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मैं और मेरी किताबें अक्सर ये बातें करते हैं : अघोरी बाबा की गीता

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जीवन को अपनी पूरी उन्मुक्तता से वही इंसान जी सकता है, जो उसके रहस्यों को जानता हो या उन रहस्यों की खोज में अग्रसर हो. यूं तो ये रहस्य हमारे चारों ओर खुले पड़े हैं, लेकिन इनको समझने के लिए, शुरुआती तौर पर हम हमारे ही द्वारा इजाद की गई वस्तुओं के उपयोग में सुविधा अनुभव करते हैं. जैसे मेरे लिए मेरी किताबें. फिर ज़रूरी नहीं कि वो किताब कोई महान साहित्यिक रचना हो, हाँ अक्सर होती भी है.

जैसे ऑग मैनडिनो की ‘दुनिया का सबसे महान चमत्कार’, जो कहती है –

कई संगीत रचनाएं, कई कलाकृतियाँ, कई पुस्तकें और कई नाटक ऐसे होते हैं जिनकी रचना किसी संगीतकार, कलाकार, लेखक या नाटककार ने नहीं बल्कि ईश्वर ने की है. इनकी रचना करने वाले लोग तो निमित्त मात्र होते हैं, जो ईश्वर के आदेशानुसार रचना कर रहे थे, ताकि वह अपनी बात हम तक पहुंचा सके.

ऑग मैनडिनो की ही एक और पुस्तक ‘दुनिया का सबसे महान सेल्समैन’ कहती है –

जीवन के पुरस्कार हर यात्रा के अंत में आते हैं. शुरू में नहीं, और मुझे यह नहीं पता कि अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मुझे कितना फासला तय करना है. हो सकता है कि मुझे हजारवें कदम पर भी असफलता का सामना करना पड़े, पर हो सकता है कि सफलता सड़क के अगले मोड़ पर छुपी हुई हो. मैं यह कभी नहीं जान पाऊंगा कि सफलता कितनी करीब है, जब तक कि मैं वह अगला मोड़ न मुड़ जाऊं.

पाओलो कोएलो की अल्केमिस्ट का यूं तो हर वाक्य जीवन के रहस्यों को उजागर करता-सा लगता है, लेकिन पूरी किताब का सार इन्हीं शब्दों में समाहित है –

जब तुम वास्तव में कोई वस्तु पाना चाहते हो तो सम्पूर्ण सृष्टि उसकी प्राप्ति में मदद के लिए तुम्हारे लिए षडयंत्र रचती है.

और

कोई भी सपना साकार होने से पहले विश्वात्मा तुम्हारी हर तरह से परीक्षा लेती है यह जानने के लिए कि, जो कुछ भी तुमने अपने सफ़र में सीखा है, उसे भूला तो नहीं दिया. इसलिए अपने सपनों को साकार करने के साथ साथ जो कुछ भी हमने जीवन से सीखा है उस पर चलने की निपुणता हमें प्राप्त कर लेनी चाहिए.

और इन सबसे अलग जिस शख्स की मैं मुरीद हूँ, वो कोई हिन्दी साहित्य के महान लेखक नहीं है, लेकिन मेरी नज़रों में वो किसी भी साहित्यकार से कम महान नहीं है. वो है टॉप मिस्ट्री राइटर और पॉकेट बुक्स के जाने माने उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक. उन्होंने अपनी एक पुस्तक की भूमिका में महान पुस्तक प्रेमी और इंग्लैंड के चार बार प्रधानमंत्री रह चुके सर विंस्टन चर्चिल की कही कुछ पंक्तियों का उल्लेख करते हुए लिखा है –

यदि आप अपनी तमाम पुस्तकें पढ़ नहीं सकते हैं, तो कम से कम उन्हें हैंडल कीजिए, उन्हें छूइए, टटोलिये, उनके साथ लाड़ लड़ाइए – उनमें झांकिए, उनका सामीप्य महसूस कीजिए, रख दीजिए, फिर उठा लीजिए, कहीं से खोलिए और जहां निगाह अटके वहां से कोई फिकरा पढ़िए, उसे शेल्फ पर खुद अपने हाथों से वापिस रखिए, अपने संकलन को अपने हाथों से नई तरतीब दीजिए ताकि अगर आपको यह नहीं भी पता कि उन पुस्तकों में क्या दर्ज है तो कम से कम ये तो पता हो कि कौन सी पुस्तक कहाँ उपलब्ध है. पुस्तकों से दोस्ती कीजिए, कम से कम वाकफियत तो ज़रूर कीजिए.

तो ऐसे ही जब अभिनंदन शर्मा ने अपनी पहली पुस्तक “अघोरी बाबा की गीता” मुझ तक पहुंचाई तभी मुझे यह विचार आ गया था कि एक और पुस्तक की यात्रा प्रारम्भ हो चुकी है. और इस बार यह यात्रा केवल मेरी नहीं लेखक की भी है.

चूंकि यह उनकी पहली पुस्तक है तो उन्हें इसकी समीक्षा का बेसब्री से इंतज़ार था. और मेरे पास उनकी यात्रा के लिए तय समय से अधिक उनकी प्रतीक्षा को अधिक कठिन बनाने की परीक्षा. क्योंकि जब एक लेखक कोई पुस्तक पूर्ण आस्था के साथ लिखता है तो उसके एक एक शब्द ऊर्जा से गुज़रकर इतना ऊर्जापूर्ण हो जाता है कि आप उनको पढ़ते हुए भी उस ऊर्जा को अनुभव कर सकते हैं.

कोई पुस्तक हमें यूं ही पसंद नहीं आ जाती, जब हम लेखक के लिखे के साथ एकाकार हो जाते हैं, उस स्तर पर जाकर पढ़ पाते हैं जिस स्तर पर जाकर उसने लिखी है उसकी ऊर्जा हमें ज्यों कि त्यों प्राप्त होती है.

और पुस्तक गीता सार जैसे दुर्लभ ग्रन्थ पर लिखी हो तो उस पुस्तक को एक ग्रन्थ के अंश के रूप में ही पढ़ना और भी बड़ी तपस्या है. तो लेखक की प्रतीक्षा में मेरी भी तपस्या सम्मिलित है. क्योंकि मैंने इसे सिर्फ एक पुस्तक के रूप में नहीं पढ़ा. इसमें उस लेखक की मेहनत, समर्पण, उत्साह और आस्था सबकुछ समाहित है.


पुस्तक यूं तो एक काल्पनिक चरित्र अघोरी बाबा को केंद्र में रखकर लिखी गयी है जो सिर्फ लेखक को ही दिखाई देते हैं, और जीवन के रंगमंच पर मायावी नाटक के माध्यम से उसे हर पग पर गीता उपदेश देते हुए उदाहरण सहित उसका सार समझा जाते हैं. लेकिन मैं यहाँ सीधे लेखक से संबोधित होते हुए कहना चाहूंगी कि जिसे आप काल्पनिक चरित्र समझ रहे हैं, क्या आप जानते हैं वह वास्तव में सदा से आपके साथ रहे हैं, जिन्होंने आपको पुस्तक लिखने के लिए मार्ग दिखाया ठीक उसी तरह जिस तरह से पुस्तक में घटनाओं का ज़िक्र है.

और यही बात पाठकों से भी कहना चाहूंगी कि ऐसे एक नहीं कई अघोरी बाबा आपकी जीवन यात्रा को नेपथ्य में अदृश्य रहकर संचालित किये हुए हैं, आपको पग पग पर आपके ही मस्तिष्क में उपजे विचारों के माध्यम से मार्गदर्शन देते रहते हैं. ऐसे ही लोग अदृश्य रहकर आपकी पीड़ा में भी आपके साथ होते हैं और प्रसन्नता में, बस हमें अपनी छठी इन्द्री को इतना तेज़ रखना होता है कि चाहे उन्हें देख न सके लेकिन उनकी उपस्थिति आप अनुभव कर सके.

ऐसी बहुत सारी घटनाओं का ज़िक्र इस पुस्तक में है जब लेखक के मन में बहुत सारे सवाल उमड़ रहे होते हैं, जीवन की छोटी छोटी समस्याओं से लेकर दार्शनिक बातों और अध्यात्मिक अड़चनों के रूप में. और लेखक अपने मानवीय स्वभाव को छोड़े बिना सारे सवालों का उत्तर पाता है.

जीवन में प्रत्येक घटना के दौरान हम सभी के मन में तरह तरह के सवाल उठते हैं… आप यदि गीता श्लोक पढ़ने में कठिनाई अनुभव करते हैं तो मैं कहूंगी अभिनन्दन शर्मा की यह पुस्तक पढ़ लीजिये. बहुत ही सरल शब्दों में आप कठिन से कठिन जिज्ञासाओं का उत्तर पा जाएँगे, यदि आप वास्तव में जिज्ञासु हैं तो.

वर्ना लाखों करोड़ों लोग मात्र रोटी कपड़ा और मकान की समस्याओं में ही पूरा जीवन गुज़ार लेते हैं. तो उन लोगों के लिए भी यह पुस्तक बहुत काम की है, क्योंकि गीता इसलिए नहीं लिखी गयी कि हर बार कोई अर्जुन, कृष्ण के सामने घुटनों पर बैठकर ज्ञान चक्षु खोलने के लिए करबद्ध रहे. आपको गीता और गीता सार पर लिखी इस तरह की तमाम पुस्तकें सामान्य जीवन में आनेवाली सामान्य परेशानियों के लिए भी समाधान देती है.

यूं तो भारत के अलावा कई देशों में गीता को मैनेजमेंट की पुस्तक के रूप में महाविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, लेकिन मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब अभिनंदन शर्मा की अघोरी बाबा की गीता विद्यालयों में किशोरवय बच्चों को पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाया जाये. क्योंकि यही वह उम्र होती है जब उनके मस्तिष्क में उठ रहे सवालों का जवाब देने में हमारा शिक्षातंत्र असफल हो चुका है, ऐसे में यह पुस्तक एक नई पीढ़ी तैयार करेगी, जो अपनी समस्याओं का स्वयं समाधान खोज लाने में सक्षम हो सकेगी.

हर व्यक्ति की तरह हर पुस्तक की अपनी चेतना और अपनी यात्रा होती है, हम उसकी यात्रा का भाग्य तो नहीं बदल सकते परन्तु उसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मार्ग सुलभ अवश्य कर सकते हैं ताकि वह अपनी यात्रा में लम्बी दूरी तय करे, इसलिए आप सभी पाठकों से अनुरोध है कि इस पुस्तक को खरीदकर अपने बच्चों को पढवाएं, खुद पढ़ें, मित्रों को उपहार स्वरूप दें.. ताकि आने वाली पीढ़ी इससे मार्गदर्शन ले सके.

और अंत में पूज्य अघोरी बाबा का भी धन्यवाद तो बनता है जिन्होंने यह समीक्षा मुझसे लिखवाई और लेखक को उनकी पुस्तक की कहानी ही की तरह मेरे द्वारा परीक्षा से गुज़ारा…

आखिर … कोई भी सपना साकार होने से पहले विश्वात्मा तुम्हारी हर तरह से परीक्षा लेती है यह जानने के लिए कि, जो कुछ भी तुमने अपने सफ़र में सीखा है, उसे भूला तो नहीं दिया. इसलिए अपने सपनों को साकार करने के साथ साथ जो कुछ भी हमने जीवन से सीखा है उस पर चलने की निपुणता हमें प्राप्त कर लेनी चाहिए.

– माँ जीवन शैफाली

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#AskAmma : कैसे होती है पुस्तक यात्रा?

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