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Category: July (Third) 2018

रास्ते कभी बंद नहीं होते

मां बाप को बच्चों से ज़्यादा से ज़्यादा चाहिए, वो सब भी जो खुद कभी नहीं कर पाये। उम्मीद का पूरा टोकरा सिर पर लिए घूमते हैं आज के बच्चे। और इस बोझ को ढोने के चक्कर में बचपन, खिलंदड़पना, मस्ती, शोखियाँ, शरारत, चुलबुलापन, शौक, हंसी मज़ाक सब गायब सा हो जाता है ज़िंदगी से। […]

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मानो या ना मानो : उसे जिसको चुनना होता है, वो चुन लेती है

कस्तूरी बहुत परेशान थी किस से कहे अपने मन की बात, कि तभी मकान मालकिन की बहू आयी। वो कलकत्ता से आई हुई थी। उनके परिवार में किसी की मृत्यु होने पर गरुड़ पुराण चल रहा था। वो कस्तूरी को भी बताने आयी थी। थोड़ा बैठी तो कस्तूरी रो पड़ी। कस्तूरी ने प्रेम विवाह किया […]

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मित्रों! झोला उठाने का वक्त आ गया है

यूपी के बाज़ार से पॉलीथीन बेदख़ल हो गई। ठीक हुआ! जब किसी के जीवन में कोई दखलअंदाजी की बेइंतहा कर जायेगा तो उसे बेदखल होना ही पड़ेगा.. सौदा कैसा भी हो… कच्चा, पक्का, सूखा-गीला, ठन्डा-गरम हर एक सौदे के लिये मुंह बाये तैयार रहती थी ये। सबके उंगलियों में लिपटने और लटकने का जो नशा […]

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अलविदा पीड़ा के राजकुंवर नीरज

जीवन कटना था, कट गया अच्छा कटा, बुरा कटा यह तुम जानो मैं तो यह समझता हूँ कपड़ा पुराना एक फटना था, फट गया जीवन कटना था कट गया ‘जीवन’ के लिये पहले ही उन्होंने ये अभिव्यक्त कर जता दिया कि उनके लिये वो महज़ एक पुराने कपड़े के फटने की तरह है और बिल्कुल, […]

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तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!

“तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!” ये श्री केदारनाथ सिंह हैं, और बड़े दिनों से इस कविता को गुनगुनाते हुए मेरे हृदय में बह रहे हैं। वही केदार, जिनके लिए “जाना” हिंदी की ख़ौफ़नाक क्रिया थी! वही केदारनाथ, जो स्वयं को नदियों में चम्बल और सर्दियों में बुढ़िया का कम्बल कहते थे! […]

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नगरवधू से तवायफ और फिर वेश्या बनने का सफ़र

मैं पवित्रता की कसौटी पर पवित्रतम हूँ क्योंकि मैं तुम्हारे समाज को अपवित्र होने से बचाती हूँ। मैं अपने अस्तित्व को तुम्हारे कल्याण के लिए खोती हूँ स्वयं टूटकर भी, समाज को टूटने से बचाती हूँ। और तुम मेरे लिए नित्य नयी दीवार खड़ी करते हो, मैं तो यहाँ स्वाभिमान के साथ तलवार की नोंक […]

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देवकी की आँखों का प्यार, रिमझिम बरसता दुलार

देवकी चौदह वर्ष की हो गई थी। जवानी में उसने खूब दूध दिया और बच्चे भी। बछिया तो रामधीन रख लेता था पर चार बछड़े जो हुए ना जाने कहां भेज दिए रामधीन ने। जब-जब बछड़े उसके पास से ले जाए गए देवकी बहुत कलपी, सींग चलाए, खूंटे में बंधे-बंधे फड़फड़ाई पर ले जाने से […]

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