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फेसबुक अड्डा : ‘आभा-सी’ दुनिया में मेरा पता

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फेसबुक के राजमार्ग से एक छोटी सी पगडंडी मेरे घर की तरफ मुड़ती है, थोड़ी सी पथरीली है. जूते पहनकर आएँगे तो थोड़ी सुविधा रहेगी, लेकिन मेरे घर में प्रवेश से पहले जूते उतारने होंगे.

बस ध्यान रखियेगा अपने जूते में पाँव फंसे रहते हैं तो हम सामने वाले के जूते में पैर डालकर उसकी स्थिति का अनुमान लगाने से चूक जाते हैं… इसलिए यदि आप जूते पहनकर नहीं आते हों, तो आपको अंदाज़ा लग पाएगा किस पथरीली राह से गुज़रकर मैंने यहाँ अपना छोटा-सा आशियाना बनाने की जगह चुनी है…

मेरे घर की दीवारों पर आपको मेरी ही तस्वीरें लगी दिखेंगी, जहाँ तहां मैंने कुछ अज़ीज़ों को टैग किया होगा, किसी से कुछ बातें शेयर की होगी, तो किसी से कमेन्ट में संवाद…

मेरे घर के बाहर से जीवन इतना आकर्षक लगेगा कि आपको उसके छोटे से झरोखे नुमा इनबॉक्स से झांकने का मन अवश्य करेगा…

सिर्फ झाँकने वालों के लिए झरोखे बंद ही रहते हैं अमूमन, लेकिन जो जीवन से साँसों के रिश्ते से जुड़ जाते हैं, उनके लिए दरवाज़े बेसाख्ता खुल जाते हैं… और वो मेरे घर में बिना दस्तक के भी प्रवेश कर पाते हैं…

मेरे घर के अन्दर आपको बड़े बड़े आईने मिलेंगे जहाँ आपको अपनी ही तस्वीर दिखाई देगी… बस यही कहना था… मुझ तक आए हैं, तो खुद को पाने के लिए ही.. लेकिन अपने व्यक्तित्व से ठीक विपरीत खुद को पाकर कई लोग लौट भी जाते हैं…

वैसे मेरा अपना कोई वजूद नहीं… मैं पंचतत्व से बनी माटी का पुतला भर हूँ… कहीं सुना था…. कि मिट्टी भी हंसती है…

और मिट्टी अपने हंसने के मौसम में सबसे अधिक उर्वरा होती है… फल देती है, फूल देती है…

और ये मिट्टी कभी सूखती नहीं… रोने के मौसम में भी आँखों से नदियाँ फूटती है… ये सदा उर्वरा रहेगी मौसम चाहे जो आये….

बस सबका लौटने का समय तय होता है… लेकिन जाने से पहले अपने जूते पहनना मत भूलियेगा… वर्ना लोग कहेंगे जंगल होकर क्या आए तुम भी जंगली हो गए… सभ्य समाज मनुष्य सा बर्ताव मांगती है… और मैं… जानते तो हो… मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की…

मैं तुम्हारे सच से अधिक काल्पनिक हूँ और कल्पना से परे की वास्तविकता… कहाँ कहाँ खोजोगे.. मैं हो कर भी कहीं नहीं, और कहीं न होकर भी सर्वव्यापी…

फिर भी मैं केवल अपने ही घर में कैद रहने वाली कूप मंडूक नहीं, मैं अक्सर लोगों के घर तक जाती हूँ… दरवाज़ा खटखटाती हूँ… कई बार मेरे लिए ही जैसे खुला रख छोड़ा हो ऐसे मिलता है..

कोई बड़े प्यार से निकल कर आता है… अपना प्रेम मेरे आँचल में डाल जाता है… कोई मुंह पर दरवाज़ा बंद भी कर देता है… मैं उसे भी दुआ देते हुए आगे बढ़ जाती हूँ…

इसे मेरी आत्म मुग्धता कह कर मुझे सीधे-सीधे ख़ारिज करने के लिए आप सदैव स्वतन्त्र हैं… क्योंकि कई बार मैंने भी दरवाज़े बंद किये हैं तूफानों के मौसम में… लेकिन तूफान अक्सर आपके अभिमान की परीक्षा लेने आते हैं… और मैं हर बार असफल हो जाती हूँ….

फिर भी कुछ घरों की दीवारें मुझे भी बहुत आकर्षित करती हैं… उनकी दीवारों पर टंगी तस्वीरों से लेकर उनपर लिखीं इबारतें मन मोह लेती हैं… ऐसी ही एक दीवार है शोभना गुप्ता की जहाँ मैं अक्सर जाती हूँ और कुछ पंक्तियाँ उठा लाती हूँ…

मेरे घर से गुज़रकर भी कई नए रास्ते निकलते हैं… आइये वहां की सैर करवाती हूँ…

आप भी देखिये उनकी दीवार की सुन्दर सजावट…

1
सच ये रस्म
यकायक सेंध लगा कर
वजूद ही नेस्तनाबूद कर देती है
और हम उसके वश में हो जाते हैं !!!


2
इस प्रणय जीवन समर में
तुममें रोज एक
आस
रोपती हूँ !!!

3
लागी
तुमसे मन की लगन…

4
मन देखता है राह
वक्त की लकीरें तुम लांघ आओ
आचमन करो और चले आओ
क्योकि अब जो प्रार्थना की प्रतिलिपि है
वो तुम्हारे हस्ताक्षर के बिना बांची नहीं जायेगी,,,,,, !!!
(art by Mrinal Dutt)

5
संवाद की हथेलियाँ
शताब्दियों से
तुमसे ताल मिलाती है ,,,,, !!!
(art by Mrinal Dutt)

6

देह की हथेलियां तो भींच ली तुमने
रूह के कारावास में उम्र बिताओ तो मानूं !!!

7
इश्क में
दागदार है हम भी
ढूंढी है मुस्कुराने की वजह तुमसे ______!!!

8

तुम्हारे आलिंगन की चाह में
मैं खुद को बिसार दूँगी !!!

9
प्रीत की अनदेखी कड़ी
बांध रही है तुम्हारा मन मेरा मन
जैसे कोई सशक्त हस्ताक्षर पिछले जन्म का उभर रहा
शायद लिख रखे हो मेरे हिस्से में आसमां
सारी नज्मों को तस्लीम कर मुहरबंद
करवाने आऊँगी
तुम्हारे पास ________________________!!!

10

ज़रा बेताब होकर पास आना
तुम्हारे आने की बेचैनी सुकूँ देती है,
ये अब्र ये बसंत ये भीगे मन की बूंदे
ये मौसम बरसो पुराने हैं
बरसेंगे यहीं आकर
मेरा घर जाने है ____________________!!!

– माँ जीवन शैफाली

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