तब आनंद से जीते थे जब खाने के काम आती थीं ब्लैकबेरी और एप्पल जैसी चीज़े

नब्बे के दशक में हम आज की तरह सेलेक्टिव नहीं हुआ करते थे… मतलब कि चीजों को खुद के लिए…

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समुद्र मंथन : शुभ-अशुभ हमारी धारणा है, प्रकृति की नहीं

दो विपरीत विचार स्वभाव के समूह देव और दैत्यों के सहयोग से, समुद्र में विपरीत धारायें उत्पन्न की गईं, जिससे…

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सदमा – 2 : मेरा कोई सपना होता…!

दुखांत प्रेम कहानियों पर बनने वाली फिल्मों में सदमा को मैं श्रेष्ठ मानता हूं। ऐसी फिल्मों में अकसर नायक-नायिका की…

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किताबों की दुनिया

कवियित्री राजेश जोशी की ‘ब्रह्माण्ड का नृत्य’ संग्रह की कई रचनाओं को पढ़ते हुए मैंने महसूस किया जैसे संवेदनशील लोगों…

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आत्ममंथन : जिसे जो बनना होता है वो बनके ही रहता है

“जिसे जो बनना होता है वो बनके ही रहता है…………..” सुबह के सपने की सारी गुत्थियाँ सुलझ जाने के बाद…

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