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यदि आपको चश्मिश कहलाना पसंद नहीं, तो पेश है कॉन्टेक्ट लेंस की पूरी जानकारी

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कॉन्टेक्ट लेंस सिलिकॉन या इसके और ज्यादा अपग्रेड प्रोडक्ट से बने ऐसे सॉफ्ट लेंस होते हैं जो हमारी आंख के कॉर्निया(पुतली) पर लगाये जाते हैं.

ये हमारी आंख और लेंस के बीच मौजूद आसुओं की परत पर तिरते से रहते हैं, कोई चिपकाने का पदार्थ नहीं होता है, और वहीं टिकते इसलिए हैं क्योंकि पूरी आंख और कॉर्निया का बेस कर्व (आंख के सफेद हिस्से की तुलना में कॉर्निया का उभार) अलग अलग होता है और लेंस कॉर्निया के एवरेज कर्व के हिसाब से बनाये जाते हैं.

आजकल सॉफ्ट लेन्सेस 2 तरह के होते हैं

1- Daily Wear या Yearly Lanses

2- Disposable लेन्सेस (डेली (1-3दिन की लाइफ), फोर्टनाइटली (15 दिन की लाइफ),

3- मंथली (1 महीने की लाइफ) और क्वॉर्टली( 3 महीने की लाइफ)

भारत मे डेली डिस्पोजेबल और मंथली डिस्पोजेबल ही चलते हैं.

1- इयरली या डेली वेयर लेन्सेस

ये लेन्सेस उन लोगों को ही लेने चाहिए जिनका लेंस का लगाने का ड्यूरेशन रोज 6-7 घण्टे से ज्यादा नहीं है. रोज़ 6-7 घण्टे लगाने पर ये एवरेज 1 साल चल जाएंगे (लेंस की लाइफ उस पर लिखी एक्सपायरी डेट या लगाना शुरू करने की डेट से मत गिनिए, जब तक लेंस को आप कम से कम 6 घण्टे बिना किसी खराश, आंखे लाल या जलन के लगा सकते हैं वो सही है.

चाहे ऐसा 6 महीने बाद हो या 2 साल बाद, दिक्कत करने पर ही उसको बदलने की ज़रूरत है. हरेक की आंख अलग अलग है और हरेक की आंख में सेम लेंस की लाइफ अलग)
ऐसे लेंस की एवरेज लाइफ 1800 – 2000 लगाने के घण्टे होती है.

या

वो लोग जिनको लेंस सिर्फ ओकेजनल (साल भर में 30-40 बार) लगाने हैं वो भी ये लेंस ले सकते हैं, क्योंकि इन लेंसों का मेटेरियल टाइम बाउंड नहीं है इसलिए रखे रखे खराब नहीं होते हैं.

बस लगातार इस्तेमाल न करने पर हर 15 दिन में इनका सॉल्यूशन बदल देना चाहिए……

2- डिस्पोज़ेबल कॉन्टेक्ट लेन्सेस

मंथली डिस्पोज़ेबल

ये लेंस उन लोगों के लिए बेहतर हैं जिनको रोज 10-15 घण्टे लेंस लगातार लगाने होते हैं, बड़े शहरों की लाइफ स्टाइल ऐसी ही है जहां लोग 8 बजे तैयार हो निकलते हैं और रात 10 बजे वापस आते हैं.

ये लेंस चूंकि वाटर कंटेट ज्यादा होल्ड कर पाते हैं इसलिए लगाने में सॉफ्ट ज्यादा होते हैं.

इनकी लाइफ आपकी आंखों से निकलने वाले प्रोटीन की मात्रा पर निर्भर करती है. हर लेंस में बहुत छोटे छोटे छिद्र (pours) होते हैं, जिससे वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन आंखों तक पहुंचती है. प्रोटीन लगातार इन छिद्र को भरता रहता है, जो लेंस निकाल कर नए सॉल्यूशन में डालकर रखने से फिर से साफ होते रहते हैं.

इनका सबसे बड़ा फायदा है हाइजीन, चूंकि आपको लेंस लगभग हर महीने बदलने होते हैं इसलिए इंफेक्शन का खतरा कम होता है और पहनने में आरामदायक भी ज़्यादा होते हैं. प्रति पेयर लेंस की कीमत कम होने से कभी एक लेंस खो जाने /खराब होने पर रिप्लेसमेंट सस्ता होता है.

मजे की बात है कि भारत भर में जो लेंस ज्यादातर मंथली डिस्पोजेबल के रूप में मिलते हैं, वो सेम लेंस यूरोप और अमरीका में फोर्थ नाइटली मतलब 15 दिन पहनने लायक लेंस के रूप में बेचे जाते हैं, जबकि वहां के वातावरण और कम प्रदूषण की वजह से जो लेंस यहां 1 महीने में खराब होगा वो वहां आसानी से 3 महीने चल सकता है.

डेली /रोजाना डिस्पोज़ेबल लेंस

ये लेंस 30 लेंस पेकिंग में आते हैं और इनकी 1 दिन की लाइफ होती है (वैसे 3 दिन तक चल जाते हैं), प्रति पेयर कीमत कम होने के बावजूद साल भर का इनका खर्च बहुत ज़्यादा होता है, पर जो लोग अफोर्ड कर सकें, उनके लिए बेहतरीन हैं.

इसका ज़्यादा इस्तेमाल बहुत कम बार लेंस लगाने वालों के लिए भी उपयुक्त है, क्योंकि हर बार जब आपको लेंस लगाने हों (साल भर में 30-40 बार) तब आपको नया पेयर लगाना होता है और परफेक्ट विज़न से साथ हाइजीन उपलब्ध है, और इस तरह ये डेली वियर लेंस की ही कीमत(एवरेज साल भर का खर्च के लगभग बराबर) में ज्यादा बेहतर रिज़ल्ट देता है.

– संदीप बसलस
(एबीसी ऑप्टिकल्स आगरा)

 

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