लोहा सिंह : जब लेखक खुद प्रसिद्ध हो गए नाटक के चरित्र के नाम से

अभी कुछ महीनों पहले हिंदी व भोजपुरी के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री भगवती प्रसाद द्विवेदी से बात हुई थी . चर्चा हो रही थी पुरबी के बेताज बादशाह महेंदर मिसिर पर लिखी एक पुस्तक की भाषा पर.

द्विवेदी जी ने कहा कि उस किताब की भाषा भोजपुरी मिश्रित हिंदी है जैसी भाषा लोहा सिंह नाटक की थी. लोहा सिंह नाटक का नाम सुनकर मैं अपने बचपन व किशोरावस्था में चला गया, जब आकाशवाणी पटना द्वारा प्रसारित नाटक लोहा सिंह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूम मचाए था.

इस नाटक का मंचन आकाशवाणी के अतिरिक्त स्कूलों व कॉलेजों में भी होता था. लोहा सिंह नाटक के प्रमुख पात्र हवालदार लोहा सिंह, खदेरन का मदर, फाटक (पाठक बाबा) , नौकरानी भगजोगनी व लोहा सिंह के साले साहब बुलाकी आज भी मुझे जुबानी याद हैं.

लोहा सिंह नाटक की बात हो और उसके रचयिता रामेश्वर सिंह कश्यप की बात न हो तो काफी नाइंसाफी होगी. श्री रामेश्वर सिंह कश्यप का जन्म बिहार में रोहतास जिले के सेमरा गाँव में हुआ था. उनकी शिक्षा दीक्षा बिहार के विभिन्न शहरों में हुई. सन् 1958 में उनकी नियुक्ति B N College पटना में व्याख्याता के पद पर हुई. 1968 – 1989 तक ये शान्ति प्रसाद कॉलेज, आरा में प्राचार्य पद पर नियुक्त रहे.

आकाशवाणी पटना से उनके लिखे नाटक “लोहा सिंह” का प्रसारण तब हुआ था जब 1962 में चाइना वार छिड़ गया था. रामेश्वर सिंह कश्यप ने उस समय नाटक में चाइना के विरुद्ध बहुत कुछ कहा था, जिससे चाइना तिलमिला गया. रेडियो पेइचिंग से कई बार प्रसारण कर कहा गया –

” नेहरू ने आकाशवाणी पटना में एक भैंसा पाल रखा है, जो चीन की दीवार पर सिंग मार रहा है.”

जब आकाशवाणी पटना से लोहा सिंह नाटक का प्रसारण होता था तो सड़कें, गलियाँ सूनी हो जाती थीं. जिनके पास रेडियो होता था उनके घरों में लोगों का जमवाड़ा हो जाता था. विदेशों में भी इस नाटक की बहुत माँग थी. लन्दन काउन्टी काउंसिल, नेपाल , जोहांसवर्ग व मॉरिशियस सरकारों के अनुरोध पर नाटक लोहा सिंह के कैसेट भेजे जाते रहे हैं . Rural broadcaster नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने इसकी लोक प्रियता से प्रभावित होकर इस नाटक पर एक लेख लिखा था – About loha singh. लोगों ने इस नाटक के रचयिता रामेश्वरसिंह कश्यप को ही लोहा सिंह कहना शुरू कर दिया था.

श्री रामेश्वर सिंह कश्यप सन् 1989 में सेवा निबृत हो भोजपुरी अकादमी के 1990 – 92 में चेयर पर्सन रहे. उन्हें सन् 1991 में पद्मश्री, बिहार रत्न व बिहार गौरव से सम्मानित किया गया था. उन्होंने लोहा सिंह नाटक के अतिरिक्त “तसलवा तोर की मोर” नाटक लिखा था. और भी इनकी किताबें छपी थीं, जिनका मुझे ज्ञान नहीं है. इनकी बहुत सी रचनाएँ अप्रकाशित रहीं, जिसका दर्द उनके ही शब्दों में –

“मेरी बहुत सी रचनाएँ खो गईं. काफी संख्या में अप्रकाशित रचनाएँ हैं. मुझे किताब छपाने की कला नहीं आई.”

मेरे विचार से उनके हास्य नाटक लोहा सिंह के कारण उनकी अन्य गम्भीर रचनाएँ दब गयीं और इसीलिए कोई भी प्रकाशक उन्हें प्रकाशित करने का जोखिम नहीं उठा सका. लोहा सिंह पर फ़िल्म भी बनी थी, पर खराब निर्देशन के कारण फ़िल्म नहीं चली. उनकी किसी अन्य रचना पर प्रकाश झा फ़िल्म बनाना चाहते थे, पर इसी बीच 24 अक्टूबर सन् 1992 को उनकी मृत्यु हो गई. उनके दो बेटे हैं. किसी को उनकी रचनाओं से कोई सरोकार नहीं है.

– Er S D Ojha

मर्द तांगेवाला

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