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Category: Dec (Fifth) 2018

नायिका -12 : मांग कर मैं न पीयूँ, ये मेरी ख़ुद्दारी है, इसका मतलब ये नहीं, कि मुझे प्यास नहीं

सूत्रधार – दो अंक पहले नायक नायिका का अंतिम संवाद कुछ यूं था कि नायिका किसी से झगड़कर खराब मूड लिए बैठी है और सारा गुस्सा नायक पर उतारते हुए कहती हैं “सारे मर्द एक जैसे होते हैं.” जवाब में नायक कहते हैं – वाकई?? सब मर्द एक जैसे होते हैं? अरे नहीं अभी सबसे […]

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शरीर ने तुम्हें नहीं, तुमने शरीर को पकड़ा है : ओशो

उपनिषद के ऋषियों के मन में मनुष्य के शरीर की कोई भी निंदा नहीं है. मनुष्य के शरीर के प्रति बहुत सदभाव है, बहुत श्रद्धा भाव है, क्योंकि मनुष्य का शरीर वस्तुत: मंदिर है. उस परमात्मा का निवास जिसके भीतर है, उसकी निंदा तो कैसे की जा सकती है! परमात्मा जिसके भीतर बसा है, उस […]

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टोपी शुक्ला : यह उपन्यास अश्लील है, जीवन की तरह!

भूमिका – मुझे यह उपन्यास लिख कर कोई ख़ास खुशी नहीं हुई. क्योंकि आत्महत्या सभ्यता की हार है. परन्तु टोपी के सामने कोई और रास्ता नहीं था. यह टोपी मैं भी हूं और मेरे ही जैसे और बहुत से लोग भी हैं. हम लोग कहीं न कहीं किसी न किसी अवसर पर कम्प्रोमाइज़ कर लेते […]

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तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले, अपने पे भरोसा है तो एक दांव लगा ले

हौसलों के पंख होते हैं, पैर नहीं। वो जब ठन जाता है, तो कोई आसमान उसकी पकड़ से बच नहीं सकता। एक ऐसे ही हौसले को मैंने आसमान की बुलंदी को छूते हुए देखा है। एक पैर की मोरनी को मैंने सावन में झूमते हुए देखा है। कोई फर्क नहीं पड़ता वह दिसंबर 1986 में […]

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Me Too : महत्वाकांक्षा की सिद्धि के लिए आरोप-प्रत्यारोप का खेल

ऐसे विषयों पर लिखना आग से खेलने जैसा है, क्योंकि इन मुद्दों पर छान-बीन से पूर्व निष्कर्ष पर पहुँचने का अतिरिक्त उतावलापन गंभीर-से-गंभीर व्यक्तियों में भी देखने को मिलता है। बल्कि यों कहें कि स्त्री-पुरुष विवाद में स्त्रियों के पक्ष में खड़ा होना फैशन है, उदार और आधुनिक दिखने की तयशुदा गारंटी! भारतीय चिंतन-पद्धत्ति में […]

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मानो या ना मानो : यह महफिल है मस्तानों की, हर शख्स यहाँ पर मतवाला

वेद में एक बहुत ही सुन्दर मंत्र है – “कस्मै देवाय हविषा विधेम”. ऋषियों के सम्मुख एक बहुत बड़ा प्रश्न यह था कि यज्ञ में किस देवता की आहुति दी जाये. यह सब विचार करते हुए उन्हें लगा कि कौन सी ऐसी शक्ति है जो पूरे विश्व का संचालन करती है? इस चराचर संसार का […]

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विश्व के प्रत्येक पदार्थ के मध्य यन्त्र है और उस यन्त्र के मध्य भी यन्त्र है

सृष्टि के सभी जड़-चेतन पदार्थों का स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण धरातलों पर जो रूपायन होता है, उसका मूल सूत्रधार है– ‘अग्नि’ या उसकी ‘रूपतन्मात्रा’। इसलिए अग्नितत्व (रूपायन) का यन्त्र से सम्बन्ध है। यन्त्र शब्द का ‘र’ ( यं+त+रं=यन्त्र ) अक्षर यही संकेतित करता है। ‘यन्त्रम्’ शब्द का ‘त’ अक्षर अमृत का बोधक है। ‘त’ ( […]

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