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Category: October2018

‘पंछी’ से सीखिए आसमान में उड़ने का हुनर और शऊर

दूरदर्शन पर एक सीरियल आया करता था “दादी माँ जागी” … बीस तीस साल तक मूर्छा में रही दादी माँ एक दिन अचानक जाग जाती है… बाहर की दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी होती है लेकिन उनके लिए दुनिया वही बीस तीस साल पुरानी ही है… नए समय के साथ सामंजस्य बिठाने में दादी […]

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आज की नायिका : जोयिता मंडल, सिर्फ एक औरत या पुरुष नहीं, एक पूर्ण मनुष्य

दीपावली पर मिर्ज़ा ग़ालिब का एक वीडियो अक्सर वायरल होता है. जब कुछ हिन्दू दिवाली की मिठाई उनके घर पहुंचाते हैं तो उनके एक मुस्लिम मित्र उन पर प्रश्न उछालते हैं… आप बर्फी खाएंगे? हाँ क्यों? आपको शर्म नहीं आती, एक मुस्लिम होकर हिन्दू बर्फी खाएंगे? मिर्ज़ा हँसते हुए कहते हैं अच्छा! मिठाई भी हिन्दू […]

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127 Hours : जीवन को जीत लाने के लिए ज़रूरी है अब इस हाथ का धड़ से अलग होना

127 Hours… एक अंग्रेज़ी फिल्म है कुछ तीन चार साल पहले देखी थी. यूं तो अंग्रेज़ी फ़िल्में मैंने बहुत कम देखी हैं, लेकिन जितनी भी देखी हैं वो या तो जीवन और मृत्यु के बीच जीवन को बचा लाने की जिजीविषा पर आधारित रही या फिर मुझे वो इसलिए पसंद आई क्योंकि अंग्रेज़ी फ़िल्में अधिकतर […]

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ममता : चोरनी

बात 2014 अक्टूबर की है जब अजित सिंह का उदयन स्कूल बस शुरू ही हुआ था, बच्चों के लिए कपड़ों का बड़ा सा पुलिंदा बना रही थी और फेसबुक पर अपने अनुभव लिखती जा रही थी कि कैसे कैसे मैंने इन बच्चों के लिए कपड़े जुटाए. उन दिनों लिखा था – मैं और मेरा Udayan […]

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मानो या ना मानो : रहस्यमयी रंगोली

हमारा समाज छद्म व्यवहार की नींव पर टिका है. हम यदि वास्तविक व्यवहार ज्यों का त्यों करने लगेंगे तो इस समाज की बुनियाद हिल जाएगी और वो भरभराकर नीचे गिर पड़ेगा….. लेकिन हम असामाजिक होने के साथ ही आदिम हो जाएंगे, एकदम बीहड़ लेकिन प्रकृति के एकदम करीब… यानि अज्ञात के करीब अज्ञेय की खोज […]

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एक कहानी : नाम याद नहीं मुझे…

क्लास, सातवीं से आठवीं हो गई तब महसूस किया कि कुछ बदल रहा है। कपड़ों में सलवार दुपट्टे की गिनती बढ़ी। मम्मी पहले से ज्यादा चौकन्नी हो गयीं। थोड़ी दुपट्टे को लेकर मैं भी सतर्क हुई। स्कूल जाने के लिए सहेलियों का एक ग्रुप साथ हो गया। लड़कों का कोई झुण्ड देखते ही सिर झुक […]

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शुभ मंगलम सावधान : दूसरी शादी

2008, 10 वर्ष पहले। जबलपुर। (संस्मरण) दिल्ली से लौट मैंने नई नई प्रैक्टिस शुरू की थी। मरीज़ बहुत कम आते थे। जो आते थे वे सभी बेहद ग़रीब, ग्रामीण परिवेश के। मध्यम एवं उच्च वर्ग या तो मुझसे अनभिज्ञ था या मेरे छोटे से क्लिनिक और मुझे उन्होंने स्वीकारा नहीं था। ऐसे में एक मध्यम […]

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माँ की रसोई से : गिलकी की झिलमिल रेसिपी

माँ मेरी अक्सर पीठ पर एक धोंक जमा देती, ‘नखीत्री’! ससुराल जाकर हमारा नाम ऐसे रोशन करेगी… चने की दाल और तुअर की दाल में फर्क नहीं पता!! तुरई और गिलकी कितनी तो अलग दिखती है… जिसमें कांटे वाले छिलके होते हैं वो तुरई होती… ऐसे माँ कितना भी मार ले, ससुराल के नाम पर […]

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आत्म मंथन : मैं रोज़ नई हूँ…

कभी समय के एक टुकड़े पर लिखी थी अनुभव की इबारत और लगा था कि बस यही अंतिम सत्य है. लेकिन मैंने अपनी ही सत्यता को बहुत कम आँका फिर यह तो ब्रह्माण्डीय सत्य का प्रकटीकरण था कि मैं अपने ही लिखे को मिटा देने पर आनंदित हुई और ब्रह्माण्ड मुझे आनंदित देखकर नाच उठा… […]

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एक विवाह ऐसा भी

विवाह को न जाने क्यूं हमारे यहाँ सिर्फ रस्म से जोड़ लिया गया है, विवाह एक भाव है कि जब भी दो चेतनाएं मिल कर अपना वर्तुल पूरा करेंगी विवाह घटित होगा… ये विवाह दो चेतनाओं के बीच की बात है. वैसे ही हर वो भाव जो चेतनाओं के साथ जुड़कर अपना वर्तुल पूरा करे, […]

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