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Category: June 2018

शून्य से संबोधि तक

कहते हैं व्यक्ति की उन्नति में स्थान का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है. फिर चाहे वो उन्नति शैक्षणिक हो, आध्यात्मिक हो, व्यवसायिक हो या सामाजिक हो, किसी भी स्तर पर की गई उन्नति में स्थान की महत्ता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता. ये एक स्थापित तथ्य है कि सार्थक प्रयास भी यदि अनुचित स्थान […]

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देह के सितार से निकलता सूक्ष्म प्राणों का गीत

संगीत और साहित्य अध्यात्म की जुड़वा संताने हैं… यूं तो जीवन में और जीवन के परे हो रहा हर कृत्य और कुकृत्य इसी मुखिया के गाँव की सरहद का हिस्सा है. उसके गाँव की सीमा पर जो दीवारें हैं उन पर जीवन की उत्पत्ति की प्राचीन कहानियां चित्रित हैं. उसके दरबार में प्रसन्नता कालबेलिया नृत्य […]

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कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

सुख-साधन-सत्ता के शिखर पर आरूढ़ व्यक्ति भी जब आत्महत्या जैसे घृणित कार्य को अंजाम देता है तो मेरा मन क्षुब्ध हो उठता है; क्षुब्ध हो उठता है मेरा मन जब मैं अखबारों के पन्नों में आत्महत्या जैसी खबरों को सुर्खियाँ बटोरते पाता हूँ; बहुत क्षोभ होता है तब जब मैं पाता हूँ कि आईआईटी जैसे […]

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बंदिनी : मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना…

चारुचंद्र चक्रवर्ती की बांग्ला कहानी ‘तामसी’, पर आधारित बिमल रॉय की 1963 निर्मित फ़िल्म “बन्दिनी” हर बार मन में एक गहरा असर डालती है. हत्या के अपराध में सज़ा काट रही कल्याणी (नूतन) का विप्लवी, क्राँतिकारी बिकाश घोष(अशोक कुमार) के साथ प्रेम, डाह, बदले और समर्पण की अद्भुत कहानी है बन्दिनी. प्रेम में छल की […]

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पण्डित राज और लवंगी : गंगा की गवाही कि प्रेम न हारा और धर्म भी जीता

सत्रहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध था. दूर दक्षिण में गोदावरी तट के एक छोटे राज्य की राज्यसभा में एक विद्वान ब्राह्मण सम्मान पाता था, नाम था जगन्नाथ शास्त्री. साहित्य के प्रकांड विद्वान, दर्शन के अद्भुत ज्ञाता. इस छोटे से राज्य के महाराज चन्द्रदेव के लिए जगन्नाथ शास्त्री सबसे बड़े गर्व थे. कारण यह, कि जगन्नाथ शास्त्री […]

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Carolyn Hartz : चार पोतों की 70 साल की इस दादी जैसे आप भी हो सकते हैं युवा

मेरी त्वचा से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता… टिंग टोंग संतूर संतूर…. साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान…. इस तरह के बहुत से विज्ञापन हम देखते आये हैं, विज्ञापन हमारे लिए हमेशा से कार्यक्रम के बीच में आने वाली बाधा रहे हैं… कभी कोई विज्ञापन पसंद भी आ जाता है […]

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फ़ादर्स डे : एक था बचपन, बचपन के एक बाबूजी थे

फादर्स डे के बहाने… अपने पापा के साथ मैं बहुत दोस्ताना नहीं हूँ. पिता-पुत्र के संबंधों की प्रचलित गरिमा हमारे बीच मौजूद है. पापा से मुझे कुछ कहना होता है तो माँ जरिया बनती है और यही स्थिति पापा की भी है. हालांकि, अब कई बार संवाद सेतु की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन स्थिति […]

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ओमुआमुआ : वह अतीत का अग्रदूत!

अंतरिक्ष मेरे लिए हमेशा से बहुत रहस्मयी रहा है, बचपन से ही रात के आसमान को तकने की आदत रही है…. बहुत सारे ऐसे अद्भुत दृश्य बिना टेलिस्कोप के देखे हैं, लगता था जैसे कोई सिनेमा के परदे पर उभरता दृश्य देख रही हूँ… कभी लिखा था यह – अवकाश का आकाश “पहला नियम …. […]

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जानेमन तुम कमाल करती हो….

बहुत विस्तृत है भाव जगत, जिन्हें शब्दों का बंधन रास नहीं आता, फिर भी अज्ञात को ज्ञात शब्दों में प्रस्तुत करने की मनुष्य की सीमा को तोड़ने की ज़िद लिए तुम हर बार शब्दों के समंदर में कूद जाती हो… जानेमन तुम कमाल करती हो…. कभी ठहर जाया करो उन दो दुनिया के बीच में […]

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गुड्डी मिली? : किरदार के भीतर और बाहर की दुनिया

जीवन में घटने वाली हर महत्वपूर्ण घटना एक फिल्म के समान होती है जिसकी स्क्रिप्ट नियति द्वारा पहले से लिख दी गयी है, साथ में आपका किरदार भी. अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप अपना वास्तविक चरित्र उसमें लाए बिना उस किरदार को अपने अभिनय से कितना सशक्त बनाते हो. बावजूद इसके […]

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