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Category: October (Third) 2018

माँ की रसोई से : गिलकी की झिलमिल रेसिपी

माँ मेरी अक्सर पीठ पर एक धोंक जमा देती, ‘नखीत्री’! ससुराल जाकर हमारा नाम ऐसे रोशन करेगी… चने की दाल और तुअर की दाल में फर्क नहीं पता!! तुरई और गिलकी कितनी तो अलग दिखती है… जिसमें कांटे वाले छिलके होते हैं वो तुरई होती… ऐसे माँ कितना भी मार ले, ससुराल के नाम पर […]

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आत्म मंथन : मैं रोज़ नई हूँ…

कभी समय के एक टुकड़े पर लिखी थी अनुभव की इबारत और लगा था कि बस यही अंतिम सत्य है. लेकिन मैंने अपनी ही सत्यता को बहुत कम आँका फिर यह तो ब्रह्माण्डीय सत्य का प्रकटीकरण था कि मैं अपने ही लिखे को मिटा देने पर आनंदित हुई और ब्रह्माण्ड मुझे आनंदित देखकर नाच उठा… […]

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एक विवाह ऐसा भी

विवाह को न जाने क्यूं हमारे यहाँ सिर्फ रस्म से जोड़ लिया गया है, विवाह एक भाव है कि जब भी दो चेतनाएं मिल कर अपना वर्तुल पूरा करेंगी विवाह घटित होगा… ये विवाह दो चेतनाओं के बीच की बात है. वैसे ही हर वो भाव जो चेतनाओं के साथ जुड़कर अपना वर्तुल पूरा करे, […]

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नायिका -5 : ये नये मिजाज़ का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

अभी तक आप मिले मुझसे यानी सूत्रधार से, और पढ़े नायक और नायिका के एकदूसरे को लिखे ख़त…. …..बिल्कुल …आपकी उलझन बिल्कुल सही कि एक तरफ तो मैं कहता हूँ कि नायिका और नायक की पहली मुलाकात बाकी है और दूसरी तरफ इन खतों से लगता है जैसे दोनों एक दूसरे को बरसों से ही […]

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ए माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी

भैया.. मां कैसी दिखती होगी.. क्या तुझे याद है”? ‘भैया.. मां होती तो कितना अच्छा होता ना.. यूं खाना खाने को चाची की तरफ तो ना जाना होता..” हां ..छोटे.. “भैया.. देखा ना चाची कैसे घूरती मुझे खाते देख के.” थोड़ा पहले चला जाऊं तो हाथ नचा के बोलती है.. अभी ना बना खाना.. चल […]

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Jungle Book : चिकचिक की पढ़ाई आई काम, वर्ना शेरसिंह का होता काम तमाम

कल रात से चंपकवन के राजा शेरसिंह का कुछ अता पता नहीं था। रानी शेरनी ने बताया कि शेरसिंह कल रात को यह देखने निकले थे कि जंगल में सब ठीक ठाक है कि नहीं। लेकिन तब से वे वापस नहीं लौटे। शेरसिंह रोज रात को सोने से पहले जंगल का एक चक्कर जरूर लगाते […]

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मानो या ना मानो : भैरव का आह्वान और प्रकटीकरण

गढ़वाल से होने के कारण ढोल दमाऊ हमारी संस्कृति की विशेषता है। देवी देवता आते हैं। मुझे कभी विश्वास नहीं रहा। कई हास्यास्पद कहानियां भी सुन रखी थीं और कई असली बात भी देख रखी थी। मानव शरीर है। आभास नहीं हुआ तो नहीं हुआ। अपने विदेशी कुछ मित्रो के साथ गाँव जा रखा था। […]

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