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Cinderella : सिर्फ़ प्रेम कहानी नहीं, एक प्रेरक कहानी

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“सिंड्रेला” फ़िल्म (2015) मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है. हालांकि इस फ़िल्म या सिंड्रेला की कहानी से जुड़ी चली आ रही आम धारणा “सिंड्रेला” के वास्तविक कथानक, अर्थ और भाव को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाती.

आमतौर पर “सिंड्रेला” की कहानी को महज एक आम लड़की और उसके सपनों के राजकुमार के वास्तविक मिलन की किसी परिकथा के रूप में देखा जाता है. जैसे एक लड़की के जीवन का अंतिम लक्ष्य किसी प्रिंस चार्मिंग का मिलना ही हो!

जबकि वास्तव में सिंड्रेला की वास्तविक कहानी इस छोटी सी परिकथा या प्रेम कथा से कहीं व्यापक है. मुझे लगता है कि सिंड्रेला कहानी है खुद को पहचाने की, खुद पर भरोसा रखने की, और अपने व्यक्तित्व की विशेषताओं को बरकरार रखने की, तब भी जब परिस्थितियां आपके बिल्कुल विपरीत हो.

सिंड्रेला की सौतेली माँ और बहने जो सिंड्रेला से बेइंतहा नफरत करती हैं, उनके माध्यम से कहानी उन लोगों की ओर इशारा करती है जो किसी व्यक्ति की क्षमताओं, योग्यताओं और गुणों को देखकर इतना असुरक्षित महसूस करता है कि वो उसका विरोध करने लगता है.

और इस विरोध को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट न कर उस व्यक्ति के प्रति बात-बात पर तिरस्कार, दुत्कार, उपेक्षा प्रकट करता है, उसकी छोटी-छोटी बातों में कमियां तलाशता है, उसके हर हौसले को निर्थक घोषित कर बार-बार उसका मनोबल तोड़ता है.

क्योंकि उसे लगता है कि यही एक जरिया है उस व्यक्ति को आगे बढ़ने से रोकने का. लेकिन सिंड्रेला पर अपनी सौतेली माँ और सौतेली बहनों की कड़वी बातों का असर नहीं होता और वो अपना मूल स्वभाव कभी नहीं बदलती, न तो हिम्मत हारती है और न ही कभी उसके मन में बदले की भावना आती है.

वो अपने सीमित साधनों के दम पर, अपनी ज़िंदगी पर फोकस करती है और इस क्रम में वो अपने भावी जीवन साथी से भी मिलती है, जो सिंड्रेला को उसकी इन्हीं विशेषताओं के चलते पसन्द करता है.

कहानी का एक मोड़ ऐसा आता है जब सिंड्रेला की सौतेली माँ यह जान जाती है कि राज्य का राजकुमार सिंड्रेला से शादी करना चाहता है तो वो हर सम्भव कोशिश से सिंड्रेला को रोकती है.

ऐसे में सिंड्रेला अंततः हार जाती है और अपनी सौतेली माँ से पूछती है कि “आखिर आप मुझसे इतनी नफरत क्यों करती हो? कोई तो वजह होगी कि मेरी तमाम कोशिशों के बावजूद मैं कभी आपके दिल मे जगह नहीं बना पाई?”

तब सिंड्रेला की सौतेली मां अपना सच स्वीकारती हैं और कहती है “मैं तुमसे नफरत करती हूं क्योंकि तुममें वो अच्छाइयां है जो मुझमें या मेरी बेटियों में नहीं है, (I hate you because you are young, innocent and good).

अपनी सौतेली मां की इस स्वीकारोक्ति के बाद सिंड्रेला को यह महसूस होता है कि अपनी सौतेली मां और सौतेली बहनों के ऐसे कड़वे व्यवहार के लिए वो ज़रा भी जिम्मेवार नहीं है, क्योंकि उनकी लड़ाई अपने व्यक्तित्व के विरोधाभासों से है.

सिंड्रेला अपनी सौतेली मां को माफ कर (उनके बिना माफी मांगे ही) अपने के भावी जीवन साथी के साथ चली जाती है.

कहानी का अंत ही कहानी का मुख्य सन्देश है. यह कतई ज़रूरी नहीं है कि अगर कोई आपसे नफरत करता हो तो इसमें कमी आपकी ही हो, या आपकी ही गलती हो. अक्सर कुछ लोग आपसे तब नफरत करते हैं जब वो आपके व्यक्तित्व की या स्वभाव की कोई ऐसी विशेषता देख लेते हैं जो शायद आपको भी न मालूम हो, और जो उनको अपनी स्वार्थ सिद्धि में एक बाधा लगती हो.

ऐसे लोग आपमें हर सम्भव तरीके से हीनभाव भरने की कोशिश करते हैं, क्योंकि वही हीनभाव दरअसल उनकी कुल जमा पूंजी होती है. लेकिन ऐसे लोगों से उलझ कर उन जैसा ही बन जाना आपकी हार होगी, बेहतर है उन्हें मन ही मन माफ कीजिये (भले ही उन्होंने माफी न मांगी हो) और आगे बढ़ जाइये.

उनकी लड़ाई आपसे नहीं खुद से है. इसलिए सिंड्रेला की कहानी परिकथा होते हुए भी एक प्रेरक कथा है. “Be kind and have courage” यही इस कहानी का मुख्य सन्देश है.

– सुजाता मिश्रा

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