हें घर में बैठे पता चल जाता
मैं कैसा महसूस कर रही हूँ होस्टल में
सारे घर में यह बात मशहूर थी
जब बाबू जी टूर पे जाते थे
तो छोटी बेबी को बुखार चढ़ आता था
गले से लगाते तो उतर जाता

मेरा एक ख़त तो वो भागे चले आते होस्टल
यह चूड़ियाँ, माला, अँगूठियाँ के शौक़ उन्होंने लगाए मुझे
कहीं भी जाते वहाँ का जो ख़ासम-ख़ास होता ले कर आते
पटियाला की पंजाबी जुत्तियाँ, रंग बिरंगी परांदियां
मलेरकोटला का हाथीदाँत चूड़ा, रेशमी काली सलवारें

मेरे लिखे ख़त ग़लतियों पे ले कर लाल गोले मुझ तक लौट कर आते
ट्रेन में बैठते, बस में सफ़र करते
रास्ते में आती-जाती चीज़ों से सबक़ सिखाते रहते
इसे माइल-स्टोन कहते हैं
ट्रैवल लाइट का क्या मतलब है
जो कभी नहीं भूले
स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, सब जगह था उनका आना-जाना
मेरे सब दोस्तों, अध्यापकों, सहयोगियों से दोस्ताना था उनका

मुझे कभी कोई पसंद ही नहीं आया
कैसे आता
इतने गुण किस में मिलते
मुझे प्यार भी करता, निगहबानी भी करता, राह भी दिखाता
साथ-साथ चलता, गिरती तो थाम लेता
मेरे प्रश्न
उसके उत्तर
सर उठा कर देख सकती जिसे
आँखें अदब से झुक जाती

फिर तुम मिले एक ख़्वाब के जैसे
मेरे सब प्रश्नों के उत्तर थे तुम्हारे पास
प्यार भी था बेपनाह
पर मैं डरती थी
तिलिस्म दूर से ही अच्छे लगते हैं
जिसे भी पास आने दिया
उसने कुछ न कुछ छीनना ही चाहा
किसी ने चैन, सकूँ, किसी ने देह, किसी ने रूह
किसी ने पैरों के तले की ज़मीन
किसी ने सर के ऊपर का आसमान
किसी ने मेरे आस पास की हवाओं में ज़हर मिश्रित कर दिया

और अब मैं डॉक्टर Faustus की तरह इंतज़ार में हूँ
कब बारह का घंटा बजे
कब रुख़स्ती हो
नहीं, मैंने अपनी आत्मा गिरवी नहीं रखी है किसी शैतान को
मैंने एक सुखद मृत्यु का स्वप्न देखा है

– राजेश जोशी

एक था बचपन, बचपन के एक बाबूजी थे

बचपन के एक बाबूजी थे,
बहुत याद आते हैं…
बचपन के एक बाबूजी थे,
जब जाते कहीं बाहर,
तो हमें बुखार चढ़ आता था,
आ के लगाते जो सीने से तो,
रफ्फु चक्कर हो जाता था;

छुप छुप के आंसू बहाते थे,
जब बजता कोई ऐसा नगमा,
‘महलों का राजा मिला
रानी बेटी राज करेगी, ‘
बचपन के एक बाबूजी थे;

लंच कर के मिस अपना,
हमारे लिए,
हॉस्टल में जूस ले के आते थे,
कुछ भी करते थे, कैसे भी करते थे,
हमारे सपनों की तामीर किया करते थे,
और कुछ सुन्दर खवाब दिखाते थे,
जब भी मिलते इनाम हमें,
उनके चहरे पे हजारों गुलाब,
खिल जाया करते थे,
बचपन के एक बाबूजी थे;

जब जाते कभी टूर पे,
हम राह तकते रहते थे,
बाबूजी आएँगे,
ढेर सारे तोहफे लायेंगे,
चुन चुन के लाते चीज़ें वो भी,
खजाने हमारे भरते रहते थे;

सब याद है हमें,
ज़रा ज़रा,
बाबूजी के वो सुरीले गीत,
होली के रंग, लोहरी के संग,
और फिर कभी कभी गुनगुनाना उनका,
‘जदों मेरी अर्थी उठा के चलेंगे,’
मां का फिर गुस्सा होना,
ऐसे ही हमारे बाबूजी थे,
दोस्त भी, हमराज़ भी, हमदर्द भी,
फिलोसोफर भी और गाइड भी;

अब न आयेंगे बाबूजी,
जितना मर्ज़ी हम कह दे,
‘गुड़िया चाहे न लाना,
पप्पा जल्दी आ जाना ‘
जाते जाते पूछा हमसे,
क्या दर्द है,
क्या छुपा रही हो,
कोई कुछ बताता ही नहीं मुझे ,
कैसे बताते ,
कैसे दर्द देते उन्हें,
वो तो हमारे बाबूजी थे,
हमारे हाथ में ही था उनका हाथ,
जब साथ छूट गया,
सब रोए,
हमारे आंसू न जाने कहाँ गए,
अब,
जब तब, यहाँ वहां, बहते रहते हैं,
बहुत याद आते हैं,
बाबूजी…..

– राजेश जोशी

पिता

लोरि‍यों में कभी नहीं होते पि‍ता
पि‍ता होते हैं
आधी रात को नींद में डूबे बच्‍चों के
सर पर मीठी थपकि‍यों में

कौर-कौर भोजन में
नहीं होता पि‍‍‍‍ता के हाथों का स्‍वाद
पि‍ता जुटे होते हैं
थाली के व्‍यंजनों की जुगाड़ में

पि‍ता कि‍स्‍से नहीं सुनाते
मगर ताड़ लेते हैं
कि‍स ओर चल पड़े हमारे कदम
रोक देते हैं रास्‍ता चट्टान की तरह

पि‍ता होते हैं मेघ गर्जन जैसे
लगते हैं तानाशाह
दरअसल होते हैं वटवृक्ष
बाजुओं में समेटे पूरा परि‍वार

जीवन में आने वाली कठि‍नाइयों को
साफ करते हैं पि‍ता
सारी नादानि‍यों को माफ़ करते
आसमान बन जाते हैं पि‍ता

जीवन भर छद्म आवरण ओढे़
नारि‍यल से कठोर होते हैं पि‍ता
एक बूंद आंसू भी
कभी नहीं देख पाता कोई

मगर बेटी की वि‍दाई के वक्‍त
उसे बाहों में भर
कतरा-कतरा पि‍‍‍‍घल जाते हैं पि‍ता
फूट-फूट कर रोते हुए
आंखों से समंदर बहा देते हैं पि‍‍‍‍ता

– रश्मि शर्मा

 

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