तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!

“तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!” ये श्री केदारनाथ सिंह हैं, और बड़े दिनों से इस कविता…

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नगरवधू से तवायफ और फिर वेश्या बनने का सफ़र

मैं पवित्रता की कसौटी पर पवित्रतम हूँ क्योंकि मैं तुम्हारे समाज को अपवित्र होने से बचाती हूँ। मैं अपने अस्तित्व…

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मानो या ना मानो : क्या मार्गदर्शन करती हैं आत्माएं?

एक खुशहाल परिवार, न पैसे की दिक्कत, न आपसी कलह, न कोई और किल्लत… फिर ऐसा क्या हुआ कि दो…

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गुलज़ारी जादू : धन्नो की आँखों में रात का सुरमा और चाँद का चुम्मा

एक कवि के व्यक्तित्व का पैमाना उसके जीवन में घटित घटनाएं नहीं होती, उस जीवन में उन तमाम असंगत या…

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