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सुरबहार : ओ सजना, बरखा बहार आई

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ओ सजना, बरखा बहार आई, यह गीत साधना की सादगी के दिनों का सौंदर्य गीत है, एक नाज़ुक सी लड़की बारिश की रिमझिम में पिया मिलन की आस में गीत गूंथ रही है… यह उस समय का गीत है जब उसे अपने चौड़े माथे की सुंदरता किसी पैमाने पर कम न लगती थी, और साधना कट वाला हेयर स्टाइल उसने अभी तक नहीं अपनाया था.

लंबे खुले बालों से सरकता गीत उसके माथे से फिसलकर गालों के गुम्बद पर आ बैठता है और जब मुस्कराहट की नदी की चौड़ाई कम होती है तो उसकी ठुड्डी पर सिमटकर छुप जाता है…

और यही गीत बारिश का पानी छू लेने के लिए बढ़ी बाँहों पर जलतरंग बजाता हुआ उसकी हथेली पर भीगता हुआ ख़त्म होता है…

गीत को देखते हुए बस यही तो दिखता है… गाती हुई प्रेमिका, बारिश, लकड़ी के छज्जे से टपकती बारिश की बूंदे… जो नहीं दिख रहा होता है वो है उस गीत का वास्तविक जादू….  गीत के बोल, गायिका की आवाज़ और संगीतकार का संगीत… और उस जादू के घटित होने के लिए उसे जिस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है उसका राज़ कम ही लोग जान पाते हैं…

आइये गौरांग बता रहे हैं इसके पीछे की कहानी –

1958 साल। अमरीका के दक्षिण केलिफोर्निया के लॉस एंजेल्स शहर में एक भारतीय वाद्ययंत्र दुकान। उस समय सारे अमरीका में यही एक दुकान थी जिस जगह पर भारतीय वाद्ययंत्र सबसे विश्वसनीय रूप से मिला करता था। जाहिर था, इकलौती दुकान होने की वजह से इसकी बड़ी धाक थी।

दुकान का मालिक था डेविड बर्नर। डेविड बर्नर भारतीय संगीत का शैदाई था, कुछ समझता भी था। भारतीय संगीतज्ञों को कंसर्ट में सुना भी करता था।

उस दिन एक पैंतीस वर्ष के साधारण से युवक ने दुकान में प्रवेश किया। सााधारण सी वेशभूषा। व्यक्तित्व भी साधारण। किसी की भी दृष्टि का आकर्षण न कर पाया। न ही किसी विक्रेता की नज़रों का मरकज बन पाया। मगर दुकान पर आया हुआ था तो शिष्टता के तौर पर ही क्रिस्टीना नाम की एक सेल्स गर्ल युवक के पास आई।

युवक ने सितार देखने की मांग की। अत्यंत ही उपेक्षा के भाव से क्रिस्टीना ने सितार दिखाना शुरू किया। युवक ने कई सितार देखे पर उसे कोई भी पसंद न आया। उसने दूसरे सितारों पर नजर दौड़ाना शुरू किया।

देखते देखते आखिरकार ऊपर शेल्फ में रखी एक सितार पर उसकी नजर ठहर गई। बड़े यत्न से उसे वहाँ रखा गया था। उसने विनम्रता से कहा – “जरा उस सितार को दिखाएंगे?”

एक तो ऊपर सेल्फ पर बड़े यत्न से रखा गया था। फिर बड़ा कीमती भी था, और उसे ऊपर से उतारना भी कम मुश्किल का काम न था। क्रिस्टीना अनमना होकर रह गयी। पर युवक की नज़र तो बस उसी सितार पर ही टिकी थी। वह कहाँ छोड़ने वाला था।

आखिर डेविड ही आगे आए। यह पश्चिम वालों की और खास कर अमरीकी वैल्यू ही है जो कस्टमर को इस तरह मान देते हैं, चाहे मन में कुछ भी हो या फिर चाहे कर्मचारियों की कितनी भी नेगेटिव सोच हो; वे इस वैल्यू की रक्षा करेंगे। कभी तो अपने कर्मचारियों के आगे एक उदाहरण बनने के लिए भी। अंतत: उनके निर्देश पर सितार को उतारा गया।

स्वाभाविक था, क्रिस्टीना को नागवार ही गुज़रा। उसने भाव को छुपाया भी नहीं। सितार को उतार क्रिस्टीना ने बड़े उपेक्षा के स्वर में कहा – “इस सितार का नाम Boss है। हर कोई इसे नहीं बजा सकता है। बड़े बड़े कंसर्ट में ही आला लोग इसे बजाते हैं।”

युवक ने तत्काल जवाब दिया – “आप लोग इसे Boss के नाम से जानते हों, हम भारत में इसे सुरबहार कहते हैं। अच्छा, क्या मैं इसे बजा कर देख सकता हूँ?”

कल्पना कीजिये, क्रिस्टीना की क्या दशा हुई होगी। दृष्टि कितनी तिर्यक हुई होगी। परंतु डेविड की सोच दूसरी थी। वह तो उस युवक में भी एक अदद ग्राहक खोज रहा था।

डेविड ने युवक के अनुरोध को साग्रह रखा। अनुमति मिली। युवक सितार लेकर बैठ गया। तार बांधा गया, फिर उसमेें ट्यून भी किया गया। फिर कुछ देर बाद आलाप शुरू हुआ। एक एक कर लोग आकर जमा होने लगे। निशब्द सुनने लगे। युवक भी ध्यानमग्न हो जादू बिखेरने लगा। जोड़, गत, तान, तिहाई, झाला ने ऐसा समा बाँधा कि लोग जड़ हो गए। आखिर जब समाप्त हुआ तो लोग स्तब्ध ही खड़े रहे। अंतत: तिलस्म टूटा और फिर मिनटों तक दुकान तालियों से गूँजता रहा। युवक तब चौंक कर सर उठाया।

युवक भी उस सितार को बजाकर परितृप्त हुआ। यह सितार उसके मन के लायक था। वह डेविड से बोला, वह यह सितार खरीदना चाहता है। पर तब तक तो डेविड का मन बदल चुका था। आगे आया और बोला – “आप कौन हैं? मैंने रविशंकर को सुना है। उनके जैसा कोई भी सितार नहीं बजा सकता। पर आप तो उससे किसी भी अंश में कम नहीं हैं। मैं यह सितार आप को नहीं बेच सकता। यह तो मेरी ओर से आपको उपहार है।”

अब फिर एक दूसरा छोर देखिये। सितार लेकर जब वह युवक दुकान से निकलने को हुआ तो अचानक क्रिस्टीना सामने आ गई और रूँधे गले बोली – ” मुझे क्षमा कर दीजिये। मैंने आपको गलत समझा था। मेरी नादानी ही थी, सर्वशक्तिमान ने मेरे अंदर रहे पूर्वाग्रह को दूर करने के लिए ही आपको भेजा है। आप ही इस सितार के योग्य शिल्पी हैं। जानती हूँ, आप अपने देश लौट जाएँगे। शायद फिर कभी मेरी आपसे मुलाक़ात नहीं होगी। इसलिए इस आखरी समय आप मेरा एक अनुरोध रखिए। इस एक डॉलर के नोट पर अपनी हस्ताक्षर कर दीजिये ताकि मैं ताजिंदगी इसे अपने पास रख आपको याद कर सकूँ।”

युवक मुस्कुराया। फिर उस डॉलर पर अपना हस्ताक्षर कर दिया – सलिल चौधरी...

उसी साल भारत लौट सलिल चौधरी ने राग खमाज पर एक धुन बनाई। यह एक बांग्ला गीत था – ‘ना जेयो ना, रजनी एखोनो बाकी।’ इसकी खासियत यह थी कि इसमें उसी Boss सितार से राग खमाज के धुन बजाए गए थे। कहना न होगा, गाना सुपर हिट था। फिर अगले ही साल 1959 में उसी गाना का हिन्दी रीमेक हुआ – ‘ओ सजना, बरखा बहार आई।’ इसमें में भी उसी Boss का प्रयोग था। लता के आवाज में यह गीत भी अमर हो गया।

इसके बंगला गीत की एक खासियत यह है कि गीत को स्वयं सलिल चौधरी ने ही लिखा था। इसके बोल बड़े सधे और अत्यन्त मनभावन हैं। सोचकर अचरज लगता है कि किसी सुरकार ने लिखा है, जिनका यह रेगुलर काम नहीं है।

ना जेयो ना रजनी एखोनो बाकी
आरो किछु दीते बाकी, बोले रातजागा पाखी।

कुछ हिन्दी ऐसा होगा –

मत जाओ रजनी अभी भी तो बाकी है
और भी कुछ देना बाकी है, रतजगा पंछी बोले।

प्रणय में मनुहार, अधिकार का कितना सुन्दर चित्रण दिखता है यहां।

हिमशिला समुद्र में ऊपर से बहुत छोटा दिखता है पर भीतर सौ गुना बड़ा होता है। मानव सतह से देखता है और भूल करता है।

इस कहानी को अनेकों ने पहले भी पढ़ा होगा। सलिल चौधरी की बहुत ही चर्चित घटना है। मगर इसमें जो बात मुझे खींचती है, मुरीद कैसे बनाया जाता है। इसी तरह न जाने कितने लोगों ने दुनिया के दूसरे अनजाने हिस्सों में जाकर खुद का लोहा मनवाया होगा, लोगों के सोच को बदला होगा।

कुछ दिल ने कहा… कुछ भी नहीं…

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1 thought on “सुरबहार : ओ सजना, बरखा बहार आई”

  1. Rajeev Singh says:

    लाज़वाब साधना, परख और साधना की पहली फ़िल्म लव इन शिमला(जिससे उनका हेयर स्टाइल साधना कट प्रसिद्ध हुआ था) एक ही साल 1960 में आई थी

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