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मोहब्बत और अदा का संगम : प्यार ये जाने कैसा है

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पहाड़ से नदी का उतरना, अटखेलियों के दस्तावेज पर स्पर्श की मोहर और मोहब्बत से अदा का संगम बस यही भाव उपजते हैं, जब भी मैं इस गीत में जैकी की बाहों से उर्मिला का फिसलना, और फिर उलझकर शर्माना देखती हूँ….

रंगीला… जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते हुए जिसने भी यह फिल्म देखी होगी, मुझे यकीन है उसके मोहपाश में बंधे बिना न रह सका होगा, बशर्ते दिल में मोहब्बत और आँखों में उस मोहब्बत को तराशे जाने का हुनर हो.

मोहब्बत तो हर किसी को होती है, चाहे मिले या न मिले लेकिन उसकी ख़ूबसूरती ताउम्र बनी रहती है यदि आपने उसे आँखों में बसा लिया हो, होठों पर सजा लिया हो, दिल की हर धड़कन के साथ संगीतबद्ध कर लिया हो… जिसकी खुशबू आपकी आती जाती साँसों के साथ देह को महका जाती हो…

मोहब्बत तो हर किसी को होती है, लेकिन उसका इज़हार हर किसी के बस की बात नहीं, जो इस मोहब्बत के इज़हार का दुस्साहस कर जाता है, उसके लिए ही रेशमा ने गया है “ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम…”

तो यह सलाम है हर उस मोहब्बत को जिसे आप कभी उम्र की रस्सी में बाँध न पाए वो रेशम सा सदा आपके रोम रोम को गुदगुदाता रहा…

यह सलाम है उस मोहब्बत को जो नायिका की आँखों में हया और अदा बनकर उतरता है तो नायक की बाहों में दीवानगी बनकर चढ़ता है…

यह गीत नदी के उसी उतार और चढ़ाव का संगम है जिसे देह की भाषा में जैकी और उर्मिला दोनों ने अपनी अदायगी से बखूबी प्रस्तुत किया है…

नेपथ्य में पहाड़ और नदी के दृश्यों के साथ एकाकार होते दोनों के हावभाव हमेशा से मुझे आकर्षित करते रहे हैं…. दो कारणों से … दूसरा पहले बताऊंगी वह है उर्मिला का रंगीला फिल्म में मेकओवर, अपनी चुलबुली छवि से बाहर निकलकर जैकी के साथ किये दृश्यों में गंभीर प्रेम में डूबी नायिका सा अभिनय, अजन्ता सी मूरत सी देह की सुडौलता और उसी अनुसार नृत्य मुद्रा, जहाँ कहीं भी फूहड़ता को स्थान नहीं…. हर वह स्त्री जिसने मोहब्बत के दुनियावी मायने को समझा है, वह उसमें कहीं न कहीं खुद की कल्पना करती है…

मेरी पसंदीदा प्लेन साड़ियाँ वो भी मेरे पसंदीदा रंगों की.. जैसे बादल अपने सारे रंगों के साथ बरसने को बेताब हो…

और पहला कारण है जैकी श्रॉफ खुद… अपनी गाढ़ी मूंछों, छोटी आँखों के साथ पतले होठों पर फैलती मुस्कराहट के साथ मुझे हमेशा से बहुत आकर्षित करता रहा है…

अपने अपरिपक्वता के दौर में हर लड़की के मन में किसी न किसी फ़िल्मी हीरो की छवि रहती है जिसे वह अपने प्रेमी में खोजने की कोशिश करती है और मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं, कि मैंने अपनी इस अपरिपक्वता को कभी परिपक्व नहीं होने दिया… मैं आज भी किसी की ऐसी गाढ़ी मूछों पर फ़िदा हो जाती हूँ… और आँखों में उर्मिला सी अदा लिए नदी सी उलझ जाती हूँ…

अलौकिक भाव जगत के बीच प्रेम की लौकिक अभिव्यक्ति का अपना सौन्दर्य होता है, जहाँ स्त्री सिर्फ एक स्त्री और पुरुष सिर्फ एक पुरुष होता है… और उनके मध्य की कीमियागिरी से ही वह तत्व उत्पन्न होता है जिससे फूलों में रस है और कोई भंवरा उससे आकर्षित होकर उसके चारों ओर मंडराता है…

जहाँ प्रेम की अभिव्यक्ति के पीछे प्रकृति के आकर्षण का नियम स्पष्ट काम करता है, और पहाड़ और नदी दोनों के मन से उठती तरंगे गाने लगती है कि…

दिन तो गुज़रते है जिसके ख्यालों में
राते गुज़रती हैं उसकी ही यादों में
वक़्त मिलन का आये तो राहों में
झूमे बहारे फूलों की कलियों में
भंवरो की टोली आये
कलियो पे वो मंडराए
डर ये खिज़ा का भी दिल से मिटाए

प्यार ये जाने कैसा है क्या कहे ये कुछ ऐसा है,
कभी दर्द ये देता है कभी चैन ये देता है,
कभी गम देता है कभी ख़ुशी देता है..

और उसे मैं अपने शब्दों में यूं व्यक्त करती हूँ कि –

हृदय कुण्ड के तरल प्रेम को
जमा दिया है
तेरी अबोली ठंडी परछाइयों ने
आओ अपनी साँसों की किरणों को
बाँध दो मेरे देह के कटिबंध पर
सुना है एक सौर्य वर्ष में दो बार
सूर्य तक लम्बवत होता है पृथ्वी के
ऊष्ण कटिबंध पर…

कर्क से लेकर मकर तक
सारे अक्षांशों तक अंगड़ाई ले चुके
अंगों ने प्रयास किया है
हरित ऋत के भ्रम को
बनाए रखने के लिए
लेकिन वर्ष भर की
तेरी यादों की औसत वर्षा भी
नम नहीं कर सकी है देह की माटी

आ जाओ इससे पहले कि हृदय कुण्ड
शीत कटिबंध पर प्रस्थान कर जाए …
और सूर्य की तिरछी किरणें भी
अयनवृत्तों को छू न पाए

मैंने देह की माटी पर
प्रेम के बीज बोए हैं
तुम अपनी प्रकाश किरणों से
उसे संश्लेषित कर जाओ….

माँ जीवन शैफाली

कितनी फीकी थी मैं, सिन्दूरी हो जाऊं… ओ सैंया…

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