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चरित्रहीन – 3 : तुम्हारा प्रेम बीज है, मेरा प्रेम सुवास

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पश्चिम की एक बहुत प्रसिद्ध अभिनेत्री मर्लिन मनरो ने आत्महत्या की, भरी जवानी में! और कारण? कितने प्रेमी उसे उपलब्ध थे! ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरों से लेकर अमरीका का राष्ट्रपति कैनेडी तक, सब उसके प्रेमी! तो भी वह प्रेम से वंचित थी।

प्रेमियों की भीड़ से थोड़े ही प्रेम मिल जाता है। प्रेम तो एक आत्मीयता का अनुभव है, एक अंतरंगता का अनुभव है। प्रेम तो बड़ी कोमल घटना है। मनरो के हजारों प्रेमी थे, लाखों पत्र लिखने वाले थे। और फिर भी मरी, आत्महत्या कर ली। और कारण जो दे गई आत्महत्या का, वह यह था कि मेरे जीवन में प्रेम नहीं है, मैं प्रेम नहीं पा सकी, जीकर भी क्या करूं?

इनसे तुम प्रेम सीखोगे। फिल्में तुम्हें प्रेम सिखा रही हैं। जहां प्रेम का कुछ भी नहीं है, जहां प्रेम का कोई अनुभव नहीं है। या तुम ऐसे कवियों के गीतों से प्रेम सीखते हो, जो प्रेम नहीं कर पाए और गीत गा-गा कर मन को समझा रहे हैं।

जिनके जीवन में प्रेम तो नहीं घटा, तो किसी तरह गीत गा-गा कर सांत्वना ले रहे हैं। अक्सर ऐसा होता है, मनोवैज्ञानिक इस संबंध में राजी हैं, कि जो लोग बहुत ज्यादा प्रेम के गीत गाते हैं, ऐसे कवि, अक्सर वे ही लोग हैं जिनके जीवन में प्रेम नहीं घटता। प्रेम नहीं घटता तो उसकी कमी को कैसे पूरी करें? गीत गा-गा कर पूरी कर लेते हैं।

मैं प्रेम की बात करूंगा, तो मेरे प्रेम की बात कर रहा हूं। तुम प्रेम की बात समझोगे, तो तुम्हारे प्रेम की बात समझोगे।

फिर अभी तुम्हारी उम्र भी क्या? और इस उम्र में मैं यह भी न कहूंगा कि तुम किसी युवती के प्रेम में हो तो कुछ गलती में हो। न होते तो कुछ गलती होती; क्योंकि वह अस्वाभाविक होता। यह बिलकुल स्वाभाविक है। स्वभाव का मेरे मन में अति सम्मान है। प्रकृति मेरे लिए बस परमात्मा से एक कदम नीचे है–बस एक कदम। और प्रकृति के ही ऊपर सवार होकर कोई परमात्मा तक पहुंच सकता है, और कोई उपाय नहीं है, क्योंकि प्रकृति सीढ़ी है, उसके मंदिर की सीढ़ी।

तुम कहते हो: “मैं एक युवती के प्रेम में हूं। आप प्रेम के गीत गाते हैं, तो मन को अच्छा लगता है। हालांकि मैं जानता हूं कि आप किसी और ही प्रेम के गीत गा रहे हैं। फिर भी मैं उसे अपना ही प्रेम समझ कर प्रसन्न हो लेता हूं।’

ऐसा न करो! ऐसा धोखा न दो! तुम्हारा प्रेम भी मुझे स्वीकार है। मगर तुम, जिस प्रेम की मैं बात कर रहा हूं, उसको अपने प्रेम के साथ एक मत करो। ताकि तुम्हें विकास का अवसर रहे। एक तारा रहे आकाश में जगमगाता।

तुम्हारा प्रेम मुझे अंगीकार है। तुम्हारा प्रेम सुंदर है, शुभ है। लेकिन प्रेम की अभी और भी ऊंचाइयां हैं, और भी मंजिलें हैं; प्रेम के अभी और भी निखार हैं। मेरे प्रेम को और तुम्हारे प्रेम को अगर तुमने एक ही कर लिया, तो तुम्हारे जीवन में लक्ष्य खो जाएगा। फिर गति न हो सकेगी, विकास न हो सकेगा।

मैं तो तुम्हारे प्रेम को स्वीकार करता हूं–पहली सीढ़ी। मगर अभी मंदिर की बहुत सीढ़ियां हैं। और फिर मंदिर है, और मंदिर में विराजमान प्रेमरूपी परमात्मा है। वहां तक चलना है। तो वैसा धोखा अपने को मत देना। सांत्वना मत देना।

आदमी अपने को धोखा देने में बहुत होशियार है। आदमी दूसरों को धोखा देने की बजाय अपने को धोखा देने में ज्यादा होशियार है। और कारण भी है। दूसरे को धोखा दोगे तो दूसरा बचने की कोशिश भी कर सकता है। अपने को ही धोखा दोगे, तब तो तुम बिलकुल असहाय हो गए, बचने को तो कोई है ही नहीं वहां। धोखा ही दे रहे हो तुम खुद को तो कौन बचे? किससे बचे?

फित्ने की नदी में नाव खेता हूं मैं
धोखे की हवा में सांस लेता हूं मैं
इतने कोई दुश्मन को भी देता नहीं जुल
जितने खुद को फरेब देता हूं मैं

दुश्मनों को भी कोई इतने धोखे नहीं देता, जितना आदमी अपने को दे लेता है। आखिर दुश्मन तो सावधान होता है। दुश्मन अपनी सुरक्षा करता है। तुम तो बिलकुल असुरक्षित हो। और अगर तुम खुद ही धोखा देने को तैयार हो, अगर तुम खुद ही अपनी जेब से पैसे चुरा रहे हो, तो कौन रोक सकेगा? कैसे रोक सकेगा?

और यह चलता है। बड़ी तरकीब से चलता है। हम अपनी जीवन-अवस्था को सर्वांग सुंदर मान लेते हैं। फिर कुछ करने को नहीं बचता।

तुम जैसे हो, नैसर्गिक हो। मगर निसर्ग के भी और आयाम हैं। बीज नैसर्गिक है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि बीज अब बीज ही रह जाए। बीज को वृक्ष भी होना है। वृक्ष भी नैसर्गिक है। इसका यह अर्थ नहीं है कि वृक्ष वृक्ष ही रह जाए। वृक्ष को अभी फूल भी खिलाने हैं। फूल भी नैसर्गिक हैं। मगर इसका यह अर्थ नहीं है कि फूल फूल ही रह जाएं। फूल को सुगंध बन कर आकाश में उड़ना भी है।

जब तक बीज, कंकड़-पत्थर जैसा दिखाई पड़ने वाला बीज, अदृश्य सुवास बन कर आकाश में न उड़ने लगे, तब तक तृप्त मत होना, तब तक सांत्वना मत खोजना।

तुम्हारा प्रेम बीज की तरह है। मेरा प्रेम, जिसकी मैं चर्चा कर रहा हूं, सुवास की तरह है। तुम्हारे बीज से ही आएगी वह सुवास, इसलिए तुम्हारे बीज का निषेध नहीं है, विरोध नहीं है; अंगीकार है, स्वीकार है, स्वागत है। लेकिन उस पर समाप्ति भी नहीं है।

मेरे साथ दो भूलें हो सकती हैं। एक तो भूल यह कि तुम समझ लो कि तुम्हारा प्रेम ही बस अंत। कुछ लोग ऐसी भूल करेंगे, कर रहे हैं। और दूसरी भूल कि मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं, उसमें तुम्हारे प्रेम को कोई जगह ही नहीं है; तुम्हारे प्रेम के विपरीत है मेरा प्रेम। वैसी भूल भी सदियों से होती रही है। वैसी भी भूल कुछ लोग कर रहे है।

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन
– ओशो

और एक दिन उसके जीवन में ऐसा भी आया कि जिस परमात्मीय प्रेम की झलक उसे खुद में अनुभव होती थीं वह स्थूल रूप में प्रकट हुआ… और वह है स्वामी ध्यान विनय जिसने अपना सर्वस्व लुटाकर भौतिक जगत से खींचकर उसे एक जादुई दुनिया में प्रवेश करवा दिया… एक ऐसा संसार जहाँ चारों ओर वह चमत्कार घटित होते देखती है, एक नन्ही बालिका की तरह प्रसन्नता से उछल पड़ती है…

परन्तु उसे अनुमति नहीं कि संसार को इन चमत्कारों से अवगत कराए क्योंकि हरेक की अपनी अध्यात्मिक यात्रा होती है, हरेक को अपने अनुभव स्वयं अर्जित करना होते हैं, और फिर दृश्य जगत का हर मनुष्य इन अदृश्य शक्ति कणों की लीला देख ही पाए यह आवश्यक नहीं… वह खुद भी कहाँ देख पाई थी अपने जीवन साथी के आगमन से पहले जो उसके गुरु भी हैं, मित्र भी, पिता भी और पुत्र भी….

और उसी के शब्दों में एक और किस्सा… कृपया इस लिंक पर पढ़ें

चरित्रहीन – 4 : उड़ियो पंख पसार

चरित्रहीन -2 : मैं ईश्वर की प्रयोगशाला हूँ

चरित्रहीन – 1 : प्रेम, पीड़ा, प्रतीक्षा, परमात्मा

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