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Category: June (Fourth) 2018

काली

कुंठा, पीड़ा, तड़प, अकुलाहट और प्रतीक्षा की लम्बी यात्रा के बाद जब आपका पूरा अस्तित्व ही प्रश्न में परिवर्तित हो जाये तब जाकर उत्तर प्रकट होता है. प्रश्न सिर्फ एक ही होता है अमूमन सबका … आखिर मेरे साथ ही क्यों? उत्तर काली के इस चित्र के साथ प्रकट हुआ, माध्यम हमेशा की तरह ध्यान […]

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कागज़ी दस्तावेज : पिया की प्रतीक्षा में घूंघट ओढ़े बैठी रोज़ एक नई दुल्हन हूँ मैं

हर वर्ष जनवरी की पहली तारीख को बच्चों के दादाजी मुझे उपहार स्वरूप नई डायरी देते हैं. कम्प्यूटर की इस ठक-ठक में कलम अक्सर साथ छोड़ देती है. लेकिन उन्होंने कभी डायरी देना नहीं छोड़ा. उन्हें पता है मेरी आत्मा मेरे लिखे गए मृत शब्दों में हमेशा जीवित रहेगी. डायरी में लिखना अमूमन ना के […]

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भारतीय भोजन थाली से गायब सेंधा नमक और अजीनोमोटो की सेंध

एक समय था जब भारत की पारंपरिक रसोई में सिल बट्टे पर मसाले पीसते समय खड़ा नमक डाला जाता था. काला नमक और सेंधा नमक तो उपवास में खाया जाने वाला नमक था यानी इतना शुद्ध कि नमक खाने से भी व्रत ना टूटे. फिर अचानक से वैश्वीकरण की चकाचौंध में हमें अपनी ही रसोई […]

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शून्य से संबोधि तक

कहते हैं व्यक्ति की उन्नति में स्थान का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है. फिर चाहे वो उन्नति शैक्षणिक हो, आध्यात्मिक हो, व्यवसायिक हो या सामाजिक हो, किसी भी स्तर पर की गई उन्नति में स्थान की महत्ता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता. ये एक स्थापित तथ्य है कि सार्थक प्रयास भी यदि अनुचित स्थान […]

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देह के सितार से निकलता सूक्ष्म प्राणों का गीत

संगीत और साहित्य अध्यात्म की जुड़वा संताने हैं… यूं तो जीवन में और जीवन के परे हो रहा हर कृत्य और कुकृत्य इसी मुखिया के गाँव की सरहद का हिस्सा है. उसके गाँव की सीमा पर जो दीवारें हैं उन पर जीवन की उत्पत्ति की प्राचीन कहानियां चित्रित हैं. उसके दरबार में प्रसन्नता कालबेलिया नृत्य […]

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कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

सुख-साधन-सत्ता के शिखर पर आरूढ़ व्यक्ति भी जब आत्महत्या जैसे घृणित कार्य को अंजाम देता है तो मेरा मन क्षुब्ध हो उठता है; क्षुब्ध हो उठता है मेरा मन जब मैं अखबारों के पन्नों में आत्महत्या जैसी खबरों को सुर्खियाँ बटोरते पाता हूँ; बहुत क्षोभ होता है तब जब मैं पाता हूँ कि आईआईटी जैसे […]

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बंदिनी : मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना…

चारुचंद्र चक्रवर्ती की बांग्ला कहानी ‘तामसी’, पर आधारित बिमल रॉय की 1963 निर्मित फ़िल्म “बन्दिनी” हर बार मन में एक गहरा असर डालती है. हत्या के अपराध में सज़ा काट रही कल्याणी (नूतन) का विप्लवी, क्राँतिकारी बिकाश घोष(अशोक कुमार) के साथ प्रेम, डाह, बदले और समर्पण की अद्भुत कहानी है बन्दिनी. प्रेम में छल की […]

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