संतानवती की ओर से माँ शीतला को धन्यवाद

यह तस्वीर देखकर किसी के मन में ‘आस्था’ जागेगी, किसी के मन में ‘अन्धविश्वास’… लेकिन इसे देखकर मेरे हृदय के अश्रु कुण्ड में एक बड़ी सी लहर जागी और भरे कंठ के साथ मेरी चेतना भी जैसे माँ के चरणों में ऐसे साक्षात दंडवत हो गयी…

तब तक ना मैंने इस तस्वीर के पीछे के इतिहास का अध्ययन किया था ना मैं इसका कारण जानती थी… फिर ऐसी कई तस्वीरें एक एक करके देखती गयी … माँएं पीठ पर बच्चे को लिए माँ शीतला के चरणों में धन्यवाद भाव से पूरी तरह झुक गयी हैं…

और साथ में जैसे मुझे भी सिखा गयी हैं झुकना, उस जगतजननी के आगे, जिसके सामने हमारा संतान होना ही पर्याप्त है… आप एक बार संतान हो जाते हैं, तो माँ की ममता चारों ओर से स्वत: ही आप पर बरस पड़ती है…

ऐसा जादू अक्सर मेरे साथ घटित होता रहता है… कि खोजने कुछ और निकलती हूँ और मिल कुछ और ही जाता है. तब समझ आती है प्रकृति की योजना, कि खोजने के तुम्हारे चुनाव से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, मिलना तुम्हें वही है जिसकी तुमने पात्रता कमाई है…

तो इस तस्वीर का मिलना भी मेरे लिए वही जादुई संयोग था जिसके लिए जैसे कविता पिछले महीने मैंने यूं ही लिख दी थी, और फिर यूं ही तो कुछ भी नहीं होता…

ताज़ा शब्द भी उस तक आते आते
इतना बासी हो जाता है
जैसे ज्वालामुखी से फूटा लावा
उसके चरणों तक पहुँचने तक
बन जाता है
ठोस और ठंडा लोहा…

उसके नीम से कड़वे व्यवहार का लेप
ठीक कर देता है आत्मा तक पर पड़े
चेचक के दाग
हाथ में तीखे शब्दों की बुहारी लिए
वो साफ़ कर देती है दिमाग़ का कचरा

अपने ही विचारों के गर्दभ पर सवार
ज्वरासुर, ओलै चंडी बीबी, एवं रक्तवती
को साथ लिए वो देर रात तक जागती है
“जीवन” के रोगी की प्रतीक्षा में

जिनके रोग हरते हुए भी
वो कभी बीमार नहीं होती

क्योंकि प्रेम की अग्नि पर
देवत्व का छिट्टा देकर
उसे इतना ठंडा और पवित्र कर दिया गया है
कि अब वो शीतला देवी के रूप में
पूजी जाती है
जिस पर भोग भी चढ़ता है
तो बासी प्रसाद का…

क्या धन्यवाद और कृतज्ञता के लिए कारण होना आवश्यक है… ये तो एक भाव है जो अंतरतम से उठता है और बाह्यतम में प्रकट होता हुआ अपनी ऊर्जा को विस्तारित करता है, और पहुंचता है मुझ जैसे लोगों तक जिन्होंने खुद को इतना अधिक शीतल कर लिया है कि खुद को भी वो शीतला माता के समक्ष प्रसाद रूप में प्रस्तुत करने को तैयार है…

तो इसे आप परंपरा कहकर अंधविश्वास भी कह सकते हैं कि मांएं कोलकाता के कालीघाट के काली मंदिर में भरी गर्मी में सड़क पर साष्टांग दंडवत करती हुई माँ के मंदिर प्रांगण में प्रवेश करती हैं…

मैं न जाने इतना सौभाग्य प्राप्त कर सकूंगी या नहीं लेकिन कालीघाट की काली माई ने पिछले कुछ महीने पहले मुझे इसी तरह से स्वप्न में वहां पहुंचा दिया था जिस स्वप्न गाथा का विस्तृत विवरण मैंने लिखा था…

इस समय में अहोभाव में हूँ… घटनाएँ जो टुकड़ों टुकड़ों में घटित हुई आज जैसे किसी पहेली की तरह सारे टुकड़े जुड़कर एक पूरा सन्देश बन रहा है…

इस तस्वीर में महिला की परछाई में उसके केश से जो प्रतिबिम्ब बन रहा है ऐसा लग रहा है जैसे दो सर्प उसे आशीर्वाद देने आये हैं. और पूरी तस्वीर में से महिला को हटा दिया जाये और सिर्फ परछाई रह जाए, तो  बिलकुल माँ काली की तस्वीर सा प्रतीत होगा…

इसे आप सिर्फ मेरी कल्पना और तस्वीर देखने का नज़रिया कहकर मेरे विचारों को खारिज करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन मैं तो जैसे बंध गयी इस तस्वीर के साथ… यदि कल्पना में ही सही माँ मुझे ऐसे मिल जाती है तो मैं खुद को धन्य समझूँगी… और कौन जाने माँ मुझसे सच में ऐसे ही जुड़ी हैं, तभी तो हर जगह मुझे उसका ही रूप नज़र आता है…

हमारे यहाँ शीतला सप्तमी को शीतला माता पूजी जाती है, माँ को भोग का प्रसाद भी एक दिन पहले बने बासी भोजन का लगता है और दिन भर अष्टमी को यही भोजन खाया जाता है.

ब्रह्म मुहूर्त में जब सूर्य देवता भी प्रकट न हुए हो महिलाएं ठन्डे पानी से नहाकर शीतला मंदिर में माँ की पूजा करती हैं.

हालांकि यह तस्वीर डोंडी की है, महिलाएं शीतला माता को अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करने जाती हैं, कोलकाता के कालीघाट की काली माई को. पूरे रास्ते उन्हें दंडवत होकर जाना होता है वो भी अप्रेल की तपती सड़क पर. ऐसे में बाकी लोग सड़क को पूरी तरह से भिगोकर ठंडा करते जाते हैं.

ये कुछ ऐसा ही है जैसे आप किसी और की प्रार्थना के लिए अपने भी हाथ बढ़ा रहे हो. कहते हैं ना व्यक्तिगत प्रार्थना जब सामूहिक प्रार्थना में बदल जाती है तो वो अवश्य पूरी होती है.

और फिर इस पूजा का समापन होता है अग्नि पूजा से… ये विरोधाभास सिर्फ हमारे यहाँ ही मिलेगा कि शीतलता के लिए पूजी जाने वाली माँ के पूजा का समापन हम अग्नि पूजा से कर रहे हैं. क्योंकि ये अग्नि ही शीतलता की वास्तविक परिभाषा सिखाती है. जो इस अग्नि परीक्षा से गुज़रा हो उसे ही शीतला माता का वास्तविक अर्थ समझ आएगा. और समझ आएगा कि क्यों क्रोध की देवी काली माई को शीतलता के लिए भी पूजा जाता है.

 

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *